भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 452

निर्वाण प्रकरण४५१

प्रपञ्च है नहीं, तब इसका निर्णय क्या कीजिये ? इससे तुम ऐसे ही रहो, जैसा मैं कहता हूँ, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी । हे राम ! ऐसी भावना करो कि न मैं हूँ और न जगत् है । जब अहंकार ही न रहा, तब कलना कहाँ से हो । इसका होना ही अनर्थ है । जब ऐसा विचार उत्पन्न होता है, तब भोगों की वासना का क्षय हो जाता है और सन्तों की संगति होती है—अन्यथा भोग की वासना नष्ट नहीं होती । हे राम ! जब तक अहंता उठती है अर्थात् दृश्य और प्रकृति से मिलाप है, तब तक द्वैतभ्रम नहीं मिटता, और जब अहंकार का उत्थान मिट जायगा, तब शुद्ध चिन्मात्र आत्मसत्ता ही रहेगी ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हंससंन्यासयोगो नाम शताधिकैकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब अहन्ता का उत्थान होता है, तब स्वरूप का आवरण होता है और जब अहन्ता मिट जाती है तब स्वरूप की प्राप्ति होती है । इस संसार का बीज अहंता ही है । जब अहंकार ही मिथ्या है, तब उसका कार्य कैसे सत्य हो ? जब प्रपञ्च मिथ्या हुआ तो पदार्थ कहाँ से सत्य हों ? हे राम, ऐसा जो ब्रह्म है, उसके पाने की युक्ति क्या है ? संकल्पपुरुष भी असत्य है; उसका संशय भी मिथ्या है और जिसके प्रति प्रश्न करता है, वह भी मिथ्या है । जैसे स्वप्न में जो द्वैतकलना होती है वह असत् है वैसे ही यह जगत् का द्वैत भी असत्य है । हे राम ! यह सब जगत् इस आत्मरूप आकाश के भीतर स्थित है और प्रमाद से बाहर भासित होता है । यह अपना ही स्वप्न दिखता है, जो भीतर की सृष्टि बाह्य भासित होती है । इससे यह सब जगत् चितरूप है—उससे भिन्न कुछ नहीं है । यह चैतन्यसत्ता आकाश से भी अतिसूक्ष्म और स्वच्छ है । हे राम ! यह जगत् चित्त ने चेता है इससे कहीं हुआ नहीं । न किसी का नाश होता है, न कोई उत्पन्न होता है, न कहीं जन्म है और न मरण है—सब ब्रह्म ही है ।

हे राम ! जगत् का नाश होने पर कुछ नष्ट नहीं होता, क्योंकि कुछ हुआ ही नहीं था । जैसे स्वप्न के पहाड़ और संकल्पपुर नष्ट हुए तो