भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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११४ ✻ योगवाशिष्ट ✻

है, तब सब आपदाएँ भी आती हैं, और जब अहंकार निवृत्त होता है, तब सब विश्व आनन्दरूप और अपना रूप भासित होता है। इससे अहंकार का अभाव करो, क्योंकि विश्व भ्रान्ति से सिद्ध है, आगे कुछ हुआ नहीं; सब आत्मरूप है।

हे राम ! विश्व वासनामात्र है। जब वासना नष्ट हो तब परम कल्याण है। जिस प्रकार वासना का क्षय हो, वही युक्ति श्रेष्ठ है। जब युक्ति से वासना का क्षय होगा तब चेष्टा भी होगी, परन्तु फिर जन्म का कारण न होगी। हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य दीखती है, परन्तु ज्ञानी का संकल्प दग्ध बीज सा है-फिर जन्म नहीं देता और अज्ञानी का संकल्प कच्चे बीज सा है-फिर जन्म देता है। पर वास्तव में देखिये तो न कोई जन्म ही पाता है और न कोई मृतक होता है, सब जीव केवल अपने आपमें स्थित हैं। भ्रान्ति से भिन्न-भिन्न भासित होते हैं। स्वरूप से सब अपना ही आप है—द्वैत कुछ नहीं हुआ। जो देख पड़ता है, वह मिथ्या है। जैसे केले के खंभे में सार कुछ नहीं होता, वैसे ही सब प्रपञ्च मिथ्या है, इसमें सार कुछ नहीं—इससे इसकी वासना त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित होओ। हे राम ! जिस प्रकार तुम्हारी वासना निर्मूल हो, उसी यत्न से निर्मूल करो। तब परम शिवपद ही शेष रहेगा। हे राम ! पुरुषप्रयत्न से जब निरहंकार होगे, तब वासना आप ही क्षय हो जावेगी। वासनाक्षय का उपाय अपने पुरुषप्रयत्न के सिवा और कोई नहीं। इससे हे राम ! पुरुषार्थ करके इसी एक देव के परा-यण हो रहो। वही पुरुष कर्म, देव आदिक भासित होता है। हे राम ! इस प्रकार विचारपूर्वक सब एषणाओं को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो जाओ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे निरोशयोगोपदेशो नाम शताधिकनवचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञानवान् की बुद्धि निर्मल हो जाती है। उसके हृदय में शांति होती है। उसकी बुद्धि चैतन्य से पूर्ण होती है और दूसरा भान उठ जाता है। इससे तुम भी नित्य अन्तर्मुख और