योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 1734 में से
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सो पट और जलरूप है, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं—आत्मा ही है; आत्मा से भिन्न कुछ नहीं बना । जिससे सब पदार्थ सिद्ध होते हैं, जिससे सब क्रिया सिद्ध होती हैं और जो अनुभवरूप सदा अपौढ़ है, उसको प्रौढ़ जानना ही मूर्खता है । हे राम ! यह विश्व तुम्हारा ही स्वरूप है । तुम जागकर देखो, तुम ही एक हो और स्वच्छ आकाश, सूक्ष्म, प्रत्यक्ष ज्योति अपने रूप में स्थित है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थयोगोपदेशो नाम शताधिकपञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे जल में लहरें और तरंगें उठती हैं, सो जलरूप हैं, वैसे ही आत्मा में रूप, अवलोक और मनस्कार फुरते हैं, सो सब आत्मरूप हैं—भिन्न नहीं । हे राम ! यह शुद्ध परमात्मा का चमत्कार है और आत्मा दृश्य से रहित, शुद्ध, चिन्मात्र निर्मल और अद्वैत है; उसमें जगत् नहीं बना । हमको तो सदा वही भासित होता है—जगत् नहीं भासित होता । जैसे कोई आकाश में नगर की कल्पना करता है उसमें सब रचना देखता है तो वह उसके हृदय में दृढ़ हो जाती है, और संकल्प की सृष्टि को मिथ्या जानता है, उसको शून्याकाश ही भासित होता है, वैसे ही यह विश्व मूर्ख के हृदय में दृढ़ होता है और ज्ञानवान को आत्मरूप ही भासित होता है । जैसे मिट्टी के खिलौने की सेना होती है तो जिसको मिट्टी का ज्ञान है, वह उसमें राग-द्वेष नहीं करता और बालक मिट्टी के ज्ञान से रहित है, इससे वह उसमें राग-द्वेष करता है, वैसे ही ज्ञानवान् इस जगत् में राग-द्वेष नहीं करते, और अज्ञानी राग-द्वेष करते हैं । जैसे खिलौने में सारभूत मृत्तिका होती है, वैसे ही इस जगत् में सारभूत चैतन्य आत्मा है । जो कुछ पदार्थ दिखते हैं, वे आत्मा के विवर्त्त हैं और मिथ्या ही भ्रम से सिद्ध हुए हैं । जो वस्तु मिथ्या हो, उसमें सुख के निमित्त इच्छा करना ही मूर्खता है । हे राम ! हमको तो इच्छा कुछ नहीं; क्योंकि हमको जगत् मृगतृष्णा के जल सा लगता है, किसकी इच्छा करें ? जिसमें सत्य प्रतीति होती है, उसमें इच्छा भी होती है, और जो सत्य