योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 442, कुल 1734 में से
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<div align="right">४४१</div>अखण्डरूप है। यह जगत् उसी का चमत्कार है, जो उपज-उपजकर लय हो जाता है। हे राम! ध्याता, ध्यान ध्येय की त्रिपुटी भ्रान्तिमात्र है। वास्तव में द्रष्टा, दर्शन, दृश्य सब आत्मस्वरूप हैं; इससे भिन्न कुछ नहीं। वह ब्रह्मस्वरूप आत्मा सदा एकरस है, कभी क्षोभ को नहीं प्राप्त होता। चाहे अमावस का चन्द्रमा दिखाई पड़ जाय और प्रलयकाल के बिना प्रलयकाल की वायु चले तो भी आत्मा को क्षोभ नहीं होता—आत्मपद सदा ज्यों का त्यों है। हे राम! ऐसे आत्मा के प्रमाद से जीव दुःख पाते हैं। जब आत्मा को प्रमाद होता है, तब देह और इन्द्रियाँ अपने आपमें प्रत्यक्ष भासित होती हैं। पर जैसे बालू से तेल नहीं निकलता, आकाश में वन नहीं होता और चन्द्रमा के मण्डल में ताप नहीं होता, वैसे ही आत्मा में देह या इन्द्रियाँ कभी नहीं हैं।
हे राम! ये सब जीव आत्मरूप हैं, इससे इनको देह-इन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं है; परन्तु इनको जो कर्मों में अभिमान होता है इसी से बन्धन में पड़ते हैं। हे राम! जैसे नाव पर बैठे हुए पुरुष को भ्रान्ति से नदीतट के वृक्ष चलने लगते हैं, वैसे ही मन के भ्रम से आत्मा में चित्त और देह इन्द्रियाँ जान पड़ती हैं। वास्तव में चित्त, देह और इन्द्रियाँ कुछ भिन्न वस्तु नहीं। ये भी आत्मस्वरूप ही हैं। तब निषेध किसका कीजिये? हे राम! मन और इन्द्रियादिक को अपनी सत्ता कुछ नहीं, वह भ्रान्ति से भासित होती हैं। जैसे पर्वत पर उज्ज्वल मेघ होता है और उसमें वस्त्रबुद्धि निष्फल होती है, वैसे ही ये देहादिक हैं। इनमें अहंबुद्धि निष्फल है। इससे हे राम! आत्मतत्त्व एक अखण्ड है, द्वैत कुछ नहीं। जब तुम ऐसे विचारोगे तो निरञ्जनरूप होगे। हे राम! ये सब शरीर चित्त के स्फुरण से स्थित हैं। जैसे चित्त के स्फुरण से शरीर है, वैसे ही जीव में चित्त और परमात्मा में जीव है। हे राम! इस प्रकार स्फुरण मात्र दृश्य हुआ तो द्वैत तो कुछ न हुआ। इस प्रकार विचारपूर्वक दृश्यभ्रम को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो। हे राम! ऐसी धारणा करके सुख से बिचरो और जो कुछ चेष्टा नीति से प्राप्त हो, उसको करो, परन्तु उसमें अपने कर्तृत्व का अभिमान न हो।