योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
४४२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
जब अपना अहंभाव दूर होगा, तब स्पन्दन हो अथवा निःस्पन्द हो, समाधि में स्थित हो अथवा राज्य करो, तुमको दोनों तुल्य हो जावेंगे। जब अपनी अभिलाषा दूर होती है, तब जैसी चेष्टा प्राप्त हो, वैसा ही हो, यह स्फुरना भी न स्फुरने के समान है, और एक अद्वैत सत्ता ही भान होगी। जैसे सम्यक्दर्शी को तरङ्ग और मृगजल एक भासित होता है, वैसे ही तुमको भी एक ही भासित होगा। चाहे जीवन्मुक्त हो अथवा विदेहमुक्त हो, समाधिस्थ हो अथवा राज्य करो, तुमको दोनों तुल्य हैं। हे रघुकुल आकाश के चन्द्रमा रामचन्द्र ! जीव को अपनी अभिलाषा ही बन्धन में डालती है। जब अभिलाषा मिटती है, तब कर्म करो अथवा न करो, कुछ बन्धन नहीं; क्योंकि तब मनुष्य करने में भी आत्मा को अक्रिय देखता है और न करने में भी वैसे ही देखता है। उसकी द्वैत भावना निवृत्त हो जाती है, इससे उसे चित्त, देह, इन्द्रियादिक सब पदार्थ आत्मरूप ही भासित होते हैं। हे राम ! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे हृदय का मोह निवृत्त हुआ है, अब तुम जागे हो। यदि कुछ तुमको संशय रहा हो तो फिर प्रश्न करो, जिसका मैं उत्तर दूँगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुखेनयोगोपदेशो नाम शताधिकएकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४८ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! मुझको एक संशय है और उसको भी आप निवृत्त कीजिये। कोई कहते हैं कि बीज से अंकुर होता है और कोई कहते हैं कि अंकुर से बीज होता है। कोई कहते हैं कि जो कुछ करता है सो दैव ही करता है और कोई कहते हैं कि कर्म करते हैं, तब जीव जन्म पाते हैं। कर्म ही से सब कुछ होता है, और किसी के अधीन जीव नहीं है। कोई कहते हैं कि जब देह होती है, तब कर्म करते हैं और कोई कहते हैं कि कर्मों से देह होती है। कोई कहते हैं कि देह से कर्म होते हैं और कोई पुरुषप्रयत्न मानते हैं। सो यथार्थ जो कुछ हो वह कहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक-एक के विषय में मैं तुमको क्या कहूँ। कर्म से दैव और घट से आकाश पर्यन्त जितने क्रिया, कर्म और द्रव्य हैं, ये सब विकल्पजाल भ्रान्तिमात्र हैं। केवल आत्मस्वरूप अपने
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४४३
आपमें स्थित है-द्वैत कुछ नहीं है। हे राम! जब संवेदन फुरता है, तब सब कुछ भासित होता है और निःसंवेदन होने पर कुछ नहीं। जैसे शीत, श्वेत आदिक बरफ के दूसरे नाम या पर्याय हैं, वैसे ही कर्म, पुरुष-प्रयत्न आदि सब आत्मा के पर्याय हैं। दैव पुरुष है और पुरुष दैव है। कर्म देह है और देह कर्म है। बीज अंकुर है और अंकुर बीज है। दैव कर्म है और कर्म दैव है और वही पुरुषप्रयत्न है। जो इनमें भेद मानते हैं। वे पढ़-पशु हैं। इन सबका बीज अहंकार है—जब अहंकार हुआ तब सब कुछ सिद्ध हुआ। जैसे बीज से वृक्ष, फल, फूल और डाली होते हैं, पर जो बीज ही न हो तो वृक्ष कैसे उपजे?
हे राम! इनका बीज संवेदन है। अहंकार, संकल्प और संवेदन तीनों पर्याय हैं अर्थात् एक ही हैं। जब फुरना हुआ तब कर्म, देह, दैव सब सिद्ध होते हैं और जब फुरना मिट गया तब कुछ नहीं भासित होता। इसी को ज्ञान-अग्नि से जलाओ, जिससे इसके फूल, फल, टहनी सब जल जावें। यह जो संवेदन फुरता है कि 'मैं हूँ,' यही संसार का बीज है। इसे ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओ। जब अहंकार नष्ट होगा, तब कुछ द्वैत न भासित होगा। हे राम! यह जो प्रपञ्च भासित होता है, इसका बीज संवेदन है और संवेदन का बीज शुद्ध संवित्तत्त्व है। पर उसका बीज और कोई नहीं। हे राम! आदि जो स्पन्दन संवेदन या फुरना हुआ है, उसी का नाम दैव है, क्योंकि वह कर्म से पहले ही फुरता है। फिर जो आगे क्रिया होती है, वह कर्म है। इसी का नाम पुरुषप्रयत्न है। वह जो कर्म से आदि दैवरूप फुरा है, उसका क्या रूप है? इसी का जो पहिला कर्म है, उसी को दैव कहते हैं। इन सबका बीज संवेदन है। हे राम! वह स्वतः पुरुष चिन्मात्रपद एक ही था। जब उससे विकार-संयुक्त उत्थान हुआ, तब प्रपञ्च भासित होने लगा। फिर जब उत्थान का अभाव होगा, तब प्रपञ्च का भी अभाव हो जायगा। हे राम! जब जीव कुछ बनता है तब सब आपदाएँ उसको प्राप्त होती हैं। जैसे सुई वस्त्र में प्रवेश करती है तो उसके पीछे तागा भी चला जाता है—जो सुई प्रवेश न करे तो तागा कहाँ से जावे—वैसे ही जब अहंकार प्रवेश करता
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है, तब सब आपदाएँ भी आती हैं, और जब अहंकार निवृत्त होता है, तब सब विश्व आनन्दरूप और अपना रूप भासित होता है। इससे अहंकार का अभाव करो, क्योंकि विश्व भ्रान्ति से सिद्ध है, आगे कुछ हुआ नहीं; सब आत्मरूप है।
