भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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४४८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

जब चित्त संसरण से रहित हो, तब केवल केवलीभाव स्वरूप भासित हो । ज्ञानवान् की दृष्टि में अब भी कुछ नहीं हुआ, केवल आत्मस्वरूप ही भासित होता है, और फुरना और न फुरना दोनों तुल्य दिखाई देते हैं । अन्तःकरण चतुष्टय आत्मस्वरूप है और अज्ञानी को भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, इसी से चित्त आदिक जड़ और मिथ्या हैं । आत्मस्वरूप से सब आत्मस्वरूप है । आत्मा, देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है—ज्ञानी को सब आत्मा ही दिखता है । वह चाहे कैसी ही चेष्टा करे, वह लोक, धन, पुत्र आदि सब एषणाओं से रहित, केवल आत्म अनुभवरूप में स्थित है और सबको अपना रूप जानता है ।

हे राम ! जिस पद को वह प्राप्त होता है, उस पद को वाणी नहीं कह सकती । वह अनिर्वाच्यपद है । जो पुरुष कहता है कि "अहं ब्रह्म अस्मि" अर्थात् मैं ब्रह्म हूँ और यह जगत् है तो जानिये कि उसको ज्ञान नहीं उपजा—उसको शास्त्रश्रवण का अधिकार है । जैसे कोई कहे कि मेरे हाथ में दीपक है और अन्धकार भी मुझको देख पड़ता है तो जानिये कि इसके हाथ में दीपक नहीं, वैसे ही जबतक जगत् भासित होता है, तबतक ज्ञान नहीं उपजा । हे राम ! अब भी निर्वाणपद है किससे किसको कौन उपदेश करे ? केवल एकरस शून्य है; शून्य और आत्मा में कुछ भेद नहीं । और जो कुछ भेद है उसको ज्ञानवान् जानते हैं, वहाँ वाणी की गति नहीं । उसमें जो संवेदन फुरता है, उससे संसार उपजता है और असंवेदन से लीन होता है । जैसे पवन से अग्नि प्रज्वलित होती है और पवन ही में लीन होती या बुझती है, वैसे ही जब संवेदन बहिर्मुख जगता है, तब संसार भासित होता है और जब अन्तर्मुख होता है तब जगत् लीन हो जाता है—इससे संसार स्फुरणमात्र है । जैसे आकाश में नीलापन भ्रम से दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत् की रचना नहीं हुई केवल ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों है—उसी में स्थित होओ । जब उसमें स्थित होगे, तब भेद मिट जावेगा । हे राम ! तब ग्राह्य और ग्राहक सम्बन्ध भी जाता रहेगा और केवल शुद्ध,