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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४४६

अजर और अमर परमात्मतत्त्व में खाते-पीते, चलते-फिरते वृत्ति रहेगी।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे भावनाप्रतिपादनोपदेशो नाम शताधिकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार पुरुष आत्मपद को प्राप्त होता है सो सुनो ! जब निरहंकार होता है, तब आत्मपद को प्राप्त होता है। जो सर्वात्मा है, उसका आवरण करनेवाली अविद्या ही है। जैसे सूर्य-मण्डल को बादल ढक लेता है, वैसे ही अविद्या आत्मा का आवरण करती है। उस अविद्या से मूर्ख उन्मत्त की तरह चेष्टा करते हैं, और जो अहंता से रहित ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको कोई दुःख नहीं स्पर्श करता—वह सदेह भी दुःख शून्य होता है। जैसे भीत पर लिखी युद्ध की सेना देखने भर को क्षुब्ध दिखती है; परन्तु शान्तरूप होती है, वैसे ही ज्ञान-वान् की चेष्टा में भी क्षोभ दिखता है, परन्तु वह सदा अक्षोभ और निर्वाणरूप है। वह वासनासहित देख पड़ता है, पर सदा निर्वा-सनिक है। जैसे जल में लहर और चक्कर के क्षोभ दिखते हैं, परन्तु वे जल से भिन्न नहीं होते, वैसे ही ज्ञानवान् को ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं भासित होता। जिसके हृदय से दृश्यभाव शान्त हो गया है, पर बाहर में क्षोभ दिखता है, तो भी वह मुक्तरूप है। जैसे बादल आकाश में हाथी, घोड़ा और पहाड़ के रूप में दिखते हैं, परन्तु हैं कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् दिखता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं है। अहंकार से भाषित होता है और अहंकार से रहित होने पर निर्विकार शान्तरूप हो जाता है। ऐसा जो निरहंकार आत्मपद है, उसको पाकर ज्ञानवान् शोभित होता है। शरत्काल का आकाश, क्षारसमुद्र और पूर्णमासी का चन्द्रमा भी ऐसा नहीं शोभा पाता, जैसा ज्ञानवान् पुरुष शोभा पाता है। हे राम ! अहन्ता ही इस पुरुष का मैल है। जब अहन्ता नष्ट हो, तब स्वरूप की प्राप्ति हो और संसार के पदार्थों की भावना निवृत्त हो; क्योंकि वह भ्रम से उपजी थी। जो वस्तु भ्रम से उपजी होती है, उसका भ्रम का अभाव होने पर अभाव हो जाता है। जैसे आकाश में धुएँ का बादल नाना प्रकार के आकार में दिखता है पर वे आकार हैं नहीं,

४५० ❊ योगवाशिष्ट ❊

वैसे ही यह विश्व अस्तित्व के बिना भी भासित होता है और विचार करने से नहीं रहता ।

हे राम ! जब तक संसार की वासना है, तब तक बन्धन है । जब वासना निवृत्त हो, तब आत्मपद की प्राप्ति हो, सम्पूर्ण कलना मिट जावे और इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट में तुल्य बुद्धि हो । तब वह यद्यपि व्यवहारकर्ता हो, तो भी शान्तरूप है । जैसे शव को रागद्वेष नहीं उत्पन्न होता, वैसे ही ज्ञानी निर्वाण पद को प्राप्त होता है, जिसमें सत् या असत् शब्द कोई नहीं, केवल ब्रह्मस्वरूप है । बल्कि ब्रह्म कहना भी वहाँ नहीं रहता, केवल अद्वैत आत्मतत्त्वमात्र है । हे राम ! विश्व भी वही चैतन्य आकाश रूप है । जैसी-जैसी भावना होती है, वैसा ही वैसा चैतन्य होकर भासित होता है । जब जगत् की भावना होती है, तब नाना प्रकार के आकार दीखते हैं और ब्रह्म की भावना से ब्रह्म भासित होता है । जैसे विष में यदि अमृत की भावना होती है और उसे विधिपूर्वक खाते हैं तो वह विष भी अमृत हो जाता है, और जो विधि बिना खाइये तो मृत्यु का कारण होता है, वैसे ही इस संसार को यदि विधि-संयुक्त देखिये अर्थात् विचार करके देखिये तो ब्रह्मस्वरूप भासित होता है और जो विचार बिना देखिये तो जगत् रूप भासित होता है । पर विचार तब होता है, जब अहंकार निवृत्त होता है । अहंकार आकाश में उपजा है, आकाश शून्यता में उपजा है और शून्यता आत्मा के प्रमाद से उपजी है । फिर अहंकार मे जगत् हुआ है और अहंकार मिथ्या है ।

हे राम ! शरीर से चित्तपर्यन्त विचारकर देखिये तो कहीं नहीं देख पड़ते । इनमें जो अहंप्रत्यय है, वह भ्रान्तिमात्र है । जब तुम विचार करके देखोगे तब मरीचिका के जल सदृश वह प्रतीत होगा । हे राम ! जैसे स्वप्न के पर्वत को त्यागने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वैसे ही मिथ्या संसार को त्यागने में कुछ यत्न नहीं—फिर इसका निर्णय क्या कीजिये ? जैसे बन्ध्या के पुत्र की वाणी को विचारिये कि यह सत्य कहता है या असत्य कहता है तो वह मिथ्या कल्पना है—क्योंकि बन्ध्या के पुत्र है ही नहीं, तब उसका विचार क्या करिये, वैसे ही यह

निर्वाण प्रकरण४५१

प्रपञ्च है नहीं, तब इसका निर्णय क्या कीजिये ? इससे तुम ऐसे ही रहो, जैसा मैं कहता हूँ, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी । हे राम ! ऐसी भावना करो कि न मैं हूँ और न जगत् है । जब अहंकार ही न रहा, तब कलना कहाँ से हो । इसका होना ही अनर्थ है । जब ऐसा विचार उत्पन्न होता है, तब भोगों की वासना का क्षय हो जाता है और सन्तों की संगति होती है—अन्यथा भोग की वासना नष्ट नहीं होती । हे राम ! जब तक अहंता उठती है अर्थात् दृश्य और प्रकृति से मिलाप है, तब तक द्वैतभ्रम नहीं मिटता, और जब अहंकार का उत्थान मिट जायगा, तब शुद्ध चिन्मात्र आत्मसत्ता ही रहेगी ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हंससंन्यासयोगो नाम शताधिकैकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब अहन्ता का उत्थान होता है, तब स्वरूप का आवरण होता है और जब अहन्ता मिट जाती है तब स्वरूप की प्राप्ति होती है । इस संसार का बीज अहंता ही है । जब अहंकार ही मिथ्या है, तब उसका कार्य कैसे सत्य हो ? जब प्रपञ्च मिथ्या हुआ तो पदार्थ कहाँ से सत्य हों ? हे राम, ऐसा जो ब्रह्म है, उसके पाने की युक्ति क्या है ? संकल्पपुरुष भी असत्य है; उसका संशय भी मिथ्या है और जिसके प्रति प्रश्न करता है, वह भी मिथ्या है । जैसे स्वप्न में जो द्वैतकलना होती है वह असत् है वैसे ही यह जगत् का द्वैत भी असत्य है । हे राम ! यह सब जगत् इस आत्मरूप आकाश के भीतर स्थित है और प्रमाद से बाहर भासित होता है । यह अपना ही स्वप्न दिखता है, जो भीतर की सृष्टि बाह्य भासित होती है । इससे यह सब जगत् चितरूप है—उससे भिन्न कुछ नहीं है । यह चैतन्यसत्ता आकाश से भी अतिसूक्ष्म और स्वच्छ है । हे राम ! यह जगत् चित्त ने चेता है इससे कहीं हुआ नहीं । न किसी का नाश होता है, न कोई उत्पन्न होता है, न कहीं जन्म है और न मरण है—सब ब्रह्म ही है ।

