भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 444

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४४३

आपमें स्थित है-द्वैत कुछ नहीं है। हे राम! जब संवेदन फुरता है, तब सब कुछ भासित होता है और निःसंवेदन होने पर कुछ नहीं। जैसे शीत, श्वेत आदिक बरफ के दूसरे नाम या पर्याय हैं, वैसे ही कर्म, पुरुष-प्रयत्न आदि सब आत्मा के पर्याय हैं। दैव पुरुष है और पुरुष दैव है। कर्म देह है और देह कर्म है। बीज अंकुर है और अंकुर बीज है। दैव कर्म है और कर्म दैव है और वही पुरुषप्रयत्न है। जो इनमें भेद मानते हैं। वे पढ़-पशु हैं। इन सबका बीज अहंकार है—जब अहंकार हुआ तब सब कुछ सिद्ध हुआ। जैसे बीज से वृक्ष, फल, फूल और डाली होते हैं, पर जो बीज ही न हो तो वृक्ष कैसे उपजे?

हे राम! इनका बीज संवेदन है। अहंकार, संकल्प और संवेदन तीनों पर्याय हैं अर्थात् एक ही हैं। जब फुरना हुआ तब कर्म, देह, दैव सब सिद्ध होते हैं और जब फुरना मिट गया तब कुछ नहीं भासित होता। इसी को ज्ञान-अग्नि से जलाओ, जिससे इसके फूल, फल, टहनी सब जल जावें। यह जो संवेदन फुरता है कि 'मैं हूँ,' यही संसार का बीज है। इसे ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओ। जब अहंकार नष्ट होगा, तब कुछ द्वैत न भासित होगा। हे राम! यह जो प्रपञ्च भासित होता है, इसका बीज संवेदन है और संवेदन का बीज शुद्ध संवित्तत्त्व है। पर उसका बीज और कोई नहीं। हे राम! आदि जो स्पन्दन संवेदन या फुरना हुआ है, उसी का नाम दैव है, क्योंकि वह कर्म से पहले ही फुरता है। फिर जो आगे क्रिया होती है, वह कर्म है। इसी का नाम पुरुषप्रयत्न है। वह जो कर्म से आदि दैवरूप फुरा है, उसका क्या रूप है? इसी का जो पहिला कर्म है, उसी को दैव कहते हैं। इन सबका बीज संवेदन है। हे राम! वह स्वतः पुरुष चिन्मात्रपद एक ही था। जब उससे विकार-संयुक्त उत्थान हुआ, तब प्रपञ्च भासित होने लगा। फिर जब उत्थान का अभाव होगा, तब प्रपञ्च का भी अभाव हो जायगा। हे राम! जब जीव कुछ बनता है तब सब आपदाएँ उसको प्राप्त होती हैं। जैसे सुई वस्त्र में प्रवेश करती है तो उसके पीछे तागा भी चला जाता है—जो सुई प्रवेश न करे तो तागा कहाँ से जावे—वैसे ही जब अहंकार प्रवेश करता