भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 462

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४६१

भिन्न-भिन्न जगत् भासित होता है। जैसे एक बीज में पत्ते, डाल, फूल और फल दिखते हैं, पर जिसको बीज का ज्ञान नहीं, उसको ये भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं। हे राम! हमको अधिष्ठान आत्मतत्त्व का ज्ञान है, इससे हमें सब विश्व आत्मस्वरूप दिखता है। पर अज्ञानी को नाना प्रकार का विश्व और जन्म-मरण भासित होते हैं। हे राम! सब शब्द आत्मतत्त्व में फुरते हैं, और वह सबका अधिष्ठान, निराकार, निर्विकार, शुद्ध आत्मा सबका अपना रूप है। इसलिए सब विश्व आकाशरूप है, उससे भिन्न नहीं। जैसे तरङ्ग जलरूप है, वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है। चित्त जो फुरता है, उसका अनुभव करनेवाली चैतन्यसत्ता ही ब्रह्म है। तुम्हारा स्वरूप भी वही है। इसने अहं-त्वं आदिक जगत् सब ब्रह्मरूप है। तुम संशय त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित होओ। पहले तुमसे जो द्वैत-अद्वैत कहा है, वह सब उपदेशमात्र है। चित्त की वृत्ति को स्थिर करके देखो, सब ब्रह्म है, भिन्न कुछ नहीं, तब निषेध किसका कीजिये? हे राम! ज्ञानवान् चित्त की दो वृत्तियाँ कहते हैं—एक मोक्षरूप और दूसरी बन्धनरूप। जो वृत्ति स्वरूप की ओर फुरती है वह मोक्षरूप और जो दृश्य की ओर फुरती है वह बन्धन है। जो तुमको शुद्ध लगे वही करो। जो द्रष्टा है, वह दृश्य नहीं होता और जो दृश्य है, वह द्रष्टा नहीं होता। पर आत्मा तो अद्वैत है। इससे द्रष्टा में दृश्य पदार्थ कोई नहीं। तुम क्यों दृश्य की ओर झुकते हो और अनहोते दृश्य को ग्रहण करते हो? तुम्हारा द्रष्टा नाम भी दृश्य से होता है। जब दृश्य का अभाव जानो, तब अवाच्यपद है। उसको वाणी से कहा नहीं जा सकता। हे राम! जैसे अङ्गी और अङ्गवाले, आकाश और शून्यता, जल और द्रवता, बर्फ और शीतलता में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। कोई जगत् कहे अथवा ब्रह्म कहे, एक ही बात है। जगत् ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही जगत् है। इससे आत्मपद में स्थित होओ। भ्रम से जो अपने को कुछ और मानते हो, उसको त्यागकर ब्रह्म ही की भावना करो और अपने को मनुष्य कभी न जानो। जो अपने को मनुष्य जानोगे तो यह निश्चय