भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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४६० ❇ योगवाशिष्ट ❇

करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी और जैसे मृत्तिका में कुम्हार घटादि की कल्पना करता है कि इसमें इतने पात्र बनेंगे, पर काष्ठ और मृत्तिका में तो कुछ नहीं, ज्यों का त्यों काष्ठ है और ज्यों की त्यों मृत्तिका है, परन्तु कुम्हार या बढ़ई के मन में आकार की कल्पना है, वैसे ही आत्मा में संसाररूपी पुतलियों की कल्पना मन करता है। जब मन का संकल्प निवृत्त हो, तब ज्यों का त्यों आत्मपद भासित हो। जैसे तरङ्ग जलरूप है; जिसको जल का ज्ञान है, वह तरङ्ग को भी जलरूप जानता है और जिसको जल का ज्ञान नहीं, वह तरङ्ग के भिन्न-भिन्न आकार देखता है, वैसे ही जब निससंकल्प होकर स्वरूप को देखे तब जगत् फुरने में भी आत्मसत्ता भासित होगी, अहंत्व आदिक तब जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है। तब भ्रम कैसे हो और किसको हो? सब विश्व आत्मस्वरूप है और आत्मा निरालम्ब अर्थात् चैत्य और अहंकार से रहित केवल आकाशरूप है। जब तुम उसमें स्थित होगे, तब नाना प्रकार की भावना मिट जावेगी; क्योंकि नाना प्रकार की भावना जगत् में फुरती है। जगत् का बीज अहन्ता है; जब अहंता नष्ट हो, तब जगत् का भी अभाव हो जावेगा। हे राम! अहंता का फुरना ही बन्धन और निरहंकार होना ही मोक्ष है। एक चित्तबोध है और दूसरा ब्रह्मबोध—चित्तबोध जगत् है और ब्रह्मबोध मोक्ष। चित्तबोध अहन्ता का नाम है। जबतक चित्तबोध फुरता है, तबतक संसार है और जब चित्त का अभाव होता है, तब मुक्ति होती है। इस चित्त के अभाव का नाम ब्रह्मबोध है।

हे राम! जैसे पवन चलता है, वैसे ही ब्रह्म में चित्तबोध है, और जैसे पवन ठहर जाता है, वैसे ही चित्त का ठहरना ब्रह्मबोध है। जैसे स्पन्दित और निःस्पन्द दोनों पवन ही हैं, वैसे ही चित्तबोध और ब्रह्मबोध ब्रह्म ही हैं, कुछ भिन्न नहीं। हमको तो ब्रह्म ही भासित होता है, जो चैतन्यमात्र शान्तरूप और अपने स्वभाव में स्थित है। जिसको अधिष्ठान का ज्ञान होता है, उसको विवर्त भी उसी का रूप भासित होता है और जिसको अधिष्ठान का ज्ञान नहीं होता, उसको