योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ४६३
है । आत्मा में अनात्मभावना में और अनात्मा आत्मभावना करता है । आत्मा निरवयव है, उसको यह अवयवी देखता है । आत्मा अक्रिय है, उसको यह सक्रिय देखता है । आत्मा निरंश है, उसको अंशांशी-भाव करके देखता है । आत्मा निरामय है, पर उसको रोगी देखता है । आत्मा निष्कलङ्क है, पर उसको कलङ्कसहित देखता है । आत्मा सदा प्रत्यक्ष है, उसको परोक्ष जानता है और जो परोक्ष है, उसको प्रत्यक्ष जानता है ।
हे राम ! यह सब विकार आत्मा में अज्ञान से देखता है, पर आत्मा शुद्ध और सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल, बड़े से बड़ा, लघु से लघु, और सर्व शब्द और अर्थ का अधिष्ठान है । हे राम ! ब्रह्मरूपी एक डब्बा है, उसमें जगतरूपी रत्न है । पर्वत और वन सहित भी जगत् देख पड़ता है, परन्तु आत्मा के निकट रुई के रोम सा लघु है । आत्मारूपी वन है, उसमें संसाररूपी मञ्जरी उपजी है । पाँचों तत्त्व-पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश उसके पत्ते हैं । उनसे यह शोभित है । यह अहंता के उदय होने से उदय होती है और अहंता का नाश होने से नष्ट होती है । आत्मा एक समुद्र है, उसमें जगतरूपी तरङ्ग हैं । वे उठती भी हैं और लीन भी हो जाती हैं । आत्माकाश में संसार भ्रममात्र है । आकाश वृक्ष की तरह है और आत्मा के प्रमाद से भासित होता है । हे राम ! मायारूपी चन्द्रमा की किरणें यह जगत् है और नेतिशक्ति नृत्य करनेवाली है । ये तीनों अविचार से सिद्ध हैं और विचार करने से शान्त हो जाते हैं । जैसे दीपक हाथ में लेकर देखिये तो अन्धकार नहीं देख पड़ता, वैसे ही विचार करके देखिये तो जगत् का अभाव हो जाता है और केवल शुद्ध आत्मा ही प्रत्यक्ष होता है । हे राम ! यह जगत् कुछ बना नहीं—जैसे किसी ने वरफ कही और किसी ने शीतलता कही तो उसमें भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । जो भेद भासित होता है, वह भ्रममात्र है । जैसे तागे और पट में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भी कुछ भेद नहीं है । हे राम ! आत्मारूपी पट में जगत्-रूपी चित्र-पुतलियाँ हैं और आत्मारूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग हैं