भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 466
  • निर्वाण प्रकरण * ४६५

ही न लगे तो इच्छा कैसे हो ? हे राम ! इच्छा ही बन्धन है, और इच्छा से रहित होने का नाम मुक्ति है । इससे ज्ञानवान् को कुछ इच्छा नहीं रहती । उसकी चेष्टा अनिश्चित ही होती है । जैसे सूखे बाँस के भीतर बाहर शून्य होता है, और उसको संवेदन कुछ नहीं फुरता, वैसे ही ज्ञानवान् के अन्तर में शान्ति होती है । अन्तर में कोई संकल्प नहीं उठता और बाहर भी कोई उपाधि नहीं । उसकी चेष्टा निःसंकल्प, निरुपाधि होती है । हे राम ! जिस पुरुष के हृदय से संसार का रस सूख गया है, वह संसार समुद्र के पार हो गया । जिसका रस नहीं सूखा, उसको राग-द्वेष फुरते हैं । उसे संसार-बन्धन में पड़ा जानो ।

हे राम ! मैं तुमसे ऐसी समाधि कहता हूँ, जो सुख से प्राप्त हो और जिससे जीव मुक्त हो । सब इच्छाओं से रहित होना ही परमसमाधि है । जिस पुरुष के मन में इच्छा उठती है, उसको उपदेश भी नहीं लगता । जैसे आरसी के ऊपर मोती नहीं ठहरता, वैसे ही उसके हृदय में उपदेश नहीं ठहरता । इच्छा ही जीव को दीन करती है । इच्छा से रहित मनुष्य शान्तरूप होता है । फिर शान्ति के लिए कुछ कर्तव्य नहीं रहता । हे राम ! हम तो इच्छा-रहित हैं, इससे हमारे भीतर-बाहर शान्ति है और हमारे लिए करने योग्य कर्तव्य कुछ नहीं । यह सब चेष्टा प्रारब्ध के अनुसार और राग-द्वेष से रहित होती है । हम बोलते हैं, परन्तु बाँसुरी की तरह जैसे बाँसुरी अहंकार से रहित बोलती है, वैसे ही ज्ञानवान् अहंकार से रहित हैं और स्वाद को ग्रहण करते हैं । जैसे कलछी सब व्यञ्जनों में डाली जाती है और उसी के द्वारा सब व्यञ्जन निकलते हैं, परन्तु उनको उनसे कुछ रागद्वेष नहीं होता । वैसे ही ज्ञानवान् स्वाद लेता है । जैसे पवन भली-बुरी गन्ध को लेता है, परन्तु उसमें राग-द्वेष से रहित है, वैसे ही ज्ञानवान् राग-द्वेष के संवेदन से रहित रहकर गन्ध को लेता है । और इसी प्रकार सब इन्द्रियों की चेष्टा करता है, परन्तु इच्छा से रहित होता है । इसी से परमसुखरूप है । जिसकी चेष्टा इच्छासहित है, वह परमदुःखी है । हे राम ! जिस पुरुष को भोग रस नहीं देते, वही सुखी है, और जिसको रस देते हैं, जिसकी राग से तृष्णा बढ़ती जाती