भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४४७

है । पर जो पद मन और वाणी से अतीत है, उसको कलङ्कित शब्द कैसे ग्रहण करे ?

हे राम ! काष्ठमौन उसको कहते हैं, जहाँ इन्द्रियाँ न फुरें, न मन फुरे और कोई स्फुरण न हो—ऐसे पद को मैं वाणी से कैसे कहूँ ? जो कुछ बोला जाता है, वह सविकल्प होता है—तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर मौन ही है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि बोलना सविकल्प और प्रतियोगी सहित होता है तो जो कुछ ब्रह्म में दूषण है उसका निषेध करके कहो । मैं प्रतियोगी को न विचारूँगा । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मैं चिदाकाशस्वरूप, चैत्य से रहित चिन्मात्र शान्तरूप, सम और सर्वकल्पना से रहित केवल आत्मत्वमात्र हूँ । और तुम और जगत् भी चिदाकाश है, अहं त्वं कोई नहीं, क्योंकि दूसरी सत्ता कोई नहीं ! सब अहंसंवेदन से रहित शुद्ध चिदाकाश है । यदि सापेक्षक अहं-अहं फुरता है और मोक्ष की भी इच्छा होती है तो सिद्ध नहीं होती, क्योंकि अपने को कुछ मानकर फुरती है; इसलिए एक अहंकार के कई अहंकार हो जाते हैं । यही अहं की फाँसी गले में पड़ती है । जब अहन्ता से रहित हो, तब आत्मपद को प्राप्त हो । हे राम ! जब शव की तरह हो जावे और कुछ अभिमान न उठे, तब संसारसमुद्र से पार हो । जब तक द्वैत है, तबतक बन्धन है, कभी मुक्त नहीं हो सकता । जैसे जन्म का अन्धा चित्र की पुतली को नहीं देख सकता, वैसे ही अहंता से युक्त मुक्ति नहीं पाता । जब अहन्ता का अभाव हो तब कल्याण हो—स्वरूप के ऊपर अहन्ता का ही आवरण है ।

हे राम ! जब जीव चेतन होकर उपजा तब उसको बन्धन पड़ा । और जब जड़-संवेदनशून्य हो, तब कल्याण हो । जब चैतन्योन्मुखत्व होता है, तब जीव होता है । मनुष्य का शरीर पाकर जब चैत्य से रहित शुद्ध चैतन्य प्रत्यक् आत्मा में स्थित होता है, तब मनुष्यजन्म सफल होता है । मनुष्यजन्म पाकर पाने योग्य पद पा सकता है । हे राम ! यदि मनुष्य जन्म को पाकर आत्मतत्त्व को न जानेगा तो और किस जन्म में जानेगा ? यह संसार चित्त के फुरने से उत्पन्न हुआ है;