हे राम ! विश्व वासनामात्र है। जब वासना नष्ट हो तब परम कल्याण है। जिस प्रकार वासना का क्षय हो, वही युक्ति श्रेष्ठ है। जब युक्ति से वासना का क्षय होगा तब चेष्टा भी होगी, परन्तु फिर जन्म का कारण न होगी। हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य दीखती है, परन्तु ज्ञानी का संकल्प दग्ध बीज सा है-फिर जन्म नहीं देता और अज्ञानी का संकल्प कच्चे बीज सा है-फिर जन्म देता है। पर वास्तव में देखिये तो न कोई जन्म ही पाता है और न कोई मृतक होता है, सब जीव केवल अपने आपमें स्थित हैं। भ्रान्ति से भिन्न-भिन्न भासित होते हैं। स्वरूप से सब अपना ही आप है—द्वैत कुछ नहीं हुआ। जो देख पड़ता है, वह मिथ्या है। जैसे केले के खंभे में सार कुछ नहीं होता, वैसे ही सब प्रपञ्च मिथ्या है, इसमें सार कुछ नहीं—इससे इसकी वासना त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित होओ। हे राम ! जिस प्रकार तुम्हारी वासना निर्मूल हो, उसी यत्न से निर्मूल करो। तब परम शिवपद ही शेष रहेगा। हे राम ! पुरुषप्रयत्न से जब निरहंकार होगे, तब वासना आप ही क्षय हो जावेगी। वासनाक्षय का उपाय अपने पुरुषप्रयत्न के सिवा और कोई नहीं। इससे हे राम ! पुरुषार्थ करके इसी एक देव के परा-यण हो रहो। वही पुरुष कर्म, देव आदिक भासित होता है। हे राम ! इस प्रकार विचारपूर्वक सब एषणाओं को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे निरोशयोगोपदेशो नाम शताधिकनवचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञानवान् की बुद्धि निर्मल हो जाती है। उसके हृदय में शांति होती है। उसकी बुद्धि चैतन्य से पूर्ण होती है और दूसरा भान उठ जाता है। इससे तुम भी नित्य अन्तर्मुख और
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बीतराग निवासी हो रहो और चिन्मात्र, निर्मल, शान्तरूप सर्वब्रह्म की भावना करो। उस ब्रह्मपद को पाकर नीति के अनुसार अज्ञानी के समान चेष्टा करो। जो हर्ष का स्थान हो उसमें हर्ष करो और शोक के स्थान में शोक करो; पर हृदय में आकाश की तरह निर्लिप्त रहो। हे राम ! जब इष्ट की प्राप्ति हो तो उसका स्पर्श करो, परन्तु हृदय में उसकी तृष्णा न करो। जब युद्ध प्राप्त हो, तब शूरमा होकर युद्ध करो, जो दीन हो उस पर दया करो; जो राज्य प्राप्त हो तो उसको भोगो और जो कोई कष्ट प्राप्त हो तो उसको भी भोगो। ये सब चेष्टाएँ अज्ञानी की तरह करो, पर हृदय में समता रखो; आत्मा से भिन्न कुछ न फुरने दो और रागद्वेष से रहित सदा निर्मल रहो। जब तुम ऐसे निश्चय को धारण करोगे, तब तुमको कुछ खेद न होगा। चाहे बड़ा दारुण दुःख पड़े और इन्द्र का वज्र ऊपर पड़े तो भी तुमको वह स्पर्श न करेगा। हे राम ! तुम्हारा रूप न शस्त्र से कटता है, न अग्नि से जलता है, न जल से गलता है और न पवन से सूखता है-वह केवल निराकार, अजर, अमर और सबका अपना रूप है। हे राम ! कष्ट तब होता है, जब विलक्षण वस्तु होती है और अग्नि तब जलती है जब काष्ठ आदिक भिन्न वस्तु होती हैं। अग्नि को अग्नि तो नहीं जलाती और जल को जल तो नहीं गलाता ? इससे तुम अपने रूप में स्थित हो रहो।
हे राम ! संवितरूप आलय ( घर ) सा स्थिर स्थान है, उसी में स्थित हो रहो-जैसे पक्षी सब ओर से संकल्प को त्यागकर आलय (झोंफ) में जब स्थित होता है, तब सुख पाता है, वैसे ही जब तुम सब कलना को त्यागकर अन्तर्मुख संवित् में स्थित होगे; तब रागद्वेष-रूपी कोई द्वन्द्व न रहेगा। हे राम ! संसाररूपी समुद्र का बड़ा प्रवाह है। आश्रय बिना कोई उससे नहीं निकल सकता। वह आश्रय मैं तुमसे कहता हूँ। तुम अनुभवरूप आत्मा का आश्रय लेकर संसारसमुद्र के पार हो जाओ; विलम्ब न करो और अपने आपमें स्थित होओ। हे राम ! यदि कोई संसाररूपी वृक्ष का अन्त जानना चाहे तो नहीं जान सकता। संसार एक वृक्ष है। उसमें चैतन्यमात्र सुगन्ध है। वह तुम्हारा अपना
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रूप है । उसको ग्रहण करो । जो सबका अधिष्ठान है, उसको जब ग्रहण किया, तब सबको ग्रहण किया । हे राम ! जो कुछ प्रपञ्च तुमको दिखता है, वह सब आत्मरूप है-उसी की भावना करो, जाग्रत् में सुषुप्त हो रहो और सुषुप्त में जाग्रत् रहो । संसार की सत्ता जाग्रत् है । उसकी ओर से सुषुप्त रहो; अर्थात् वासना से रहित होकर तुरीयपद में स्थित रहो, जहाँ गुणों का क्षोभ नहीं और निर्मल शान्तरूप है, जहाँ एक और दो की कलना नहीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो ऐसे शान्तरूप तुरीयपद में स्थित होना तुमने कहा, तो क्या तुममें यह भाव नहीं उठता कि मैं वशिष्ठ हूँ ? उसका रूप क्या है जिससे अहं-प्रतीति तुमको नहीं होती ?
इतना कह वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब इस प्रकार राम ने प्रश्न किया तब वशिष्ठजी चुप हो गये और सब सभा संशय के समुद्र में मग्न हो गई । तब राम बोले, हे भगवन् ! चुप होना तुम्हारे योग्य नहीं है । तुम साक्षात् विश्वगुरु और ब्रह्मवेत्ता हो । ऐसी कौन बात है जो तुमको न ज्ञात हो ? क्या मुझको उसके जानने का अधिकारी नहीं देखते ? जब ऐसे रामजी ने कहा, तब वशिष्ठजी एक घड़ी के उपरान्त बोले, हे राम ! असामर्थ्य से मैं चुप नहीं हुआ । परन्तु जो तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है, वही दिया । तुम्हारे प्रश्न का उत्तर चुप्पी ही है । जो प्रश्न करनेवाला अज्ञानी हो तो उसको अज्ञान लेकर उत्तर देते हैं और जो ज्ञानवान् हो तो उसको ज्ञान से उत्तर देते हैं । पहले तुम अज्ञानी थे, तब मैं सविकल्प उत्तर देता था । अब तुम ज्ञानवान् हो । तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मौन ही है । हे राम ! जो कुछ कहना है, वह प्रतियोगी से मिला हुआ है । प्रतियोगी बिना शब्द के मैं कैसे कहूँ ? पहले तुम सविकल्प शब्द के अधिकारी थे और अब तुमको निर्विकल्प का उपदेश किया है । हे राम ! शब्द चार प्रकार के हैं-एक सूक्ष्म अर्थ का, दूसरा परमार्थ का, तीसरा अल्प और चौथा दीर्घ । तीन कलङ्क इनमें रहते हैं-एक संशय, दूसरा प्रतियोगी और तीसरा भेद । जैसे सूर्य की किरणों में त्रसरेणु रहते हैं, वैसे ही शब्द में कलङ्क रहते
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४४७
है । पर जो पद मन और वाणी से अतीत है, उसको कलङ्कित शब्द कैसे ग्रहण करे ?
