योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
४६६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
है, उसको ऐसा जानो, जैसे किसी के सिर पर आग लगे और वह उस पर बुझाने के निमित्त तृण डाले, तो वह बुझती नहीं, बल्कि बढ़ती जाती है, वैसे ही विषयों की इच्छा भोगने से तृप्त नहीं होगी। इच्छा ही बन्धन है, और इच्छा की निवृत्त का नाम मोक्ष है। हे राम ! यह संसार विष का वृक्ष है। उसका बीज इच्छा है। जिसकी इच्छा बढ़ती जाती है, उसका संसार बढ़ता जाता है और उसमे वह बारम्बार जन्म पाता है।
हे राम ! ऐसा सुख ब्रह्मा के लोक में भी नहीं, जैसा इच्छा की निवृत्ति में है और ऐसा दुःख नरक में भी नहीं जैसा इच्छा के उपजने में है। इच्छा के नाश का नाम मोक्ष है और इच्छा के उपजने का नाम बन्धन है। जिस पुरुष को इच्छा उत्पन्न होती है, वह दुःख पाता है और संसाररूपी गढ़े और खत्ते में पड़ता है। इच्छा एक विष की बेल है। उसको समतारूपी अग्नि से जलाओ। सम्यक्दर्शन से जलाये बिना वह बड़ा दुःख देगी और बढ़ती जायगी। हे राम ! जिस पुरुष ने इच्छा को दूर करने का उपाय नहीं किया, उसने अन्धे कूप में प्रवेश किया है। शास्त्र का श्रवण और तप, दान, यज्ञ इसी निमित्त है कि किसी प्रकार इच्छा निवृत्त हो। जो एकबारगी निवृत्त न कर सको तो धीरे-धीरे निवृत्त करो। हे राम ! यह विष की बेल बढ़कर दुःख देती है। जो पुरुष शास्त्रों को पढ़ना और इच्छा को बढ़ाता है, वह मानो दीपक हाथ में लेकर कूप में गिरता है। इच्छा एक कँटिआरी का वृक्ष है, जिसमें सर्वदा कण्टक लगे रहते हैं, उसमें कभी सुख नहीं। जैसे कोई पुरुष काँटे की शय्या पर शयन करके सुखी हुआ चाहे तो नहीं होता, वैसे ही संसार से कोई सुख पाया चाहे तो कभी न मिलेगा। जिससे इच्छा निवृत्त हो, वही उपाय करना चाहिए। इच्छा के निवृत्त होने में सुख है और उसके उत्पन्न होने में बड़ा दुःख है। हे राम! जो अनिच्छित पद में स्थित है, उसको यदि एक क्षण भी इच्छा उपजती है तो वह रुदन करता है। जैसे चोर से लुटा गया मनुष्य रुदन करता है, वैसे ही वह रुदन और पश्चात्ताप करता है और उसके नाश का
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४६७
उपाय करता है। हे राम! इच्छारूपी क्षेत्र में रागद्वेषरूपी विष की बेलि है। जो पुरुष उसे दूर करने का उपाय नहीं करता, वह मनुष्य नहीं, पशु है। यह इच्छारूपी विष का वृक्ष बढ़कर नाश का कारण होता है। इससे तुम इसका नाश करो।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इच्छानिषेधयोगोपदेशो नाम शताधिकषट्पञ्चाशत्तमसर्गः ॥ १५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! इच्छारूपी विष के नाश का उपाय तुमसे पहले भी कहा है, और अब फिर स्पष्ट करके कहता हूँ। यह संसार इच्छा के त्याग करने के योग्य है। यदि इसे आत्मसत्ता से भिन्न कीजिये तो यह मिथ्या है, उसमें क्या इच्छा करना है? और जो आत्मा की ओर देखिए तो सब आत्मा ही है। तब क्यों इच्छा करना? इच्छा दूसरे में होती है, पर वास्तव में दूसरा तो कुछ है ही नहीं, तो इच्छा किसकी कीजिए? हे राम! द्रष्टा और दृश्य भी मिथ्या है। द्रष्टा इन्द्रियाँ और दृश्य विषय, ग्राहक इन्द्रियाँ और ग्राह्य विषय अविचार सिद्ध हैं, भ्रम से भासित होते हैं। आत्मा में कोई नहीं। जैसे स्वप्न में भ्रम से रूप दिखते हैं, वैसे ही ये ग्राह्य-ग्राहक भ्रम से भासित होते हैं। सुख-दुःख भी इन्हीं से होते हैं, आत्मा में यह कुछ नहीं है। हे राम! द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तीनों ब्रह्म में कल्पित हैं। वास्तव में सब ब्रह्म ही है। चिरकाल से हम खोज रहे हैं, परन्तु द्वैत हमको नजर नहीं आता; एक ब्रह्मसत्ता ही ज्यों की त्यों भासित होती है, जो निराभास फुरने से रहित और ज्ञानरूप है। वह आकाश से भी सूक्ष्म है, और सब जगत् भी वही है—वही मैं हूँ। हे राम! जैसे जल में तरङ्ग, आकाश में शून्यता, पवन में स्पन्दन और अग्नि में उष्णता सब वही अनन्यरूप है, वैसे ही आत्मा में जगत् अनन्यरूप है। आत्मा ही विश्व आकार होकर भासित होता है, और कुछ नहीं हुआ। हे राम! जो वही है, तब इच्छा किसकी करते हो। जब मैं तुमसे यह मोक्ष का उपाय कहता हूँ, तब तुम अपने को क्यों बन्धन में डालते हो? बड़ा बन्धन इच्छा ही है। जिस पुरुष की इच्छा बढ़ती जाती है, वह जगत्-
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रूपी मन का मृग है। उस पशु का संग कभी न करना। मूर्ख का संग बुद्धि का विपर्यय कर डालता है। इससे विपर्ययबुद्धि को त्याग कर आत्मपद में स्थित होओ। विश्व भी सब तुम्हारा अनुभव है। इसका सुख-दुःख विद्यमान भी दीखता है; परन्तु आत्मा में भ्रममात्र भासित है-कुछ है नहीं। विश्व भी आनन्दरूप शिव ही है। तुम विचार करके देखो, दूसरा तो कुछ नहीं है। जैसे मृत्तिका में नाना प्रकार की सेना, हाथी, घोड़ा, आदि होते हैं, परन्तु मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं है, वैसे ही सब विश्व आत्मरूप है, भिन्न नहीं। उसमें कारण-कार्यभाव देखना भी मूर्खता है; क्योंकि जब दूसरी वस्तु ही नहीं, तब कारण-कार्य किसका हो और इच्छा किसकी करते हो? जिस संसार की इच्छा करते हो, वह है ही नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है और सीपी में रूपा प्रतीत होता है, सो वह कुछ दूसरी वस्तु नहीं है, अधिष्ठान किरण और सीपी है, वैसे ही अधिष्ठान-रूप परमार्थसत्ता ही है। न सुख है, न दुःख, यह जगत् केवल शिवरूप है। उस शिव चिन्मात्र से मृत्तिका की सेना के समान अन्य कुछ नहीं, तब इच्छा कैसे उदय हो ?