हे राम ! जगत् का नाश होने पर कुछ नष्ट नहीं होता, क्योंकि कुछ हुआ ही नहीं था । जैसे स्वप्न के पहाड़ और संकल्पपुर नष्ट हुए तो

४५२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

क्या नष्ट हुए, वे तो कुछ उपजे ही न थे, वैसे ही इस जगत् के विषय में भी जानो । यह विचार करके देखा है कि जो वस्तु अविचार से उपजी होती है, वह विचार करने मे नहीं रहती । जैसे जो पदार्थ तम से उपजा होता है, वह प्रकाश होने से नहीं रहता, वैसे ही यह जगत् अविचार से भासित होता है और विचार करने से इसका नाश हो जाता है । हे राम ! यह जगत् संकल्पमात्र है—जैसे संकल्पनगर होता है, वैसे ही यह संसार है । इसमें कोई पदार्थ सत्य नहीं । इस कारण रूप, इन्द्रिय और मन के अभाव का चिन्तन करना । यह संसार ऐसा है, जैसे समुद्र में पानी की भँवर । इसमें प्रीति करना अज्ञान है । हे राम ! कोई ऐसे हैं कि बाहर से शान्तरूप दीखते हैं, पर उनके हृदय में क्षोभ होता है और कोई पुरुष ऐसे हैं कि हृदय मे शीतल हैं और बाहर नाना प्रकार की चेष्टा करते हैं । पर जिनके दोनों भाव मिट जाते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं, उनके भीतर और बाहर एकता होती है—जैसे समुद्र में घट भर के रखिये तो उसके भीतर बाहर जल ही होता है । हे राम ! जिस पुरुष ने आत्मा को वास्तव रूप में ज्यों का त्यों जाना है, उसको भय, शोक और मोह नहीं होता । वह केवल स्वच्छ रूप शान्त आत्मा में स्थित है । भय तब होता है, जब दूसरा भासित होता है । उसके मन में तो सब द्वैत का अभाव होता है और वह शान्तरूप होता है ।

हे राम ! सम्यग्दर्शी को जगत् दुःख नहीं देता, पर असम्यग्दर्शी को दुःख देता है । जैसे रस्सी को जो जानता है, उसको रस्सी ही जान पड़ती है, और जो नहीं जानता, उसको सर्प दिखता है और वह भय पाता है, वैसे ही जिसको आत्मा का साक्षात्कार हो गया है, उसको जगत् की कोई कल्पना नहीं भासित होती, केवल अधिष्ठानरूप चिदानन्द ब्रह्म भासित होता है । और जिसको अधिष्ठान का अज्ञान है, उसको जगत् द्वैतरूप होकर भासित होता है और वह रागद्वेष में दग्ध होता है । हे राम ! जगत् और कुछ नहीं है । इसके अनुभव में ही जगत् की कल्पना होती है, और अज्ञान से द्वैतरूप भासित होता है । पर जब जीव अपनी स्वभावसत्ता में जागता है, तब सब उसे अपना

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

४५३

ही रूप भासित होता है। जैसे स्वप्न में अपना रूप ही द्वैतरूप होकर दिखता है और रागद्वेष उपजता है, पर जब जागता है तब सब आत्म-रूप भासित होता है, वैसे ही यह जगत् है। इस जगत् का निमित्त कारण और उपादान कारण कोई नहीं है। जो पदार्थ कारण बिना भासित हो, उसे असत् जानिये। वह वास्तव में उपजा नहीं, भ्रम से सिद्ध है। जैसे स्वप्नसृष्टि अकारण है, वैसे ही जगत् अकारण है और भ्रम से भासित होता है। हे राम! शास्त्र की युक्ति से विचार करके देखो तो द्वैतभ्रम मिट जाय। रज्जूभर भी कुछ बना नहीं। जैसे आकाश में नीलापन नहीं है और मरुस्थल में नदी नहीं है, वैसे ही इस जगत् को भी जानो। आत्मा शुद्ध और अद्वैत है। उसमें अहं का उठना ही दुःख और सभी दुःखों का कारण है। जो स्वरूप का प्रमाद न हो तो अहं भी दुःख का कारण नहीं होता, और जो स्वरूप भूला तो विष की बेलि अहंकारादिक दृश्य बढ़ते जाते हैं और नाना प्रकार के आकार धारण करते हैं। तब वासना दृढ होती है। जब तक वासना होती है तब तक बन्धन है। जब वासना निवृत्त हो, तभी कल्याण होता है।

हे राम! जीव जिस दृश्य की भावना करता है, वही देख पाता है। जैसे समुद्र में तरङ्ग और चक्र जो होते हैं, वे समुद्र से भिन्न नहीं होते, वैसे ही अहंकार आदिक जो दृश्य हैं, वे हैं नहीं। और जब हैं नहीं तो उनकी इच्छा करना मूर्खता है। ज्ञानवान् की वासना क्षीण हो जाती है और उसके बन्धन का कारण नहीं होती, क्योंकि संसार की सत्यता उसके हृदय में नहीं रहती। क्योंकि आत्मा का साक्षात्कार उसे हो जाता है। जब आत्मा का प्रमाद होता है, तब अहन्ता उदय होती है और दृश्य भासित होता है। जैसे नेत्र के खोलने से दृश्य का ग्रहण होता है और नेत्र मूँद लेने पर दृश्यरूप का अभाव हो जाता है, वैसे ही जब अहन्ता उदय होती है तब दृश्य भी होता है और जब अहन्ता नष्ट होती है, तब संसार का अभाव हो जाता है। हे राम! अहन्ता का उदय होना ही अज्ञान है और अहन्ता से ही बन्धन है। अहन्ता से रहित होना मोक्ष है—आगे जो इच्छा तुम्हारी हो, सो करो।