हे राम ! काष्ठमौन उसको कहते हैं, जहाँ इन्द्रियाँ न फुरें, न मन फुरे और कोई स्फुरण न हो—ऐसे पद को मैं वाणी से कैसे कहूँ ? जो कुछ बोला जाता है, वह सविकल्प होता है—तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर मौन ही है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि बोलना सविकल्प और प्रतियोगी सहित होता है तो जो कुछ ब्रह्म में दूषण है उसका निषेध करके कहो । मैं प्रतियोगी को न विचारूँगा । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मैं चिदाकाशस्वरूप, चैत्य से रहित चिन्मात्र शान्तरूप, सम और सर्वकल्पना से रहित केवल आत्मत्वमात्र हूँ । और तुम और जगत् भी चिदाकाश है, अहं त्वं कोई नहीं, क्योंकि दूसरी सत्ता कोई नहीं ! सब अहंसंवेदन से रहित शुद्ध चिदाकाश है । यदि सापेक्षक अहं-अहं फुरता है और मोक्ष की भी इच्छा होती है तो सिद्ध नहीं होती, क्योंकि अपने को कुछ मानकर फुरती है; इसलिए एक अहंकार के कई अहंकार हो जाते हैं । यही अहं की फाँसी गले में पड़ती है । जब अहन्ता से रहित हो, तब आत्मपद को प्राप्त हो । हे राम ! जब शव की तरह हो जावे और कुछ अभिमान न उठे, तब संसारसमुद्र से पार हो । जब तक द्वैत है, तबतक बन्धन है, कभी मुक्त नहीं हो सकता । जैसे जन्म का अन्धा चित्र की पुतली को नहीं देख सकता, वैसे ही अहंता से युक्त मुक्ति नहीं पाता । जब अहन्ता का अभाव हो तब कल्याण हो—स्वरूप के ऊपर अहन्ता का ही आवरण है ।
हे राम ! जब जीव चेतन होकर उपजा तब उसको बन्धन पड़ा । और जब जड़-संवेदनशून्य हो, तब कल्याण हो । जब चैतन्योन्मुखत्व होता है, तब जीव होता है । मनुष्य का शरीर पाकर जब चैत्य से रहित शुद्ध चैतन्य प्रत्यक् आत्मा में स्थित होता है, तब मनुष्यजन्म सफल होता है । मनुष्यजन्म पाकर पाने योग्य पद पा सकता है । हे राम ! यदि मनुष्य जन्म को पाकर आत्मतत्त्व को न जानेगा तो और किस जन्म में जानेगा ? यह संसार चित्त के फुरने से उत्पन्न हुआ है;
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जब चित्त संसरण से रहित हो, तब केवल केवलीभाव स्वरूप भासित हो । ज्ञानवान् की दृष्टि में अब भी कुछ नहीं हुआ, केवल आत्मस्वरूप ही भासित होता है, और फुरना और न फुरना दोनों तुल्य दिखाई देते हैं । अन्तःकरण चतुष्टय आत्मस्वरूप है और अज्ञानी को भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, इसी से चित्त आदिक जड़ और मिथ्या हैं । आत्मस्वरूप से सब आत्मस्वरूप है । आत्मा, देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है—ज्ञानी को सब आत्मा ही दिखता है । वह चाहे कैसी ही चेष्टा करे, वह लोक, धन, पुत्र आदि सब एषणाओं से रहित, केवल आत्म अनुभवरूप में स्थित है और सबको अपना रूप जानता है ।
हे राम ! जिस पद को वह प्राप्त होता है, उस पद को वाणी नहीं कह सकती । वह अनिर्वाच्यपद है । जो पुरुष कहता है कि "अहं ब्रह्म अस्मि" अर्थात् मैं ब्रह्म हूँ और यह जगत् है तो जानिये कि उसको ज्ञान नहीं उपजा—उसको शास्त्रश्रवण का अधिकार है । जैसे कोई कहे कि मेरे हाथ में दीपक है और अन्धकार भी मुझको देख पड़ता है तो जानिये कि इसके हाथ में दीपक नहीं, वैसे ही जबतक जगत् भासित होता है, तबतक ज्ञान नहीं उपजा । हे राम ! अब भी निर्वाणपद है किससे किसको कौन उपदेश करे ? केवल एकरस शून्य है; शून्य और आत्मा में कुछ भेद नहीं । और जो कुछ भेद है उसको ज्ञानवान् जानते हैं, वहाँ वाणी की गति नहीं । उसमें जो संवेदन फुरता है, उससे संसार उपजता है और असंवेदन से लीन होता है । जैसे पवन से अग्नि प्रज्वलित होती है और पवन ही में लीन होती या बुझती है, वैसे ही जब संवेदन बहिर्मुख जगता है, तब संसार भासित होता है और जब अन्तर्मुख होता है तब जगत् लीन हो जाता है—इससे संसार स्फुरणमात्र है । जैसे आकाश में नीलापन भ्रम से दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत् की रचना नहीं हुई केवल ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों है—उसी में स्थित होओ । जब उसमें स्थित होगे, तब भेद मिट जावेगा । हे राम ! तब ग्राह्य और ग्राहक सम्बन्ध भी जाता रहेगा और केवल शुद्ध,
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४४६
अजर और अमर परमात्मतत्त्व में खाते-पीते, चलते-फिरते वृत्ति रहेगी।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे भावनाप्रतिपादनोपदेशो नाम शताधिकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार पुरुष आत्मपद को प्राप्त होता है सो सुनो ! जब निरहंकार होता है, तब आत्मपद को प्राप्त होता है। जो सर्वात्मा है, उसका आवरण करनेवाली अविद्या ही है। जैसे सूर्य-मण्डल को बादल ढक लेता है, वैसे ही अविद्या आत्मा का आवरण करती है। उस अविद्या से मूर्ख उन्मत्त की तरह चेष्टा करते हैं, और जो अहंता से रहित ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको कोई दुःख नहीं स्पर्श करता—वह सदेह भी दुःख शून्य होता है। जैसे भीत पर लिखी युद्ध की सेना देखने भर को क्षुब्ध दिखती है; परन्तु शान्तरूप होती है, वैसे ही ज्ञान-वान् की चेष्टा में भी क्षोभ दिखता है, परन्तु वह सदा अक्षोभ और निर्वाणरूप है। वह वासनासहित देख पड़ता है, पर सदा निर्वा-सनिक है। जैसे जल में लहर और चक्कर के क्षोभ दिखते हैं, परन्तु वे जल से भिन्न नहीं होते, वैसे ही ज्ञानवान् को ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं भासित होता। जिसके हृदय से दृश्यभाव शान्त हो गया है, पर बाहर में क्षोभ दिखता है, तो भी वह मुक्तरूप है। जैसे बादल आकाश में हाथी, घोड़ा और पहाड़ के रूप में दिखते हैं, परन्तु हैं कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् दिखता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं है। अहंकार से भाषित होता है और अहंकार से रहित होने पर निर्विकार शान्तरूप हो जाता है। ऐसा जो निरहंकार आत्मपद है, उसको पाकर ज्ञानवान् शोभित होता है। शरत्काल का आकाश, क्षारसमुद्र और पूर्णमासी का चन्द्रमा भी ऐसा नहीं शोभा पाता, जैसा ज्ञानवान् पुरुष शोभा पाता है। हे राम ! अहन्ता ही इस पुरुष का मैल है। जब अहन्ता नष्ट हो, तब स्वरूप की प्राप्ति हो और संसार के पदार्थों की भावना निवृत्त हो; क्योंकि वह भ्रम से उपजी थी। जो वस्तु भ्रम से उपजी होती है, उसका भ्रम का अभाव होने पर अभाव हो जाता है। जैसे आकाश में धुएँ का बादल नाना प्रकार के आकार में दिखता है पर वे आकार हैं नहीं,
४५० ❊ योगवाशिष्ट ❊
वैसे ही यह विश्व अस्तित्व के बिना भी भासित होता है और विचार करने से नहीं रहता ।
हे राम ! जब तक संसार की वासना है, तब तक बन्धन है । जब वासना निवृत्त हो, तब आत्मपद की प्राप्ति हो, सम्पूर्ण कलना मिट जावे और इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट में तुल्य बुद्धि हो । तब वह यद्यपि व्यवहारकर्ता हो, तो भी शान्तरूप है । जैसे शव को रागद्वेष नहीं उत्पन्न होता, वैसे ही ज्ञानी निर्वाण पद को प्राप्त होता है, जिसमें सत् या असत् शब्द कोई नहीं, केवल ब्रह्मस्वरूप है । बल्कि ब्रह्म कहना भी वहाँ नहीं रहता, केवल अद्वैत आत्मतत्त्वमात्र है । हे राम ! विश्व भी वही चैतन्य आकाश रूप है । जैसी-जैसी भावना होती है, वैसा ही वैसा चैतन्य होकर भासित होता है । जब जगत् की भावना होती है, तब नाना प्रकार के आकार दीखते हैं और ब्रह्म की भावना से ब्रह्म भासित होता है । जैसे विष में यदि अमृत की भावना होती है और उसे विधिपूर्वक खाते हैं तो वह विष भी अमृत हो जाता है, और जो विधि बिना खाइये तो मृत्यु का कारण होता है, वैसे ही इस संसार को यदि विधि-संयुक्त देखिये अर्थात् विचार करके देखिये तो ब्रह्मस्वरूप भासित होता है और जो विचार बिना देखिये तो जगत् रूप भासित होता है । पर विचार तब होता है, जब अहंकार निवृत्त होता है । अहंकार आकाश में उपजा है, आकाश शून्यता में उपजा है और शून्यता आत्मा के प्रमाद से उपजी है । फिर अहंकार मे जगत् हुआ है और अहंकार मिथ्या है ।
हे राम ! शरीर से चित्तपर्यन्त विचारकर देखिये तो कहीं नहीं देख पड़ते । इनमें जो अहंप्रत्यय है, वह भ्रान्तिमात्र है । जब तुम विचार करके देखोगे तब मरीचिका के जल सदृश वह प्रतीत होगा । हे राम ! जैसे स्वप्न के पर्वत को त्यागने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वैसे ही मिथ्या संसार को त्यागने में कुछ यत्न नहीं—फिर इसका निर्णय क्या कीजिये ? जैसे बन्ध्या के पुत्र की वाणी को विचारिये कि यह सत्य कहता है या असत्य कहता है तो वह मिथ्या कल्पना है—क्योंकि बन्ध्या के पुत्र है ही नहीं, तब उसका विचार क्या करिये, वैसे ही यह
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४५१
प्रपञ्च है नहीं, तब इसका निर्णय क्या कीजिये ? इससे तुम ऐसे ही रहो, जैसा मैं कहता हूँ, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी । हे राम ! ऐसी भावना करो कि न मैं हूँ और न जगत् है । जब अहंकार ही न रहा, तब कलना कहाँ से हो । इसका होना ही अनर्थ है । जब ऐसा विचार उत्पन्न होता है, तब भोगों की वासना का क्षय हो जाता है और सन्तों की संगति होती है—अन्यथा भोग की वासना नष्ट नहीं होती । हे राम ! जब तक अहंता उठती है अर्थात् दृश्य और प्रकृति से मिलाप है, तब तक द्वैतभ्रम नहीं मिटता, और जब अहंकार का उत्थान मिट जायगा, तब शुद्ध चिन्मात्र आत्मसत्ता ही रहेगी ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हंससंन्यासयोगो नाम शताधिकैकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब अहन्ता का उत्थान होता है, तब स्वरूप का आवरण होता है और जब अहन्ता मिट जाती है तब स्वरूप की प्राप्ति होती है । इस संसार का बीज अहंता ही है । जब अहंकार ही मिथ्या है, तब उसका कार्य कैसे सत्य हो ? जब प्रपञ्च मिथ्या हुआ तो पदार्थ कहाँ से सत्य हों ? हे राम, ऐसा जो ब्रह्म है, उसके पाने की युक्ति क्या है ? संकल्पपुरुष भी असत्य है; उसका संशय भी मिथ्या है और जिसके प्रति प्रश्न करता है, वह भी मिथ्या है । जैसे स्वप्न में जो द्वैतकलना होती है वह असत् है वैसे ही यह जगत् का द्वैत भी असत्य है । हे राम ! यह सब जगत् इस आत्मरूप आकाश के भीतर स्थित है और प्रमाद से बाहर भासित होता है । यह अपना ही स्वप्न दिखता है, जो भीतर की सृष्टि बाह्य भासित होती है । इससे यह सब जगत् चितरूप है—उससे भिन्न कुछ नहीं है । यह चैतन्यसत्ता आकाश से भी अतिसूक्ष्म और स्वच्छ है । हे राम ! यह जगत् चित्त ने चेता है इससे कहीं हुआ नहीं । न किसी का नाश होता है, न कोई उत्पन्न होता है, न कहीं जन्म है और न मरण है—सब ब्रह्म ही है ।
हे राम ! जगत् का नाश होने पर कुछ नष्ट नहीं होता, क्योंकि कुछ हुआ ही नहीं था । जैसे स्वप्न के पहाड़ और संकल्पपुर नष्ट हुए तो
