भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 453

४५२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

क्या नष्ट हुए, वे तो कुछ उपजे ही न थे, वैसे ही इस जगत् के विषय में भी जानो । यह विचार करके देखा है कि जो वस्तु अविचार से उपजी होती है, वह विचार करने मे नहीं रहती । जैसे जो पदार्थ तम से उपजा होता है, वह प्रकाश होने से नहीं रहता, वैसे ही यह जगत् अविचार से भासित होता है और विचार करने से इसका नाश हो जाता है । हे राम ! यह जगत् संकल्पमात्र है—जैसे संकल्पनगर होता है, वैसे ही यह संसार है । इसमें कोई पदार्थ सत्य नहीं । इस कारण रूप, इन्द्रिय और मन के अभाव का चिन्तन करना । यह संसार ऐसा है, जैसे समुद्र में पानी की भँवर । इसमें प्रीति करना अज्ञान है । हे राम ! कोई ऐसे हैं कि बाहर से शान्तरूप दीखते हैं, पर उनके हृदय में क्षोभ होता है और कोई पुरुष ऐसे हैं कि हृदय मे शीतल हैं और बाहर नाना प्रकार की चेष्टा करते हैं । पर जिनके दोनों भाव मिट जाते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं, उनके भीतर और बाहर एकता होती है—जैसे समुद्र में घट भर के रखिये तो उसके भीतर बाहर जल ही होता है । हे राम ! जिस पुरुष ने आत्मा को वास्तव रूप में ज्यों का त्यों जाना है, उसको भय, शोक और मोह नहीं होता । वह केवल स्वच्छ रूप शान्त आत्मा में स्थित है । भय तब होता है, जब दूसरा भासित होता है । उसके मन में तो सब द्वैत का अभाव होता है और वह शान्तरूप होता है ।

हे राम ! सम्यग्दर्शी को जगत् दुःख नहीं देता, पर असम्यग्दर्शी को दुःख देता है । जैसे रस्सी को जो जानता है, उसको रस्सी ही जान पड़ती है, और जो नहीं जानता, उसको सर्प दिखता है और वह भय पाता है, वैसे ही जिसको आत्मा का साक्षात्कार हो गया है, उसको जगत् की कोई कल्पना नहीं भासित होती, केवल अधिष्ठानरूप चिदानन्द ब्रह्म भासित होता है । और जिसको अधिष्ठान का अज्ञान है, उसको जगत् द्वैतरूप होकर भासित होता है और वह रागद्वेष में दग्ध होता है । हे राम ! जगत् और कुछ नहीं है । इसके अनुभव में ही जगत् की कल्पना होती है, और अज्ञान से द्वैतरूप भासित होता है । पर जब जीव अपनी स्वभावसत्ता में जागता है, तब सब उसे अपना

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