४५४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे राम ! देह, इन्द्रियादिक मृगतृष्णा के जल सदृश हैं; इनमें अहन्ता करना मूर्खता है । ज्ञानवान् अहन्ता को त्यागकर आत्मपद में स्थित होता है, और संसार के इष्ट-अनिष्ट में हर्ष या शोक उसे नहीं होते । जैसे आकाश में बादल होने पर भी वह ज्यों का त्यों है; वैसे ही ज्ञानी ज्यों का त्यों है । उसमें अहंकार नहीं होता, इससे वह सुखरूप है । हे राम ! रूप, दृश्य, इन्द्रियाँ और मन उसके जाते रहते हैं । जैसे वन्ध्या के पुत्र का नृत्य नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी के रूप, अवलोक, मनस्कार नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि उसको सब ब्रह्म भासित होता है और उसकी द्वैत भावना नष्ट हो जाती है । संसार का बीज अहन्ता अज्ञानियों में दृढ़ होती है । हे राम ! अहन्ता से जीव की बुद्धि बुरी अर्थात् स्थूल हो जाती है । इससे वह दुःख पाता है । इस दुःख के नाश का उपाय यह है कि सन्तजनों के वचनों की भावना और विचार करके हृदय में धारणा करे—इससे अहन्तारूपी दुःख नष्ट हो जाता है । सन्तों के वचनों का निषेध करना मुक्तिफल का नाश करनेवाला और अहन्तारूपी पिशाच को उपजानेवाला है, इसलिए सन्तों की शरण में जाओ और अहन्ता को दूर करो । इसमें कुछ कष्ट नहीं; यह अपने अधीन है । अपने अभाव के चिन्तन में क्या कष्ट या खेद है ।

हे राम ! आत्मपद सन्तों की संगति द्वारा बहुत सुलभता से प्राप्त होता है ज्ञानवानों की पृथक्-पृथक् सेवा करो और उनके वाक्यों को विचारकर बुद्धि को तीक्ष्ण करो । जब बुद्धि तीक्ष्ण होगी तब अहन्ता-रूपी विष की बेलि का नाश करेगी । यह विचार करना चाहिए कि 'मैं कौन हूँ' और 'यह जगत् क्या है' । इस प्रकार सन्तों और शास्त्रों के वचनों का निर्णय करने से सत्य-सत्य होता है और जो असत्य है, वह असत्य हो जाता है । सत्य जानकर आत्मा की भावना करे और असत्य जगत् को मृग-तृष्णा के जल सा जानकर भावना को त्यागे तो जिनको सुख जानकर पाने की भावना या चाह करता था, वे दुःखदायी जान पड़ते हैं । जैसे अधिष्ठान के अज्ञान से मरुस्थल में जल जानकर मृग दौड़ता है, तो

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४५५

दुःख पाता है, वैसे ही ये सब विषय हैं। सबका अधिष्ठान आत्मतत्त्व है। वह शुद्धरूप, परमशान्त और परमानन्दस्वरूप है, जिसको पाकर फिर जीव दुःखी नहीं होता। हे राम! बन्धन का कारण भोग की वासना है। भोगों से शान्ति नहीं मिलती। जब सन्तों की संगति होती है, तब कल्याण होता है और अनात्म में अहंभाव छूट जाता है। और किसी प्रकार शान्ति नहीं मिलती। हे राम! बालक की नाईं हमारे वचन नहीं हैं, हमारा कहना यथार्थ है, क्योंकि हमको स्वरूप का स्पष्ट भान है। जब अहन्ता मिट जावे तब सुखी हो। इससे अहंता का नाश करो। जब अहंता का नाश हो, तब जानिये कि चैत्य की भावना मिट गई है। हे राम! जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है, तब अहंतारूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान तब होता है, जब सन्तों का संग और विचार, विषयों से वैराग्य और स्वरूप का अभ्यास करे—इससे स्वरूप की प्राप्ति होती है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणयुत्युक्त्युपदेशो नाम शताधिकद्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिन पुरुषों ने ज्ञान से अपना अज्ञान नष्ट नहीं किया, उन्होंने करने योग्य कुछ नहीं किया। अज्ञान से पहले अहंभावना होती है, तब आगे जगत् भासित होता है। तब जीव लोक-परलोक की भावना करता है और इसी वासना से जन्म-मरण पाता है। हे राम जब तक हृदय में संसार का शब्द-अर्थ दृढ़ है, तब तक शब्द-अर्थ के अभाव का चिन्तन करे और जहाँ जगत् भासित होता है, वहाँ ब्रह्म की भावना करे। जब ब्रह्मभावना करेगा, संसार के शब्द-अर्थ से रहित होगा और उसे आत्मपद भासित होगा। हे राम! इस संसार में दो पदार्थ हैं—एक यह लोक और दूसरा परलोक। अज्ञानी इस लोक का उद्यम करते हैं, परलोक का नहीं करते, इससे दुःख पाते हैं और उनकी तृष्णा नहीं मिटती। विचारवान् पुरुष परलोक का उद्यम करते हैं, इससे यहाँ भी शोभा पाते हैं और परलोक में भी सुख पाते हैं। उनके दोनों लोकों के कष्ट मिट जाते हैं। जो इसी लोक का

४५६ ☸ योगवाशिष्ट ☸

उद्यम करते हैं, उनको दोनों ही दुःखदायक होते हैं अर्थात् यहाँ तृष्णा नहीं मिटती और आगे जाकर नरक भोगते हैं । जिन पुरुषों ने आत्मा की भलाई का यत्न किया है, उनको वही सिद्ध होता है और वे सुखी होते हैं । जिसने यत्न नहीं किया, वह दुःखी होता है । इसलिए अहंकार से रहित होने से ही आत्मपद की प्राप्ति होती है । जब तक परिच्छिन्न अहंकार होता है, तब तक दुःखी होता है, तब इसका नाम जीव होता है । जो कुछ फुरता है, उससे विश्व की उत्पत्ति होती है । जैसे नेत्रों के खोलने से रूप दिखता है और नेत्रों के मूँदने से रूप का अभाव हो जाता है, वैसे ही जब अहंता जागती है, तब दृश्य दिखता है और जब अहंता का अभाव होता है, तब दृश्य का भी अभाव हो जाता है । अहंता अज्ञान से सिद्ध होती और ज्ञान के उपजने से निवृत्त हो जाती है ।

