योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें४४२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
जब अपना अहंभाव दूर होगा, तब स्पन्दन हो अथवा निःस्पन्द हो, समाधि में स्थित हो अथवा राज्य करो, तुमको दोनों तुल्य हो जावेंगे। जब अपनी अभिलाषा दूर होती है, तब जैसी चेष्टा प्राप्त हो, वैसा ही हो, यह स्फुरना भी न स्फुरने के समान है, और एक अद्वैत सत्ता ही भान होगी। जैसे सम्यक्दर्शी को तरङ्ग और मृगजल एक भासित होता है, वैसे ही तुमको भी एक ही भासित होगा। चाहे जीवन्मुक्त हो अथवा विदेहमुक्त हो, समाधिस्थ हो अथवा राज्य करो, तुमको दोनों तुल्य हैं। हे रघुकुल आकाश के चन्द्रमा रामचन्द्र ! जीव को अपनी अभिलाषा ही बन्धन में डालती है। जब अभिलाषा मिटती है, तब कर्म करो अथवा न करो, कुछ बन्धन नहीं; क्योंकि तब मनुष्य करने में भी आत्मा को अक्रिय देखता है और न करने में भी वैसे ही देखता है। उसकी द्वैत भावना निवृत्त हो जाती है, इससे उसे चित्त, देह, इन्द्रियादिक सब पदार्थ आत्मरूप ही भासित होते हैं। हे राम ! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे हृदय का मोह निवृत्त हुआ है, अब तुम जागे हो। यदि कुछ तुमको संशय रहा हो तो फिर प्रश्न करो, जिसका मैं उत्तर दूँगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुखेनयोगोपदेशो नाम शताधिकएकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४८ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! मुझको एक संशय है और उसको भी आप निवृत्त कीजिये। कोई कहते हैं कि बीज से अंकुर होता है और कोई कहते हैं कि अंकुर से बीज होता है। कोई कहते हैं कि जो कुछ करता है सो दैव ही करता है और कोई कहते हैं कि कर्म करते हैं, तब जीव जन्म पाते हैं। कर्म ही से सब कुछ होता है, और किसी के अधीन जीव नहीं है। कोई कहते हैं कि जब देह होती है, तब कर्म करते हैं और कोई कहते हैं कि कर्मों से देह होती है। कोई कहते हैं कि देह से कर्म होते हैं और कोई पुरुषप्रयत्न मानते हैं। सो यथार्थ जो कुछ हो वह कहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक-एक के विषय में मैं तुमको क्या कहूँ। कर्म से दैव और घट से आकाश पर्यन्त जितने क्रिया, कर्म और द्रव्य हैं, ये सब विकल्पजाल भ्रान्तिमात्र हैं। केवल आत्मस्वरूप अपने