४५२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
क्या नष्ट हुए, वे तो कुछ उपजे ही न थे, वैसे ही इस जगत् के विषय में भी जानो । यह विचार करके देखा है कि जो वस्तु अविचार से उपजी होती है, वह विचार करने मे नहीं रहती । जैसे जो पदार्थ तम से उपजा होता है, वह प्रकाश होने से नहीं रहता, वैसे ही यह जगत् अविचार से भासित होता है और विचार करने से इसका नाश हो जाता है । हे राम ! यह जगत् संकल्पमात्र है—जैसे संकल्पनगर होता है, वैसे ही यह संसार है । इसमें कोई पदार्थ सत्य नहीं । इस कारण रूप, इन्द्रिय और मन के अभाव का चिन्तन करना । यह संसार ऐसा है, जैसे समुद्र में पानी की भँवर । इसमें प्रीति करना अज्ञान है । हे राम ! कोई ऐसे हैं कि बाहर से शान्तरूप दीखते हैं, पर उनके हृदय में क्षोभ होता है और कोई पुरुष ऐसे हैं कि हृदय मे शीतल हैं और बाहर नाना प्रकार की चेष्टा करते हैं । पर जिनके दोनों भाव मिट जाते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं, उनके भीतर और बाहर एकता होती है—जैसे समुद्र में घट भर के रखिये तो उसके भीतर बाहर जल ही होता है । हे राम ! जिस पुरुष ने आत्मा को वास्तव रूप में ज्यों का त्यों जाना है, उसको भय, शोक और मोह नहीं होता । वह केवल स्वच्छ रूप शान्त आत्मा में स्थित है । भय तब होता है, जब दूसरा भासित होता है । उसके मन में तो सब द्वैत का अभाव होता है और वह शान्तरूप होता है ।
हे राम ! सम्यग्दर्शी को जगत् दुःख नहीं देता, पर असम्यग्दर्शी को दुःख देता है । जैसे रस्सी को जो जानता है, उसको रस्सी ही जान पड़ती है, और जो नहीं जानता, उसको सर्प दिखता है और वह भय पाता है, वैसे ही जिसको आत्मा का साक्षात्कार हो गया है, उसको जगत् की कोई कल्पना नहीं भासित होती, केवल अधिष्ठानरूप चिदानन्द ब्रह्म भासित होता है । और जिसको अधिष्ठान का अज्ञान है, उसको जगत् द्वैतरूप होकर भासित होता है और वह रागद्वेष में दग्ध होता है । हे राम ! जगत् और कुछ नहीं है । इसके अनुभव में ही जगत् की कल्पना होती है, और अज्ञान से द्वैतरूप भासित होता है । पर जब जीव अपनी स्वभावसत्ता में जागता है, तब सब उसे अपना
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ही रूप भासित होता है। जैसे स्वप्न में अपना रूप ही द्वैतरूप होकर दिखता है और रागद्वेष उपजता है, पर जब जागता है तब सब आत्म-रूप भासित होता है, वैसे ही यह जगत् है। इस जगत् का निमित्त कारण और उपादान कारण कोई नहीं है। जो पदार्थ कारण बिना भासित हो, उसे असत् जानिये। वह वास्तव में उपजा नहीं, भ्रम से सिद्ध है। जैसे स्वप्नसृष्टि अकारण है, वैसे ही जगत् अकारण है और भ्रम से भासित होता है। हे राम! शास्त्र की युक्ति से विचार करके देखो तो द्वैतभ्रम मिट जाय। रज्जूभर भी कुछ बना नहीं। जैसे आकाश में नीलापन नहीं है और मरुस्थल में नदी नहीं है, वैसे ही इस जगत् को भी जानो। आत्मा शुद्ध और अद्वैत है। उसमें अहं का उठना ही दुःख और सभी दुःखों का कारण है। जो स्वरूप का प्रमाद न हो तो अहं भी दुःख का कारण नहीं होता, और जो स्वरूप भूला तो विष की बेलि अहंकारादिक दृश्य बढ़ते जाते हैं और नाना प्रकार के आकार धारण करते हैं। तब वासना दृढ होती है। जब तक वासना होती है तब तक बन्धन है। जब वासना निवृत्त हो, तभी कल्याण होता है।
हे राम! जीव जिस दृश्य की भावना करता है, वही देख पाता है। जैसे समुद्र में तरङ्ग और चक्र जो होते हैं, वे समुद्र से भिन्न नहीं होते, वैसे ही अहंकार आदिक जो दृश्य हैं, वे हैं नहीं। और जब हैं नहीं तो उनकी इच्छा करना मूर्खता है। ज्ञानवान् की वासना क्षीण हो जाती है और उसके बन्धन का कारण नहीं होती, क्योंकि संसार की सत्यता उसके हृदय में नहीं रहती। क्योंकि आत्मा का साक्षात्कार उसे हो जाता है। जब आत्मा का प्रमाद होता है, तब अहन्ता उदय होती है और दृश्य भासित होता है। जैसे नेत्र के खोलने से दृश्य का ग्रहण होता है और नेत्र मूँद लेने पर दृश्यरूप का अभाव हो जाता है, वैसे ही जब अहन्ता उदय होती है तब दृश्य भी होता है और जब अहन्ता नष्ट होती है, तब संसार का अभाव हो जाता है। हे राम! अहन्ता का उदय होना ही अज्ञान है और अहन्ता से ही बन्धन है। अहन्ता से रहित होना मोक्ष है—आगे जो इच्छा तुम्हारी हो, सो करो।
४५४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
हे राम ! देह, इन्द्रियादिक मृगतृष्णा के जल सदृश हैं; इनमें अहन्ता करना मूर्खता है । ज्ञानवान् अहन्ता को त्यागकर आत्मपद में स्थित होता है, और संसार के इष्ट-अनिष्ट में हर्ष या शोक उसे नहीं होते । जैसे आकाश में बादल होने पर भी वह ज्यों का त्यों है; वैसे ही ज्ञानी ज्यों का त्यों है । उसमें अहंकार नहीं होता, इससे वह सुखरूप है । हे राम ! रूप, दृश्य, इन्द्रियाँ और मन उसके जाते रहते हैं । जैसे वन्ध्या के पुत्र का नृत्य नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी के रूप, अवलोक, मनस्कार नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि उसको सब ब्रह्म भासित होता है और उसकी द्वैत भावना नष्ट हो जाती है । संसार का बीज अहन्ता अज्ञानियों में दृढ़ होती है । हे राम ! अहन्ता से जीव की बुद्धि बुरी अर्थात् स्थूल हो जाती है । इससे वह दुःख पाता है । इस दुःख के नाश का उपाय यह है कि सन्तजनों के वचनों की भावना और विचार करके हृदय में धारणा करे—इससे अहन्तारूपी दुःख नष्ट हो जाता है । सन्तों के वचनों का निषेध करना मुक्तिफल का नाश करनेवाला और अहन्तारूपी पिशाच को उपजानेवाला है, इसलिए सन्तों की शरण में जाओ और अहन्ता को दूर करो । इसमें कुछ कष्ट नहीं; यह अपने अधीन है । अपने अभाव के चिन्तन में क्या कष्ट या खेद है ।