हे राम ! यदि पुरुष अपना प्रयत्न और साथ ही सत्संग करे तो इस संसारसमुद्र से तर जावेगा । और किसी प्रकार नहीं तर सकता । हे राम ! युक्ति से जैसे विष भी अमृत हो जाता है, वैसे पुरुषार्थ से सिद्धि प्राप्त होती है । हे राम ! इस जीव को दो रोग हैं—एक यह लोक और दूसरा परलोक । उनमें दुःख पाना है । जिन पुरुषों ने सन्तों के संग रूपी औषध से इन रोगों की चिकित्सा की है, वे मुक्तरूप हैं और जिन्होंने वह औषध नहीं की, वे पुरुष पंडित हों तो भी दुःख पाते हैं । वह औषध क्या है ? शम, दम और सत्सङ्ग । इन साधनों के यत्न से जिसने आत्मपद पाया है, वह कल्याणमूर्ति है । हे राम ! चिकित्सा भी यही है । जिसने औषध की, वह कृतार्थ हुआ और जिन्होंने न की, वे भोग में लिपटे रहे । वे मूर्ख वहाँ पड़ेंगे, जहाँ फिर कोई औषध न पावेंगे । इससे हे राम ! इन भोगों का त्याग करो और आत्मविचार में सावधान हो रहो—यही औषध है । हे राम ! जिस पुरुष ने मन नहीं जीता, वह मूढ़ है—वह भोगरूपी कीचड़ में डूबा है और आपदा का पात्र है । जैसे समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं, वैसे ही उसको आपदा प्राप्त होती है । जिसकी तृष्णा भोग से निवृत्त हुई है और वैराग्य उपजा है, वह मुक्त होता है ।

निर्वाण प्रकरण ४५७

जैसे जीवन का आदि बालक अवस्था है, वैसे ही निर्वाणपद का आदि वैराग्य है । हे राम ! जैसे दूसरा चन्द्रमा, संकल्पनगर और मृगतृष्णा का जल भ्रम से भासित होता है, वैसे ही यह जगत् भ्रम से प्रकट है । संसार का बीज अहंता है । जब अहंता उदय होती है, तब रूप और अवलोक भासित होता है । इससे यही चिन्तन करो कि मैं नहीं हूँ । जब यही भावना करोगे, तब शेष जो रहेगा वही तुम्हारा शान्तरूप है । उसमें आकाश भी शून्य है । अहं के उत्थान से रहित जड़-अजड़ सब केवल आत्मत्वमात्र है ।

जड़ता का उसमें अभाव है, इससे अजड़ और केवल ज्ञानमात्र है । उसमें विश्व ऐसे है जैसे जल में तरङ्ग, पवन में स्पन्दन और आकाश में शून्यता । आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जो आत्मा से कुछ भिन्न होता तो प्रलय में उसका नाश हो जाता । पर आत्मा तो प्रलयकाल में भी रहता है । जैसे सूर्य की किरणों में सदा जल का आभास रहता है, वैसे ही आत्मा में विश्व का चमत्कार रहता है । जैसे स्वप्नसृष्टि अनुभवस्वरूप होती है, वैसे ही यह जाग्रतसृष्टि भी अनुभव है । आत्मा भीतर बाहर से रहित, अद्वैत, अजर, अमर चैत्य से रहित, चैतन्य और सब शब्द-अर्थ का अधिष्ठान है । अहं के स्फुरण से दूसरा भासित होता है । फुरना, न फुरना वही है । जैसे चलना और ठहरना, दोनों पवन के रूप हैं । जब पवन चलता है तब प्रतीत होता है और जब ठहरता है, तब नहीं मालूम पड़ता, वैसे ही जब चित्तशक्ति फुरती है, तब विश्वरूप होकर भासित होती है और जब नहीं स्फुरित होती, तब केवल मात्र पद रहता है । वह पद निराभास, अविनाशी, निर्विकल्प और सबका अपना रूप है । सत्य, असत्य, जड़, चेतन आदिक सब शब्द-अर्थ उसी अधिष्ठानसत्ता में फुरते हैं । इससे उसी अपने स्वरूप में स्थित होओ, जो परमार्थसत्ता आत्मतत्त्व, अपने स्वभाव में स्थित और अहं-त्वं से रहित केवल आकाश-रूप, सबका अधिष्ठान है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शान्तिस्थितियोगोपदेशोनाम शताधिकत्रिपञ्चाशत्तमसर्गः ॥ १५३ ॥

४५८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

वशिष्टजी बोले, हे राम ! जिनको दुःख-सुख चलाते हैं, जो इन्द्रियों के इष्ट में सुखी और अनिष्ट में दुःखी होते हैं और रागद्वेष के अधीन रहते हैं, उनको नष्ट हुए जानो। जिनका पुरुष प्रयत्न नष्ट हुआ है, वे बारम्बार जन्म पावेंगे, और जिनको सुख-दुःख नहीं चलाते, उनको अविनाशी जानो। वे जन्म मरण की फाँसी से मुक्त हुए हैं और उनके लिए शास्त्र का उपदेश नहीं है। हे राम! रागद्वेष तब होता है, जब मन में इच्छा होती है, और इच्छा तब होती है, जब संसार की सत्यता मन में दृढ़ होती है। मनुष्य जिसको असत्य जानता है, उसको बुद्धि नहीं ग्रहण करती और उसकी इच्छा भी नहीं होती। और जिसको सत्य जानता है, उसमें बुद्धि दौड़ती है। हे राम! अज्ञानी को संसार सत्य लगता है, इससे दुःख पाता है। जब वह शान्तपद का यत्न करे, तब दुःख से मुक्त हो। जिसमें अहँ, त्वं, जगत्, ब्रह्म आदि शब्द कोई नहीं और जो केवल चिन्मात्र आकाशरूप है, उसमें ये शब्द कैसे हों ? ये सब शब्द विचार के निमित्त कहे हैं, वास्तव में कोई शब्द नहीं है। वह अद्वैत और चैत्य से रहित चिन्मात्र है। जब सब शब्दों का बाध हुआ, तब शेष शान्तपद रहता है। इसी से उसे आत्मत्त्वमात्र कहा है। यह जगत् उसी में भासित होता है। इस जगत् में जहाँ ज्ञप्ति जाती है, उसका ज्ञान होता है।

हे राम ! एक अधिष्ठानज्ञान है और दूसरा ज्ञप्तिज्ञान । अधिष्ठान-ज्ञान सर्वज्ञ ईश्वर को है और ज्ञप्तिज्ञान जीव को । एक लिङ्ग शरीर का जिसको अभिमान है वह जीव है, और सबलिङ्ग शरीरों का अभिमानी ईश्वर है। जहाँ इस जीव की ज्ञप्ति पहुँचती है, उसको यह जानता है। जैसे एक शय्या पर दो पुरुष सोये हों और एक को स्वप्न आये कि मेघ गर्जते हैं, तब दूसरा उस मेघ का शब्द नहीं सुनता; क्योंकि ज्ञप्ति उसको नहीं आई, परन्तु मेघ तो उसके स्वप्न में है। जैसे सिद्ध विचरते हैं और जीव को नहीं दिखते, क्योंकि उसकी ज्ञप्ति उन तक नहीं जाती। सब सृष्टि बसती है, उसका ज्ञान ईश्वर को है। वह सृष्टि भी संकल्पमात्र है; कुछ बनी नहीं और भ्रम से भासित होती है। जैसे बादल में हाथी,

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ [४५६]

