भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 467

४६६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है, उसको ऐसा जानो, जैसे किसी के सिर पर आग लगे और वह उस पर बुझाने के निमित्त तृण डाले, तो वह बुझती नहीं, बल्कि बढ़ती जाती है, वैसे ही विषयों की इच्छा भोगने से तृप्त नहीं होगी। इच्छा ही बन्धन है, और इच्छा की निवृत्त का नाम मोक्ष है। हे राम ! यह संसार विष का वृक्ष है। उसका बीज इच्छा है। जिसकी इच्छा बढ़ती जाती है, उसका संसार बढ़ता जाता है और उसमे वह बारम्बार जन्म पाता है।

हे राम ! ऐसा सुख ब्रह्मा के लोक में भी नहीं, जैसा इच्छा की निवृत्ति में है और ऐसा दुःख नरक में भी नहीं जैसा इच्छा के उपजने में है। इच्छा के नाश का नाम मोक्ष है और इच्छा के उपजने का नाम बन्धन है। जिस पुरुष को इच्छा उत्पन्न होती है, वह दुःख पाता है और संसाररूपी गढ़े और खत्ते में पड़ता है। इच्छा एक विष की बेल है। उसको समतारूपी अग्नि से जलाओ। सम्यक्दर्शन से जलाये बिना वह बड़ा दुःख देगी और बढ़ती जायगी। हे राम ! जिस पुरुष ने इच्छा को दूर करने का उपाय नहीं किया, उसने अन्धे कूप में प्रवेश किया है। शास्त्र का श्रवण और तप, दान, यज्ञ इसी निमित्त है कि किसी प्रकार इच्छा निवृत्त हो। जो एकबारगी निवृत्त न कर सको तो धीरे-धीरे निवृत्त करो। हे राम ! यह विष की बेल बढ़कर दुःख देती है। जो पुरुष शास्त्रों को पढ़ना और इच्छा को बढ़ाता है, वह मानो दीपक हाथ में लेकर कूप में गिरता है। इच्छा एक कँटिआरी का वृक्ष है, जिसमें सर्वदा कण्टक लगे रहते हैं, उसमें कभी सुख नहीं। जैसे कोई पुरुष काँटे की शय्या पर शयन करके सुखी हुआ चाहे तो नहीं होता, वैसे ही संसार से कोई सुख पाया चाहे तो कभी न मिलेगा। जिससे इच्छा निवृत्त हो, वही उपाय करना चाहिए। इच्छा के निवृत्त होने में सुख है और उसके उत्पन्न होने में बड़ा दुःख है। हे राम! जो अनिच्छित पद में स्थित है, उसको यदि एक क्षण भी इच्छा उपजती है तो वह रुदन करता है। जैसे चोर से लुटा गया मनुष्य रुदन करता है, वैसे ही वह रुदन और पश्चात्ताप करता है और उसके नाश का