योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४४६
अजर और अमर परमात्मतत्त्व में खाते-पीते, चलते-फिरते वृत्ति रहेगी।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे भावनाप्रतिपादनोपदेशो नाम शताधिकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार पुरुष आत्मपद को प्राप्त होता है सो सुनो ! जब निरहंकार होता है, तब आत्मपद को प्राप्त होता है। जो सर्वात्मा है, उसका आवरण करनेवाली अविद्या ही है। जैसे सूर्य-मण्डल को बादल ढक लेता है, वैसे ही अविद्या आत्मा का आवरण करती है। उस अविद्या से मूर्ख उन्मत्त की तरह चेष्टा करते हैं, और जो अहंता से रहित ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको कोई दुःख नहीं स्पर्श करता—वह सदेह भी दुःख शून्य होता है। जैसे भीत पर लिखी युद्ध की सेना देखने भर को क्षुब्ध दिखती है; परन्तु शान्तरूप होती है, वैसे ही ज्ञान-वान् की चेष्टा में भी क्षोभ दिखता है, परन्तु वह सदा अक्षोभ और निर्वाणरूप है। वह वासनासहित देख पड़ता है, पर सदा निर्वा-सनिक है। जैसे जल में लहर और चक्कर के क्षोभ दिखते हैं, परन्तु वे जल से भिन्न नहीं होते, वैसे ही ज्ञानवान् को ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं भासित होता। जिसके हृदय से दृश्यभाव शान्त हो गया है, पर बाहर में क्षोभ दिखता है, तो भी वह मुक्तरूप है। जैसे बादल आकाश में हाथी, घोड़ा और पहाड़ के रूप में दिखते हैं, परन्तु हैं कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् दिखता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं है। अहंकार से भाषित होता है और अहंकार से रहित होने पर निर्विकार शान्तरूप हो जाता है। ऐसा जो निरहंकार आत्मपद है, उसको पाकर ज्ञानवान् शोभित होता है। शरत्काल का आकाश, क्षारसमुद्र और पूर्णमासी का चन्द्रमा भी ऐसा नहीं शोभा पाता, जैसा ज्ञानवान् पुरुष शोभा पाता है। हे राम ! अहन्ता ही इस पुरुष का मैल है। जब अहन्ता नष्ट हो, तब स्वरूप की प्राप्ति हो और संसार के पदार्थों की भावना निवृत्त हो; क्योंकि वह भ्रम से उपजी थी। जो वस्तु भ्रम से उपजी होती है, उसका भ्रम का अभाव होने पर अभाव हो जाता है। जैसे आकाश में धुएँ का बादल नाना प्रकार के आकार में दिखता है पर वे आकार हैं नहीं,