घोड़े, मनुष्य आदिक विकार (रूपांतर) जो दिखते हैं, वे भ्रान्तिमात्र हैं, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से नाना प्रकार की यह सृष्टि भासित होती है। हे राम! यह आश्चर्य है कि आत्मा में अहंकार का उत्थान होता है कि मैं हूँ और वह अपने को वर्णाश्रमी मानता है। पर विचार करके देखिये तो अहं कुछ वस्तु नहीं सिद्ध होती, और अहं अहं फुरती है। यह आश्चर्य है कि भूत (अहं) कहाँ से उठा है और शुद्ध आत्मब्रह्म में कैसे उपस्थित हुआ? अस्तित्वहीन निर्मूल अहंकार ने तुमको मोहित किया है। इसके त्यागने में तो कुछ यत्न नहीं। इसका त्याग करो। हे राम! यह संकल्प मिथ्या उठा है। जब अहंकार का उत्थान होता है, तब जगत् होता है और जब अहन्ता मिट जाती है तब जगत् का भी अभाव हो जाता है, क्योंकि कुछ बना नहीं, सब भ्रममात्र है। जैसे संकल्पनगर और स्वप्न की सृष्टि भ्रममात्र है, वैसे ही यह विश्व भी भ्रममात्र है। कुछ बना नहीं, सब आत्मतत्त्व है, उससे भिन्न नहीं। जैसे पवन के दो रूप हैं। चलता है तो भी पवन है और ठहरता है तो भी पवन है, वैसे ही विश्व भी दोनों प्रकार से आत्मस्वरूप है। जैसे पवन चलता है, तब जान पड़ता है और ठहर जाता है तब नहीं जान पड़ता, वैसे ही चित्त चैतन्यशक्ति का चमत्कार है। जब फुरता है, तब विश्व भासित होता है, पर तो भी चिद्घन है। और जब ठहर जाता है, तब विश्व नहीं भासित होता। परन्तु आत्मा सदा एकरस है। जैसे जल में तरङ्ग और सुवर्ण में जो भूषण हैं, वे उनसे भिन्न नहीं हैं, वैसे ही आत्मा में विश्व कुछ हुआ नहीं, आत्मस्वरूप ही है। ज्ञप्ति भी ब्रह्म है और ज्ञप्ति में प्रतीत विश्व भी ब्रह्म है। तब विधि निषेध और हर्ष-शोक किसका करें? सब वही है।

हे राम! संकल्प को स्थिर करके देखो कि सब तुम्हारा ही स्वरूप है। जैसे मनुष्य शयन करता है तो उसकी स्वप्नसृष्टि दिखती है और जब जागता है तब देखता है कि सब मेरा ही स्वरूप है, वैसे ही जाग्रत् विश्व भी तुम्हारा स्वरूप है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वे जलरूप हैं, वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है। और जैसे चितेरा काष्ठ में कल्पना

४६० ❇ योगवाशिष्ट ❇

करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी और जैसे मृत्तिका में कुम्हार घटादि की कल्पना करता है कि इसमें इतने पात्र बनेंगे, पर काष्ठ और मृत्तिका में तो कुछ नहीं, ज्यों का त्यों काष्ठ है और ज्यों की त्यों मृत्तिका है, परन्तु कुम्हार या बढ़ई के मन में आकार की कल्पना है, वैसे ही आत्मा में संसाररूपी पुतलियों की कल्पना मन करता है। जब मन का संकल्प निवृत्त हो, तब ज्यों का त्यों आत्मपद भासित हो। जैसे तरङ्ग जलरूप है; जिसको जल का ज्ञान है, वह तरङ्ग को भी जलरूप जानता है और जिसको जल का ज्ञान नहीं, वह तरङ्ग के भिन्न-भिन्न आकार देखता है, वैसे ही जब निससंकल्प होकर स्वरूप को देखे तब जगत् फुरने में भी आत्मसत्ता भासित होगी, अहंत्व आदिक तब जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है। तब भ्रम कैसे हो और किसको हो? सब विश्व आत्मस्वरूप है और आत्मा निरालम्ब अर्थात् चैत्य और अहंकार से रहित केवल आकाशरूप है। जब तुम उसमें स्थित होगे, तब नाना प्रकार की भावना मिट जावेगी; क्योंकि नाना प्रकार की भावना जगत् में फुरती है। जगत् का बीज अहन्ता है; जब अहंता नष्ट हो, तब जगत् का भी अभाव हो जावेगा। हे राम! अहंता का फुरना ही बन्धन और निरहंकार होना ही मोक्ष है। एक चित्तबोध है और दूसरा ब्रह्मबोध—चित्तबोध जगत् है और ब्रह्मबोध मोक्ष। चित्तबोध अहन्ता का नाम है। जबतक चित्तबोध फुरता है, तबतक संसार है और जब चित्त का अभाव होता है, तब मुक्ति होती है। इस चित्त के अभाव का नाम ब्रह्मबोध है।

हे राम! जैसे पवन चलता है, वैसे ही ब्रह्म में चित्तबोध है, और जैसे पवन ठहर जाता है, वैसे ही चित्त का ठहरना ब्रह्मबोध है। जैसे स्पन्दित और निःस्पन्द दोनों पवन ही हैं, वैसे ही चित्तबोध और ब्रह्मबोध ब्रह्म ही हैं, कुछ भिन्न नहीं। हमको तो ब्रह्म ही भासित होता है, जो चैतन्यमात्र शान्तरूप और अपने स्वभाव में स्थित है। जिसको अधिष्ठान का ज्ञान होता है, उसको विवर्त भी उसी का रूप भासित होता है और जिसको अधिष्ठान का ज्ञान नहीं होता, उसको

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४६१

भिन्न-भिन्न जगत् भासित होता है। जैसे एक बीज में पत्ते, डाल, फूल और फल दिखते हैं, पर जिसको बीज का ज्ञान नहीं, उसको ये भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं। हे राम! हमको अधिष्ठान आत्मतत्त्व का ज्ञान है, इससे हमें सब विश्व आत्मस्वरूप दिखता है। पर अज्ञानी को नाना प्रकार का विश्व और जन्म-मरण भासित होते हैं। हे राम! सब शब्द आत्मतत्त्व में फुरते हैं, और वह सबका अधिष्ठान, निराकार, निर्विकार, शुद्ध आत्मा सबका अपना रूप है। इसलिए सब विश्व आकाशरूप है, उससे भिन्न नहीं। जैसे तरङ्ग जलरूप है, वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है। चित्त जो फुरता है, उसका अनुभव करनेवाली चैतन्यसत्ता ही ब्रह्म है। तुम्हारा स्वरूप भी वही है। इसने अहं-त्वं आदिक जगत् सब ब्रह्मरूप है। तुम संशय त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित होओ। पहले तुमसे जो द्वैत-अद्वैत कहा है, वह सब उपदेशमात्र है। चित्त की वृत्ति को स्थिर करके देखो, सब ब्रह्म है, भिन्न कुछ नहीं, तब निषेध किसका कीजिये? हे राम! ज्ञानवान् चित्त की दो वृत्तियाँ कहते हैं—एक मोक्षरूप और दूसरी बन्धनरूप। जो वृत्ति स्वरूप की ओर फुरती है वह मोक्षरूप और जो दृश्य की ओर फुरती है वह बन्धन है। जो तुमको शुद्ध लगे वही करो। जो द्रष्टा है, वह दृश्य नहीं होता और जो दृश्य है, वह द्रष्टा नहीं होता। पर आत्मा तो अद्वैत है। इससे द्रष्टा में दृश्य पदार्थ कोई नहीं। तुम क्यों दृश्य की ओर झुकते हो और अनहोते दृश्य को ग्रहण करते हो? तुम्हारा द्रष्टा नाम भी दृश्य से होता है। जब दृश्य का अभाव जानो, तब अवाच्यपद है। उसको वाणी से कहा नहीं जा सकता। हे राम! जैसे अङ्गी और अङ्गवाले, आकाश और शून्यता, जल और द्रवता, बर्फ और शीतलता में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। कोई जगत् कहे अथवा ब्रह्म कहे, एक ही बात है। जगत् ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही जगत् है। इससे आत्मपद में स्थित होओ। भ्रम से जो अपने को कुछ और मानते हो, उसको त्यागकर ब्रह्म ही की भावना करो और अपने को मनुष्य कभी न जानो। जो अपने को मनुष्य जानोगे तो यह निश्चय

