भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 446

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ४१५

बीतराग निवासी हो रहो और चिन्मात्र, निर्मल, शान्तरूप सर्वब्रह्म की भावना करो। उस ब्रह्मपद को पाकर नीति के अनुसार अज्ञानी के समान चेष्टा करो। जो हर्ष का स्थान हो उसमें हर्ष करो और शोक के स्थान में शोक करो; पर हृदय में आकाश की तरह निर्लिप्त रहो। हे राम ! जब इष्ट की प्राप्ति हो तो उसका स्पर्श करो, परन्तु हृदय में उसकी तृष्णा न करो। जब युद्ध प्राप्त हो, तब शूरमा होकर युद्ध करो, जो दीन हो उस पर दया करो; जो राज्य प्राप्त हो तो उसको भोगो और जो कोई कष्ट प्राप्त हो तो उसको भी भोगो। ये सब चेष्टाएँ अज्ञानी की तरह करो, पर हृदय में समता रखो; आत्मा से भिन्न कुछ न फुरने दो और रागद्वेष से रहित सदा निर्मल रहो। जब तुम ऐसे निश्चय को धारण करोगे, तब तुमको कुछ खेद न होगा। चाहे बड़ा दारुण दुःख पड़े और इन्द्र का वज्र ऊपर पड़े तो भी तुमको वह स्पर्श न करेगा। हे राम ! तुम्हारा रूप न शस्त्र से कटता है, न अग्नि से जलता है, न जल से गलता है और न पवन से सूखता है-वह केवल निराकार, अजर, अमर और सबका अपना रूप है। हे राम ! कष्ट तब होता है, जब विलक्षण वस्तु होती है और अग्नि तब जलती है जब काष्ठ आदिक भिन्न वस्तु होती हैं। अग्नि को अग्नि तो नहीं जलाती और जल को जल तो नहीं गलाता ? इससे तुम अपने रूप में स्थित हो रहो।

हे राम ! संवितरूप आलय ( घर ) सा स्थिर स्थान है, उसी में स्थित हो रहो-जैसे पक्षी सब ओर से संकल्प को त्यागकर आलय (झोंफ) में जब स्थित होता है, तब सुख पाता है, वैसे ही जब तुम सब कलना को त्यागकर अन्तर्मुख संवित् में स्थित होगे; तब रागद्वेष-रूपी कोई द्वन्द्व न रहेगा। हे राम ! संसाररूपी समुद्र का बड़ा प्रवाह है। आश्रय बिना कोई उससे नहीं निकल सकता। वह आश्रय मैं तुमसे कहता हूँ। तुम अनुभवरूप आत्मा का आश्रय लेकर संसारसमुद्र के पार हो जाओ; विलम्ब न करो और अपने आपमें स्थित होओ। हे राम ! यदि कोई संसाररूपी वृक्ष का अन्त जानना चाहे तो नहीं जान सकता। संसार एक वृक्ष है। उसमें चैतन्यमात्र सुगन्ध है। वह तुम्हारा अपना