हे राम ! आत्मपद सन्तों की संगति द्वारा बहुत सुलभता से प्राप्त होता है ज्ञानवानों की पृथक्-पृथक् सेवा करो और उनके वाक्यों को विचारकर बुद्धि को तीक्ष्ण करो । जब बुद्धि तीक्ष्ण होगी तब अहन्ता-रूपी विष की बेलि का नाश करेगी । यह विचार करना चाहिए कि 'मैं कौन हूँ' और 'यह जगत् क्या है' । इस प्रकार सन्तों और शास्त्रों के वचनों का निर्णय करने से सत्य-सत्य होता है और जो असत्य है, वह असत्य हो जाता है । सत्य जानकर आत्मा की भावना करे और असत्य जगत् को मृग-तृष्णा के जल सा जानकर भावना को त्यागे तो जिनको सुख जानकर पाने की भावना या चाह करता था, वे दुःखदायी जान पड़ते हैं । जैसे अधिष्ठान के अज्ञान से मरुस्थल में जल जानकर मृग दौड़ता है, तो
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४५५
दुःख पाता है, वैसे ही ये सब विषय हैं। सबका अधिष्ठान आत्मतत्त्व है। वह शुद्धरूप, परमशान्त और परमानन्दस्वरूप है, जिसको पाकर फिर जीव दुःखी नहीं होता। हे राम! बन्धन का कारण भोग की वासना है। भोगों से शान्ति नहीं मिलती। जब सन्तों की संगति होती है, तब कल्याण होता है और अनात्म में अहंभाव छूट जाता है। और किसी प्रकार शान्ति नहीं मिलती। हे राम! बालक की नाईं हमारे वचन नहीं हैं, हमारा कहना यथार्थ है, क्योंकि हमको स्वरूप का स्पष्ट भान है। जब अहन्ता मिट जावे तब सुखी हो। इससे अहंता का नाश करो। जब अहंता का नाश हो, तब जानिये कि चैत्य की भावना मिट गई है। हे राम! जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है, तब अहंतारूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान तब होता है, जब सन्तों का संग और विचार, विषयों से वैराग्य और स्वरूप का अभ्यास करे—इससे स्वरूप की प्राप्ति होती है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणयुत्युक्त्युपदेशो नाम शताधिकद्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिन पुरुषों ने ज्ञान से अपना अज्ञान नष्ट नहीं किया, उन्होंने करने योग्य कुछ नहीं किया। अज्ञान से पहले अहंभावना होती है, तब आगे जगत् भासित होता है। तब जीव लोक-परलोक की भावना करता है और इसी वासना से जन्म-मरण पाता है। हे राम जब तक हृदय में संसार का शब्द-अर्थ दृढ़ है, तब तक शब्द-अर्थ के अभाव का चिन्तन करे और जहाँ जगत् भासित होता है, वहाँ ब्रह्म की भावना करे। जब ब्रह्मभावना करेगा, संसार के शब्द-अर्थ से रहित होगा और उसे आत्मपद भासित होगा। हे राम! इस संसार में दो पदार्थ हैं—एक यह लोक और दूसरा परलोक। अज्ञानी इस लोक का उद्यम करते हैं, परलोक का नहीं करते, इससे दुःख पाते हैं और उनकी तृष्णा नहीं मिटती। विचारवान् पुरुष परलोक का उद्यम करते हैं, इससे यहाँ भी शोभा पाते हैं और परलोक में भी सुख पाते हैं। उनके दोनों लोकों के कष्ट मिट जाते हैं। जो इसी लोक का
४५६ ☸ योगवाशिष्ट ☸
उद्यम करते हैं, उनको दोनों ही दुःखदायक होते हैं अर्थात् यहाँ तृष्णा नहीं मिटती और आगे जाकर नरक भोगते हैं । जिन पुरुषों ने आत्मा की भलाई का यत्न किया है, उनको वही सिद्ध होता है और वे सुखी होते हैं । जिसने यत्न नहीं किया, वह दुःखी होता है । इसलिए अहंकार से रहित होने से ही आत्मपद की प्राप्ति होती है । जब तक परिच्छिन्न अहंकार होता है, तब तक दुःखी होता है, तब इसका नाम जीव होता है । जो कुछ फुरता है, उससे विश्व की उत्पत्ति होती है । जैसे नेत्रों के खोलने से रूप दिखता है और नेत्रों के मूँदने से रूप का अभाव हो जाता है, वैसे ही जब अहंता जागती है, तब दृश्य दिखता है और जब अहंता का अभाव होता है, तब दृश्य का भी अभाव हो जाता है । अहंता अज्ञान से सिद्ध होती और ज्ञान के उपजने से निवृत्त हो जाती है ।
हे राम ! यदि पुरुष अपना प्रयत्न और साथ ही सत्संग करे तो इस संसारसमुद्र से तर जावेगा । और किसी प्रकार नहीं तर सकता । हे राम ! युक्ति से जैसे विष भी अमृत हो जाता है, वैसे पुरुषार्थ से सिद्धि प्राप्त होती है । हे राम ! इस जीव को दो रोग हैं—एक यह लोक और दूसरा परलोक । उनमें दुःख पाना है । जिन पुरुषों ने सन्तों के संग रूपी औषध से इन रोगों की चिकित्सा की है, वे मुक्तरूप हैं और जिन्होंने वह औषध नहीं की, वे पुरुष पंडित हों तो भी दुःख पाते हैं । वह औषध क्या है ? शम, दम और सत्सङ्ग । इन साधनों के यत्न से जिसने आत्मपद पाया है, वह कल्याणमूर्ति है । हे राम ! चिकित्सा भी यही है । जिसने औषध की, वह कृतार्थ हुआ और जिन्होंने न की, वे भोग में लिपटे रहे । वे मूर्ख वहाँ पड़ेंगे, जहाँ फिर कोई औषध न पावेंगे । इससे हे राम ! इन भोगों का त्याग करो और आत्मविचार में सावधान हो रहो—यही औषध है । हे राम ! जिस पुरुष ने मन नहीं जीता, वह मूढ़ है—वह भोगरूपी कीचड़ में डूबा है और आपदा का पात्र है । जैसे समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं, वैसे ही उसको आपदा प्राप्त होती है । जिसकी तृष्णा भोग से निवृत्त हुई है और वैराग्य उपजा है, वह मुक्त होता है ।
निर्वाण प्रकरण ४५७