४६२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

अधोगति को प्राप्त करनेवाला है। इससे अपने स्वरूप में स्थित होओ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थयोगोपदेशो नाम शताधिकचतुःपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥१५४॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब देश से देशान्तर को वृत्ति जाती है तो उसके बीच जो संवित्तत्त्व है, उसका जो अनुभव करता है, वही तुम्हारा स्वरूप है। उसमें स्थित होओ और जैसी चेष्टा आवे, वैसी करो। देखो, सुनो, स्पर्श करो, गन्ध लो, बोलो, चलो, हँसो, सब क्रिया करो; परन्तु इनको जाननेवाली जो अनुभवसत्ता है, उसी में स्थित रहो। यह जाग्रत् में सुषुप्ति है। चेष्टा शुभ करो और हृदय में अहं से रहित शिला की भाँति रहो। हे राम ! तुम्हारा स्वरूप निराभास, निर्मल और शान्त है। जैसे सुमेरु पर्वत स्थित है, वैसे ही रहो। यह दृश्य अज्ञान से भासित होता है, पर तमोरूप है और आत्मा सदा प्रकाशरूप है। उस प्रकाश में अज्ञानी को तम भासित होता है। जैसे सूर्य सदा प्रकाशरूप है, पर उल्लू पक्षी को नहीं देख पड़ता, और अज्ञान के कारण अँधेरा ही जान पड़ता है, वैसे ही अज्ञानी को जो अविद्या-रूप जगत् भासित होता है, वह अविचार से सिद्ध है। अविद्या से उसकी विपर्यय-दृष्टि हुई है। पर उसका वास्तव स्वरूप निर्विकार है, अर्थात् जायते, अस्ति, वर्द्धते, परिणमते; व्यपक्षीयते, नश्यते (उत्पन्न होना, होना, बढ़ना, रूपान्तर, क्षय और विनाश) इन षट् विकारों से रहित है। पर वह उसको विकारी जानता है। आत्मा निर्विकार, निराकार है, पर उसको साकार जानता है। आत्मा आनन्दरूप है, पर उसको दुखी जानता है। आत्मा शान्तरूप है, पर उसको अशान्त जानता है। आत्मा महत् है, पर उसको लघु जानता है। आत्मा पुरातन है, पर उसको उपजा मानता है। आत्मा सर्वव्यापक है, पर उसको परिच्छिन्न जानता है। आत्मा नित्य है, पर उसको अनित्य देखता है। आत्मा चैत्य से रहित शुद्ध चिन्मात्र है, पर यह उसे चैत्यसंयुक्त देखता है। आत्मा चैतन्य है, यह उसे जड़ देखता है। आत्मा अहं से रहित सदा अपने स्वभाव में स्थित है, पर वह अनात्मा शरीर में अहं प्रतीति करता

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ४६३

है । आत्मा में अनात्मभावना में और अनात्मा आत्मभावना करता है । आत्मा निरवयव है, उसको यह अवयवी देखता है । आत्मा अक्रिय है, उसको यह सक्रिय देखता है । आत्मा निरंश है, उसको अंशांशी-भाव करके देखता है । आत्मा निरामय है, पर उसको रोगी देखता है । आत्मा निष्कलङ्क है, पर उसको कलङ्कसहित देखता है । आत्मा सदा प्रत्यक्ष है, उसको परोक्ष जानता है और जो परोक्ष है, उसको प्रत्यक्ष जानता है ।

हे राम ! यह सब विकार आत्मा में अज्ञान से देखता है, पर आत्मा शुद्ध और सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल, बड़े से बड़ा, लघु से लघु, और सर्व शब्द और अर्थ का अधिष्ठान है । हे राम ! ब्रह्मरूपी एक डब्बा है, उसमें जगतरूपी रत्न है । पर्वत और वन सहित भी जगत् देख पड़ता है, परन्तु आत्मा के निकट रुई के रोम सा लघु है । आत्मारूपी वन है, उसमें संसाररूपी मञ्जरी उपजी है । पाँचों तत्त्व-पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश उसके पत्ते हैं । उनसे यह शोभित है । यह अहंता के उदय होने से उदय होती है और अहंता का नाश होने से नष्ट होती है । आत्मा एक समुद्र है, उसमें जगतरूपी तरङ्ग हैं । वे उठती भी हैं और लीन भी हो जाती हैं । आत्माकाश में संसार भ्रममात्र है । आकाश वृक्ष की तरह है और आत्मा के प्रमाद से भासित होता है । हे राम ! मायारूपी चन्द्रमा की किरणें यह जगत् है और नेतिशक्ति नृत्य करनेवाली है । ये तीनों अविचार से सिद्ध हैं और विचार करने से शान्त हो जाते हैं । जैसे दीपक हाथ में लेकर देखिये तो अन्धकार नहीं देख पड़ता, वैसे ही विचार करके देखिये तो जगत् का अभाव हो जाता है और केवल शुद्ध आत्मा ही प्रत्यक्ष होता है । हे राम ! यह जगत् कुछ बना नहीं—जैसे किसी ने वरफ कही और किसी ने शीतलता कही तो उसमें भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । जो भेद भासित होता है, वह भ्रममात्र है । जैसे तागे और पट में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भी कुछ भेद नहीं है । हे राम ! आत्मारूपी पट में जगत्-रूपी चित्र-पुतलियाँ हैं और आत्मारूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग हैं

