भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 463

४६२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

अधोगति को प्राप्त करनेवाला है। इससे अपने स्वरूप में स्थित होओ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थयोगोपदेशो नाम शताधिकचतुःपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥१५४॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब देश से देशान्तर को वृत्ति जाती है तो उसके बीच जो संवित्तत्त्व है, उसका जो अनुभव करता है, वही तुम्हारा स्वरूप है। उसमें स्थित होओ और जैसी चेष्टा आवे, वैसी करो। देखो, सुनो, स्पर्श करो, गन्ध लो, बोलो, चलो, हँसो, सब क्रिया करो; परन्तु इनको जाननेवाली जो अनुभवसत्ता है, उसी में स्थित रहो। यह जाग्रत् में सुषुप्ति है। चेष्टा शुभ करो और हृदय में अहं से रहित शिला की भाँति रहो। हे राम ! तुम्हारा स्वरूप निराभास, निर्मल और शान्त है। जैसे सुमेरु पर्वत स्थित है, वैसे ही रहो। यह दृश्य अज्ञान से भासित होता है, पर तमोरूप है और आत्मा सदा प्रकाशरूप है। उस प्रकाश में अज्ञानी को तम भासित होता है। जैसे सूर्य सदा प्रकाशरूप है, पर उल्लू पक्षी को नहीं देख पड़ता, और अज्ञान के कारण अँधेरा ही जान पड़ता है, वैसे ही अज्ञानी को जो अविद्या-रूप जगत् भासित होता है, वह अविचार से सिद्ध है। अविद्या से उसकी विपर्यय-दृष्टि हुई है। पर उसका वास्तव स्वरूप निर्विकार है, अर्थात् जायते, अस्ति, वर्द्धते, परिणमते; व्यपक्षीयते, नश्यते (उत्पन्न होना, होना, बढ़ना, रूपान्तर, क्षय और विनाश) इन षट् विकारों से रहित है। पर वह उसको विकारी जानता है। आत्मा निर्विकार, निराकार है, पर उसको साकार जानता है। आत्मा आनन्दरूप है, पर उसको दुखी जानता है। आत्मा शान्तरूप है, पर उसको अशान्त जानता है। आत्मा महत् है, पर उसको लघु जानता है। आत्मा पुरातन है, पर उसको उपजा मानता है। आत्मा सर्वव्यापक है, पर उसको परिच्छिन्न जानता है। आत्मा नित्य है, पर उसको अनित्य देखता है। आत्मा चैत्य से रहित शुद्ध चिन्मात्र है, पर यह उसे चैत्यसंयुक्त देखता है। आत्मा चैतन्य है, यह उसे जड़ देखता है। आत्मा अहं से रहित सदा अपने स्वभाव में स्थित है, पर वह अनात्मा शरीर में अहं प्रतीति करता