भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 460

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ [४५६]

घोड़े, मनुष्य आदिक विकार (रूपांतर) जो दिखते हैं, वे भ्रान्तिमात्र हैं, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से नाना प्रकार की यह सृष्टि भासित होती है। हे राम! यह आश्चर्य है कि आत्मा में अहंकार का उत्थान होता है कि मैं हूँ और वह अपने को वर्णाश्रमी मानता है। पर विचार करके देखिये तो अहं कुछ वस्तु नहीं सिद्ध होती, और अहं अहं फुरती है। यह आश्चर्य है कि भूत (अहं) कहाँ से उठा है और शुद्ध आत्मब्रह्म में कैसे उपस्थित हुआ? अस्तित्वहीन निर्मूल अहंकार ने तुमको मोहित किया है। इसके त्यागने में तो कुछ यत्न नहीं। इसका त्याग करो। हे राम! यह संकल्प मिथ्या उठा है। जब अहंकार का उत्थान होता है, तब जगत् होता है और जब अहन्ता मिट जाती है तब जगत् का भी अभाव हो जाता है, क्योंकि कुछ बना नहीं, सब भ्रममात्र है। जैसे संकल्पनगर और स्वप्न की सृष्टि भ्रममात्र है, वैसे ही यह विश्व भी भ्रममात्र है। कुछ बना नहीं, सब आत्मतत्त्व है, उससे भिन्न नहीं। जैसे पवन के दो रूप हैं। चलता है तो भी पवन है और ठहरता है तो भी पवन है, वैसे ही विश्व भी दोनों प्रकार से आत्मस्वरूप है। जैसे पवन चलता है, तब जान पड़ता है और ठहर जाता है तब नहीं जान पड़ता, वैसे ही चित्त चैतन्यशक्ति का चमत्कार है। जब फुरता है, तब विश्व भासित होता है, पर तो भी चिद्घन है। और जब ठहर जाता है, तब विश्व नहीं भासित होता। परन्तु आत्मा सदा एकरस है। जैसे जल में तरङ्ग और सुवर्ण में जो भूषण हैं, वे उनसे भिन्न नहीं हैं, वैसे ही आत्मा में विश्व कुछ हुआ नहीं, आत्मस्वरूप ही है। ज्ञप्ति भी ब्रह्म है और ज्ञप्ति में प्रतीत विश्व भी ब्रह्म है। तब विधि निषेध और हर्ष-शोक किसका करें? सब वही है।

हे राम! संकल्प को स्थिर करके देखो कि सब तुम्हारा ही स्वरूप है। जैसे मनुष्य शयन करता है तो उसकी स्वप्नसृष्टि दिखती है और जब जागता है तब देखता है कि सब मेरा ही स्वरूप है, वैसे ही जाग्रत् विश्व भी तुम्हारा स्वरूप है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वे जलरूप हैं, वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है। और जैसे चितेरा काष्ठ में कल्पना