४६४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

सो पट और जलरूप है, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं—आत्मा ही है; आत्मा से भिन्न कुछ नहीं बना । जिससे सब पदार्थ सिद्ध होते हैं, जिससे सब क्रिया सिद्ध होती हैं और जो अनुभवरूप सदा अपौढ़ है, उसको प्रौढ़ जानना ही मूर्खता है । हे राम ! यह विश्व तुम्हारा ही स्वरूप है । तुम जागकर देखो, तुम ही एक हो और स्वच्छ आकाश, सूक्ष्म, प्रत्यक्ष ज्योति अपने रूप में स्थित है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थयोगोपदेशो नाम शताधिकपञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे जल में लहरें और तरंगें उठती हैं, सो जलरूप हैं, वैसे ही आत्मा में रूप, अवलोक और मनस्कार फुरते हैं, सो सब आत्मरूप हैं—भिन्न नहीं । हे राम ! यह शुद्ध परमात्मा का चमत्कार है और आत्मा दृश्य से रहित, शुद्ध, चिन्मात्र निर्मल और अद्वैत है; उसमें जगत् नहीं बना । हमको तो सदा वही भासित होता है—जगत् नहीं भासित होता । जैसे कोई आकाश में नगर की कल्पना करता है उसमें सब रचना देखता है तो वह उसके हृदय में दृढ़ हो जाती है, और संकल्प की सृष्टि को मिथ्या जानता है, उसको शून्याकाश ही भासित होता है, वैसे ही यह विश्व मूर्ख के हृदय में दृढ़ होता है और ज्ञानवान को आत्मरूप ही भासित होता है । जैसे मिट्टी के खिलौने की सेना होती है तो जिसको मिट्टी का ज्ञान है, वह उसमें राग-द्वेष नहीं करता और बालक मिट्टी के ज्ञान से रहित है, इससे वह उसमें राग-द्वेष करता है, वैसे ही ज्ञानवान् इस जगत् में राग-द्वेष नहीं करते, और अज्ञानी राग-द्वेष करते हैं । जैसे खिलौने में सारभूत मृत्तिका होती है, वैसे ही इस जगत् में सारभूत चैतन्य आत्मा है । जो कुछ पदार्थ दिखते हैं, वे आत्मा के विवर्त्त हैं और मिथ्या ही भ्रम से सिद्ध हुए हैं । जो वस्तु मिथ्या हो, उसमें सुख के निमित्त इच्छा करना ही मूर्खता है । हे राम ! हमको तो इच्छा कुछ नहीं; क्योंकि हमको जगत् मृगतृष्णा के जल सा लगता है, किसकी इच्छा करें ? जिसमें सत्य प्रतीति होती है, उसमें इच्छा भी होती है, और जो सत्य

  • निर्वाण प्रकरण * ४६५

ही न लगे तो इच्छा कैसे हो ? हे राम ! इच्छा ही बन्धन है, और इच्छा से रहित होने का नाम मुक्ति है । इससे ज्ञानवान् को कुछ इच्छा नहीं रहती । उसकी चेष्टा अनिश्चित ही होती है । जैसे सूखे बाँस के भीतर बाहर शून्य होता है, और उसको संवेदन कुछ नहीं फुरता, वैसे ही ज्ञानवान् के अन्तर में शान्ति होती है । अन्तर में कोई संकल्प नहीं उठता और बाहर भी कोई उपाधि नहीं । उसकी चेष्टा निःसंकल्प, निरुपाधि होती है । हे राम ! जिस पुरुष के हृदय से संसार का रस सूख गया है, वह संसार समुद्र के पार हो गया । जिसका रस नहीं सूखा, उसको राग-द्वेष फुरते हैं । उसे संसार-बन्धन में पड़ा जानो ।

हे राम ! मैं तुमसे ऐसी समाधि कहता हूँ, जो सुख से प्राप्त हो और जिससे जीव मुक्त हो । सब इच्छाओं से रहित होना ही परमसमाधि है । जिस पुरुष के मन में इच्छा उठती है, उसको उपदेश भी नहीं लगता । जैसे आरसी के ऊपर मोती नहीं ठहरता, वैसे ही उसके हृदय में उपदेश नहीं ठहरता । इच्छा ही जीव को दीन करती है । इच्छा से रहित मनुष्य शान्तरूप होता है । फिर शान्ति के लिए कुछ कर्तव्य नहीं रहता । हे राम ! हम तो इच्छा-रहित हैं, इससे हमारे भीतर-बाहर शान्ति है और हमारे लिए करने योग्य कर्तव्य कुछ नहीं । यह सब चेष्टा प्रारब्ध के अनुसार और राग-द्वेष से रहित होती है । हम बोलते हैं, परन्तु बाँसुरी की तरह जैसे बाँसुरी अहंकार से रहित बोलती है, वैसे ही ज्ञानवान् अहंकार से रहित हैं और स्वाद को ग्रहण करते हैं । जैसे कलछी सब व्यञ्जनों में डाली जाती है और उसी के द्वारा सब व्यञ्जन निकलते हैं, परन्तु उनको उनसे कुछ रागद्वेष नहीं होता । वैसे ही ज्ञानवान् स्वाद लेता है । जैसे पवन भली-बुरी गन्ध को लेता है, परन्तु उसमें राग-द्वेष से रहित है, वैसे ही ज्ञानवान् राग-द्वेष के संवेदन से रहित रहकर गन्ध को लेता है । और इसी प्रकार सब इन्द्रियों की चेष्टा करता है, परन्तु इच्छा से रहित होता है । इसी से परमसुखरूप है । जिसकी चेष्टा इच्छासहित है, वह परमदुःखी है । हे राम ! जिस पुरुष को भोग रस नहीं देते, वही सुखी है, और जिसको रस देते हैं, जिसकी राग से तृष्णा बढ़ती जाती

४६६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है, उसको ऐसा जानो, जैसे किसी के सिर पर आग लगे और वह उस पर बुझाने के निमित्त तृण डाले, तो वह बुझती नहीं, बल्कि बढ़ती जाती है, वैसे ही विषयों की इच्छा भोगने से तृप्त नहीं होगी। इच्छा ही बन्धन है, और इच्छा की निवृत्त का नाम मोक्ष है। हे राम ! यह संसार विष का वृक्ष है। उसका बीज इच्छा है। जिसकी इच्छा बढ़ती जाती है, उसका संसार बढ़ता जाता है और उसमे वह बारम्बार जन्म पाता है।