जैसे जीवन का आदि बालक अवस्था है, वैसे ही निर्वाणपद का आदि वैराग्य है । हे राम ! जैसे दूसरा चन्द्रमा, संकल्पनगर और मृगतृष्णा का जल भ्रम से भासित होता है, वैसे ही यह जगत् भ्रम से प्रकट है । संसार का बीज अहंता है । जब अहंता उदय होती है, तब रूप और अवलोक भासित होता है । इससे यही चिन्तन करो कि मैं नहीं हूँ । जब यही भावना करोगे, तब शेष जो रहेगा वही तुम्हारा शान्तरूप है । उसमें आकाश भी शून्य है । अहं के उत्थान से रहित जड़-अजड़ सब केवल आत्मत्वमात्र है ।
जड़ता का उसमें अभाव है, इससे अजड़ और केवल ज्ञानमात्र है । उसमें विश्व ऐसे है जैसे जल में तरङ्ग, पवन में स्पन्दन और आकाश में शून्यता । आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जो आत्मा से कुछ भिन्न होता तो प्रलय में उसका नाश हो जाता । पर आत्मा तो प्रलयकाल में भी रहता है । जैसे सूर्य की किरणों में सदा जल का आभास रहता है, वैसे ही आत्मा में विश्व का चमत्कार रहता है । जैसे स्वप्नसृष्टि अनुभवस्वरूप होती है, वैसे ही यह जाग्रतसृष्टि भी अनुभव है । आत्मा भीतर बाहर से रहित, अद्वैत, अजर, अमर चैत्य से रहित, चैतन्य और सब शब्द-अर्थ का अधिष्ठान है । अहं के स्फुरण से दूसरा भासित होता है । फुरना, न फुरना वही है । जैसे चलना और ठहरना, दोनों पवन के रूप हैं । जब पवन चलता है तब प्रतीत होता है और जब ठहरता है, तब नहीं मालूम पड़ता, वैसे ही जब चित्तशक्ति फुरती है, तब विश्वरूप होकर भासित होती है और जब नहीं स्फुरित होती, तब केवल मात्र पद रहता है । वह पद निराभास, अविनाशी, निर्विकल्प और सबका अपना रूप है । सत्य, असत्य, जड़, चेतन आदिक सब शब्द-अर्थ उसी अधिष्ठानसत्ता में फुरते हैं । इससे उसी अपने स्वरूप में स्थित होओ, जो परमार्थसत्ता आत्मतत्त्व, अपने स्वभाव में स्थित और अहं-त्वं से रहित केवल आकाश-रूप, सबका अधिष्ठान है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शान्तिस्थितियोगोपदेशोनाम शताधिकत्रिपञ्चाशत्तमसर्गः ॥ १५३ ॥
४५८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
वशिष्टजी बोले, हे राम ! जिनको दुःख-सुख चलाते हैं, जो इन्द्रियों के इष्ट में सुखी और अनिष्ट में दुःखी होते हैं और रागद्वेष के अधीन रहते हैं, उनको नष्ट हुए जानो। जिनका पुरुष प्रयत्न नष्ट हुआ है, वे बारम्बार जन्म पावेंगे, और जिनको सुख-दुःख नहीं चलाते, उनको अविनाशी जानो। वे जन्म मरण की फाँसी से मुक्त हुए हैं और उनके लिए शास्त्र का उपदेश नहीं है। हे राम! रागद्वेष तब होता है, जब मन में इच्छा होती है, और इच्छा तब होती है, जब संसार की सत्यता मन में दृढ़ होती है। मनुष्य जिसको असत्य जानता है, उसको बुद्धि नहीं ग्रहण करती और उसकी इच्छा भी नहीं होती। और जिसको सत्य जानता है, उसमें बुद्धि दौड़ती है। हे राम! अज्ञानी को संसार सत्य लगता है, इससे दुःख पाता है। जब वह शान्तपद का यत्न करे, तब दुःख से मुक्त हो। जिसमें अहँ, त्वं, जगत्, ब्रह्म आदि शब्द कोई नहीं और जो केवल चिन्मात्र आकाशरूप है, उसमें ये शब्द कैसे हों ? ये सब शब्द विचार के निमित्त कहे हैं, वास्तव में कोई शब्द नहीं है। वह अद्वैत और चैत्य से रहित चिन्मात्र है। जब सब शब्दों का बाध हुआ, तब शेष शान्तपद रहता है। इसी से उसे आत्मत्त्वमात्र कहा है। यह जगत् उसी में भासित होता है। इस जगत् में जहाँ ज्ञप्ति जाती है, उसका ज्ञान होता है।
हे राम ! एक अधिष्ठानज्ञान है और दूसरा ज्ञप्तिज्ञान । अधिष्ठान-ज्ञान सर्वज्ञ ईश्वर को है और ज्ञप्तिज्ञान जीव को । एक लिङ्ग शरीर का जिसको अभिमान है वह जीव है, और सबलिङ्ग शरीरों का अभिमानी ईश्वर है। जहाँ इस जीव की ज्ञप्ति पहुँचती है, उसको यह जानता है। जैसे एक शय्या पर दो पुरुष सोये हों और एक को स्वप्न आये कि मेघ गर्जते हैं, तब दूसरा उस मेघ का शब्द नहीं सुनता; क्योंकि ज्ञप्ति उसको नहीं आई, परन्तु मेघ तो उसके स्वप्न में है। जैसे सिद्ध विचरते हैं और जीव को नहीं दिखते, क्योंकि उसकी ज्ञप्ति उन तक नहीं जाती। सब सृष्टि बसती है, उसका ज्ञान ईश्वर को है। वह सृष्टि भी संकल्पमात्र है; कुछ बनी नहीं और भ्रम से भासित होती है। जैसे बादल में हाथी,
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ [४५६]
घोड़े, मनुष्य आदिक विकार (रूपांतर) जो दिखते हैं, वे भ्रान्तिमात्र हैं, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से नाना प्रकार की यह सृष्टि भासित होती है। हे राम! यह आश्चर्य है कि आत्मा में अहंकार का उत्थान होता है कि मैं हूँ और वह अपने को वर्णाश्रमी मानता है। पर विचार करके देखिये तो अहं कुछ वस्तु नहीं सिद्ध होती, और अहं अहं फुरती है। यह आश्चर्य है कि भूत (अहं) कहाँ से उठा है और शुद्ध आत्मब्रह्म में कैसे उपस्थित हुआ? अस्तित्वहीन निर्मूल अहंकार ने तुमको मोहित किया है। इसके त्यागने में तो कुछ यत्न नहीं। इसका त्याग करो। हे राम! यह संकल्प मिथ्या उठा है। जब अहंकार का उत्थान होता है, तब जगत् होता है और जब अहन्ता मिट जाती है तब जगत् का भी अभाव हो जाता है, क्योंकि कुछ बना नहीं, सब भ्रममात्र है। जैसे संकल्पनगर और स्वप्न की सृष्टि भ्रममात्र है, वैसे ही यह विश्व भी भ्रममात्र है। कुछ बना नहीं, सब आत्मतत्त्व है, उससे भिन्न नहीं। जैसे पवन के दो रूप हैं। चलता है तो भी पवन है और ठहरता है तो भी पवन है, वैसे ही विश्व भी दोनों प्रकार से आत्मस्वरूप है। जैसे पवन चलता है, तब जान पड़ता है और ठहर जाता है तब नहीं जान पड़ता, वैसे ही चित्त चैतन्यशक्ति का चमत्कार है। जब फुरता है, तब विश्व भासित होता है, पर तो भी चिद्घन है। और जब ठहर जाता है, तब विश्व नहीं भासित होता। परन्तु आत्मा सदा एकरस है। जैसे जल में तरङ्ग और सुवर्ण में जो भूषण हैं, वे उनसे भिन्न नहीं हैं, वैसे ही आत्मा में विश्व कुछ हुआ नहीं, आत्मस्वरूप ही है। ज्ञप्ति भी ब्रह्म है और ज्ञप्ति में प्रतीत विश्व भी ब्रह्म है। तब विधि निषेध और हर्ष-शोक किसका करें? सब वही है।
