योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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वैसे ही यह विश्व अस्तित्व के बिना भी भासित होता है और विचार करने से नहीं रहता ।
हे राम ! जब तक संसार की वासना है, तब तक बन्धन है । जब वासना निवृत्त हो, तब आत्मपद की प्राप्ति हो, सम्पूर्ण कलना मिट जावे और इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट में तुल्य बुद्धि हो । तब वह यद्यपि व्यवहारकर्ता हो, तो भी शान्तरूप है । जैसे शव को रागद्वेष नहीं उत्पन्न होता, वैसे ही ज्ञानी निर्वाण पद को प्राप्त होता है, जिसमें सत् या असत् शब्द कोई नहीं, केवल ब्रह्मस्वरूप है । बल्कि ब्रह्म कहना भी वहाँ नहीं रहता, केवल अद्वैत आत्मतत्त्वमात्र है । हे राम ! विश्व भी वही चैतन्य आकाश रूप है । जैसी-जैसी भावना होती है, वैसा ही वैसा चैतन्य होकर भासित होता है । जब जगत् की भावना होती है, तब नाना प्रकार के आकार दीखते हैं और ब्रह्म की भावना से ब्रह्म भासित होता है । जैसे विष में यदि अमृत की भावना होती है और उसे विधिपूर्वक खाते हैं तो वह विष भी अमृत हो जाता है, और जो विधि बिना खाइये तो मृत्यु का कारण होता है, वैसे ही इस संसार को यदि विधि-संयुक्त देखिये अर्थात् विचार करके देखिये तो ब्रह्मस्वरूप भासित होता है और जो विचार बिना देखिये तो जगत् रूप भासित होता है । पर विचार तब होता है, जब अहंकार निवृत्त होता है । अहंकार आकाश में उपजा है, आकाश शून्यता में उपजा है और शून्यता आत्मा के प्रमाद से उपजी है । फिर अहंकार मे जगत् हुआ है और अहंकार मिथ्या है ।
हे राम ! शरीर से चित्तपर्यन्त विचारकर देखिये तो कहीं नहीं देख पड़ते । इनमें जो अहंप्रत्यय है, वह भ्रान्तिमात्र है । जब तुम विचार करके देखोगे तब मरीचिका के जल सदृश वह प्रतीत होगा । हे राम ! जैसे स्वप्न के पर्वत को त्यागने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वैसे ही मिथ्या संसार को त्यागने में कुछ यत्न नहीं—फिर इसका निर्णय क्या कीजिये ? जैसे बन्ध्या के पुत्र की वाणी को विचारिये कि यह सत्य कहता है या असत्य कहता है तो वह मिथ्या कल्पना है—क्योंकि बन्ध्या के पुत्र है ही नहीं, तब उसका विचार क्या करिये, वैसे ही यह