हे राम ! ऐसा सुख ब्रह्मा के लोक में भी नहीं, जैसा इच्छा की निवृत्ति में है और ऐसा दुःख नरक में भी नहीं जैसा इच्छा के उपजने में है। इच्छा के नाश का नाम मोक्ष है और इच्छा के उपजने का नाम बन्धन है। जिस पुरुष को इच्छा उत्पन्न होती है, वह दुःख पाता है और संसाररूपी गढ़े और खत्ते में पड़ता है। इच्छा एक विष की बेल है। उसको समतारूपी अग्नि से जलाओ। सम्यक्दर्शन से जलाये बिना वह बड़ा दुःख देगी और बढ़ती जायगी। हे राम ! जिस पुरुष ने इच्छा को दूर करने का उपाय नहीं किया, उसने अन्धे कूप में प्रवेश किया है। शास्त्र का श्रवण और तप, दान, यज्ञ इसी निमित्त है कि किसी प्रकार इच्छा निवृत्त हो। जो एकबारगी निवृत्त न कर सको तो धीरे-धीरे निवृत्त करो। हे राम ! यह विष की बेल बढ़कर दुःख देती है। जो पुरुष शास्त्रों को पढ़ना और इच्छा को बढ़ाता है, वह मानो दीपक हाथ में लेकर कूप में गिरता है। इच्छा एक कँटिआरी का वृक्ष है, जिसमें सर्वदा कण्टक लगे रहते हैं, उसमें कभी सुख नहीं। जैसे कोई पुरुष काँटे की शय्या पर शयन करके सुखी हुआ चाहे तो नहीं होता, वैसे ही संसार से कोई सुख पाया चाहे तो कभी न मिलेगा। जिससे इच्छा निवृत्त हो, वही उपाय करना चाहिए। इच्छा के निवृत्त होने में सुख है और उसके उत्पन्न होने में बड़ा दुःख है। हे राम! जो अनिच्छित पद में स्थित है, उसको यदि एक क्षण भी इच्छा उपजती है तो वह रुदन करता है। जैसे चोर से लुटा गया मनुष्य रुदन करता है, वैसे ही वह रुदन और पश्चात्ताप करता है और उसके नाश का

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४६७

उपाय करता है। हे राम! इच्छारूपी क्षेत्र में रागद्वेषरूपी विष की बेलि है। जो पुरुष उसे दूर करने का उपाय नहीं करता, वह मनुष्य नहीं, पशु है। यह इच्छारूपी विष का वृक्ष बढ़कर नाश का कारण होता है। इससे तुम इसका नाश करो।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इच्छानिषेधयोगोपदेशो नाम शताधिकषट्पञ्चाशत्तमसर्गः ॥ १५६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! इच्छारूपी विष के नाश का उपाय तुमसे पहले भी कहा है, और अब फिर स्पष्ट करके कहता हूँ। यह संसार इच्छा के त्याग करने के योग्य है। यदि इसे आत्मसत्ता से भिन्न कीजिये तो यह मिथ्या है, उसमें क्या इच्छा करना है? और जो आत्मा की ओर देखिए तो सब आत्मा ही है। तब क्यों इच्छा करना? इच्छा दूसरे में होती है, पर वास्तव में दूसरा तो कुछ है ही नहीं, तो इच्छा किसकी कीजिए? हे राम! द्रष्टा और दृश्य भी मिथ्या है। द्रष्टा इन्द्रियाँ और दृश्य विषय, ग्राहक इन्द्रियाँ और ग्राह्य विषय अविचार सिद्ध हैं, भ्रम से भासित होते हैं। आत्मा में कोई नहीं। जैसे स्वप्न में भ्रम से रूप दिखते हैं, वैसे ही ये ग्राह्य-ग्राहक भ्रम से भासित होते हैं। सुख-दुःख भी इन्हीं से होते हैं, आत्मा में यह कुछ नहीं है। हे राम! द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तीनों ब्रह्म में कल्पित हैं। वास्तव में सब ब्रह्म ही है। चिरकाल से हम खोज रहे हैं, परन्तु द्वैत हमको नजर नहीं आता; एक ब्रह्मसत्ता ही ज्यों की त्यों भासित होती है, जो निराभास फुरने से रहित और ज्ञानरूप है। वह आकाश से भी सूक्ष्म है, और सब जगत् भी वही है—वही मैं हूँ। हे राम! जैसे जल में तरङ्ग, आकाश में शून्यता, पवन में स्पन्दन और अग्नि में उष्णता सब वही अनन्यरूप है, वैसे ही आत्मा में जगत् अनन्यरूप है। आत्मा ही विश्व आकार होकर भासित होता है, और कुछ नहीं हुआ। हे राम! जो वही है, तब इच्छा किसकी करते हो। जब मैं तुमसे यह मोक्ष का उपाय कहता हूँ, तब तुम अपने को क्यों बन्धन में डालते हो? बड़ा बन्धन इच्छा ही है। जिस पुरुष की इच्छा बढ़ती जाती है, वह जगत्-

४६८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

रूपी मन का मृग है। उस पशु का संग कभी न करना। मूर्ख का संग बुद्धि का विपर्यय कर डालता है। इससे विपर्ययबुद्धि को त्याग कर आत्मपद में स्थित होओ। विश्व भी सब तुम्हारा अनुभव है। इसका सुख-दुःख विद्यमान भी दीखता है; परन्तु आत्मा में भ्रममात्र भासित है-कुछ है नहीं। विश्व भी आनन्दरूप शिव ही है। तुम विचार करके देखो, दूसरा तो कुछ नहीं है। जैसे मृत्तिका में नाना प्रकार की सेना, हाथी, घोड़ा, आदि होते हैं, परन्तु मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं है, वैसे ही सब विश्व आत्मरूप है, भिन्न नहीं। उसमें कारण-कार्यभाव देखना भी मूर्खता है; क्योंकि जब दूसरी वस्तु ही नहीं, तब कारण-कार्य किसका हो और इच्छा किसकी करते हो? जिस संसार की इच्छा करते हो, वह है ही नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है और सीपी में रूपा प्रतीत होता है, सो वह कुछ दूसरी वस्तु नहीं है, अधिष्ठान किरण और सीपी है, वैसे ही अधिष्ठान-रूप परमार्थसत्ता ही है। न सुख है, न दुःख, यह जगत् केवल शिवरूप है। उस शिव चिन्मात्र से मृत्तिका की सेना के समान अन्य कुछ नहीं, तब इच्छा कैसे उदय हो ?

राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो सब ब्रह्म ही है तो इच्छा-अनिच्छा भी उससे भिन्न न होगी ? इच्छा उदय हो चाहे न हो, फिर आप कैसे कहते हैं कि इच्छा का त्याग करो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष की ज्ञप्ति जागी है अर्थात् जो ज्ञानरूप आत्मा में जागा है, उसको सब ब्रह्म ही है, और इच्छा-अनिच्छा, दोनों तुल्य है। इच्छा भी ब्रह्म है और अनिच्छा भी ब्रह्म है। हे राम ! ज्यों-ज्यों ज्ञानसंवित् होती है, त्यों-त्यों वासना का क्षय होता है। जैसे सूर्य के उदय होने पर रात्रि नष्ट हो जाती है, वैसे ही ज्ञान के उपजने से वासना नहीं रहती। हे राम ! ज्ञानवान् को ग्रहण या त्याग का कुछ कर्तव्य नहीं होता और उसे इच्छा-अनिच्छा तुल्य है। यद्यपि ऐसा ही है। तथापि स्वाभाविक रूप से ही उसे वासना नहीं रहती। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार नहीं रहता, वैसे ही आत्मा का साक्षात्कार होने पर द्वैतवासना नहीं