हे राम! संकल्प को स्थिर करके देखो कि सब तुम्हारा ही स्वरूप है। जैसे मनुष्य शयन करता है तो उसकी स्वप्नसृष्टि दिखती है और जब जागता है तब देखता है कि सब मेरा ही स्वरूप है, वैसे ही जाग्रत् विश्व भी तुम्हारा स्वरूप है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वे जलरूप हैं, वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है। और जैसे चितेरा काष्ठ में कल्पना
४६० ❇ योगवाशिष्ट ❇
करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी और जैसे मृत्तिका में कुम्हार घटादि की कल्पना करता है कि इसमें इतने पात्र बनेंगे, पर काष्ठ और मृत्तिका में तो कुछ नहीं, ज्यों का त्यों काष्ठ है और ज्यों की त्यों मृत्तिका है, परन्तु कुम्हार या बढ़ई के मन में आकार की कल्पना है, वैसे ही आत्मा में संसाररूपी पुतलियों की कल्पना मन करता है। जब मन का संकल्प निवृत्त हो, तब ज्यों का त्यों आत्मपद भासित हो। जैसे तरङ्ग जलरूप है; जिसको जल का ज्ञान है, वह तरङ्ग को भी जलरूप जानता है और जिसको जल का ज्ञान नहीं, वह तरङ्ग के भिन्न-भिन्न आकार देखता है, वैसे ही जब निससंकल्प होकर स्वरूप को देखे तब जगत् फुरने में भी आत्मसत्ता भासित होगी, अहंत्व आदिक तब जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है। तब भ्रम कैसे हो और किसको हो? सब विश्व आत्मस्वरूप है और आत्मा निरालम्ब अर्थात् चैत्य और अहंकार से रहित केवल आकाशरूप है। जब तुम उसमें स्थित होगे, तब नाना प्रकार की भावना मिट जावेगी; क्योंकि नाना प्रकार की भावना जगत् में फुरती है। जगत् का बीज अहन्ता है; जब अहंता नष्ट हो, तब जगत् का भी अभाव हो जावेगा। हे राम! अहंता का फुरना ही बन्धन और निरहंकार होना ही मोक्ष है। एक चित्तबोध है और दूसरा ब्रह्मबोध—चित्तबोध जगत् है और ब्रह्मबोध मोक्ष। चित्तबोध अहन्ता का नाम है। जबतक चित्तबोध फुरता है, तबतक संसार है और जब चित्त का अभाव होता है, तब मुक्ति होती है। इस चित्त के अभाव का नाम ब्रह्मबोध है।
हे राम! जैसे पवन चलता है, वैसे ही ब्रह्म में चित्तबोध है, और जैसे पवन ठहर जाता है, वैसे ही चित्त का ठहरना ब्रह्मबोध है। जैसे स्पन्दित और निःस्पन्द दोनों पवन ही हैं, वैसे ही चित्तबोध और ब्रह्मबोध ब्रह्म ही हैं, कुछ भिन्न नहीं। हमको तो ब्रह्म ही भासित होता है, जो चैतन्यमात्र शान्तरूप और अपने स्वभाव में स्थित है। जिसको अधिष्ठान का ज्ञान होता है, उसको विवर्त भी उसी का रूप भासित होता है और जिसको अधिष्ठान का ज्ञान नहीं होता, उसको
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४६१
भिन्न-भिन्न जगत् भासित होता है। जैसे एक बीज में पत्ते, डाल, फूल और फल दिखते हैं, पर जिसको बीज का ज्ञान नहीं, उसको ये भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं। हे राम! हमको अधिष्ठान आत्मतत्त्व का ज्ञान है, इससे हमें सब विश्व आत्मस्वरूप दिखता है। पर अज्ञानी को नाना प्रकार का विश्व और जन्म-मरण भासित होते हैं। हे राम! सब शब्द आत्मतत्त्व में फुरते हैं, और वह सबका अधिष्ठान, निराकार, निर्विकार, शुद्ध आत्मा सबका अपना रूप है। इसलिए सब विश्व आकाशरूप है, उससे भिन्न नहीं। जैसे तरङ्ग जलरूप है, वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है। चित्त जो फुरता है, उसका अनुभव करनेवाली चैतन्यसत्ता ही ब्रह्म है। तुम्हारा स्वरूप भी वही है। इसने अहं-त्वं आदिक जगत् सब ब्रह्मरूप है। तुम संशय त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित होओ। पहले तुमसे जो द्वैत-अद्वैत कहा है, वह सब उपदेशमात्र है। चित्त की वृत्ति को स्थिर करके देखो, सब ब्रह्म है, भिन्न कुछ नहीं, तब निषेध किसका कीजिये? हे राम! ज्ञानवान् चित्त की दो वृत्तियाँ कहते हैं—एक मोक्षरूप और दूसरी बन्धनरूप। जो वृत्ति स्वरूप की ओर फुरती है वह मोक्षरूप और जो दृश्य की ओर फुरती है वह बन्धन है। जो तुमको शुद्ध लगे वही करो। जो द्रष्टा है, वह दृश्य नहीं होता और जो दृश्य है, वह द्रष्टा नहीं होता। पर आत्मा तो अद्वैत है। इससे द्रष्टा में दृश्य पदार्थ कोई नहीं। तुम क्यों दृश्य की ओर झुकते हो और अनहोते दृश्य को ग्रहण करते हो? तुम्हारा द्रष्टा नाम भी दृश्य से होता है। जब दृश्य का अभाव जानो, तब अवाच्यपद है। उसको वाणी से कहा नहीं जा सकता। हे राम! जैसे अङ्गी और अङ्गवाले, आकाश और शून्यता, जल और द्रवता, बर्फ और शीतलता में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। कोई जगत् कहे अथवा ब्रह्म कहे, एक ही बात है। जगत् ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही जगत् है। इससे आत्मपद में स्थित होओ। भ्रम से जो अपने को कुछ और मानते हो, उसको त्यागकर ब्रह्म ही की भावना करो और अपने को मनुष्य कभी न जानो। जो अपने को मनुष्य जानोगे तो यह निश्चय