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो सब ब्रह्म ही है तो इच्छा-अनिच्छा भी उससे भिन्न न होगी ? इच्छा उदय हो चाहे न हो, फिर आप कैसे कहते हैं कि इच्छा का त्याग करो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष की ज्ञप्ति जागी है अर्थात् जो ज्ञानरूप आत्मा में जागा है, उसको सब ब्रह्म ही है, और इच्छा-अनिच्छा, दोनों तुल्य है। इच्छा भी ब्रह्म है और अनिच्छा भी ब्रह्म है। हे राम ! ज्यों-ज्यों ज्ञानसंवित् होती है, त्यों-त्यों वासना का क्षय होता है। जैसे सूर्य के उदय होने पर रात्रि नष्ट हो जाती है, वैसे ही ज्ञान के उपजने से वासना नहीं रहती। हे राम ! ज्ञानवान् को ग्रहण या त्याग का कुछ कर्तव्य नहीं होता और उसे इच्छा-अनिच्छा तुल्य है। यद्यपि ऐसा ही है। तथापि स्वाभाविक रूप से ही उसे वासना नहीं रहती। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार नहीं रहता, वैसे ही आत्मा का साक्षात्कार होने पर द्वैतवासना नहीं
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४६६
रहती। ज्यों-ज्यों ज्ञानकला जागती है, त्यों-त्यों द्वैत का नाश होता जाता है और द्वैत के निवृत्त होने से वासना भी निवृत्त हो जाती है। हे राम! उसको ज्यों-ज्यों स्वरूपानन्द प्राप्त होता है, त्यों-त्यों संसार नीरस होता जाता है और जब संसार नीरस हो गया, तब वह वासना किसकी करे?
हे राम! इसको अमृत में विष की भावना हुई थी, इससे अमृत विष लगता था, पर जब विष की भावना का त्याग हुआ, तब अमृत तो आगे ही था, वही हो जाता है, वैसे ही जो कुछ तुमको भासित होता है, सो सब ब्रह्मरूपी अमृत ही है। जब उस ब्रह्मरूपी अमृत में अज्ञान से जगतरूपी विष की भावना होती है, तब जीव दुःख पाता है, और जब संसार की भावना त्यागी, तब आनन्दरूप ही है। उसको करना, न करना, दोनों तुल्य है। यद्यपि ज्ञानवान् में इच्छा देख पड़ती है तो भी उसके निश्चय में नहीं। उसकी इच्छा भी अनिच्छा ही है, क्योंकि उसके हृदय में संसार की भावना नहीं। तब इच्छा किसकी रहे? हे राम! यह संसार है नहीं, हमको तो आकाशरूप शून्य भासित होता है। जैसे और के मनोराज्य में आने-जाने का खेद नहीं होता, वैसे ही यह जगत् हमको और की चिन्तना सदृश है। जैसे किसी पुरुष ने मनोराज्य से मार्ग में कोई स्थान रचकर उसमें किवाड़ लगाये हों और नाना प्रकार का प्रपञ्च रचा हो तो दूसरे पुरुष को उसमें जाने के लिये कोई नहीं रोकता और न कोई किवाड़ हैं, न कोई पदार्थ है; उसको शून्यूमार्ग का निश्चय होता है, वैसे ही हमको तो सब प्रपञ्च शून्य ही प्रतीत होता है। अज्ञानी के हृदय में हमारी चेष्टा है, पर हमको ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं दीखता। हे राम! जिसको जगत् ही न दिखे, उसको इच्छा किसकी हो? जिसके हृदय में संसार की सत्यता है, उसको इच्छा भी फुरती है और उसके हृदय में रागद्वेष भी उठता है। जिसके हृदय में रागद्वेष उठता हो तो जानिये कि उसके हृदय में संसारसत्ता स्थित है। और जिसको नाना पदार्थसहित संसार सत्य प्रतीत होता हो वह मूर्ख है। वह अज्ञाननिद्रा में सोया हुआ है। जैसे निद्रादोष से कोई स्वप्न में अपना मरण देखता है,
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वैसे ही जिसको यह जगत् सत्य लगता है, वह निद्रा में सोया हुआ है।
हे राम! मैंने बहुत प्रकार के स्थान देखे हैं, जिनमें रोग और औषध भी नाना प्रकार के हैं, परन्तु इच्छारूपी छुरी के घाव की औषध नहीं देख पड़ी। वह जप, तप, पाठ, यज्ञ, दान और तीर्थ से निवृत्त नहीं होती। और जितने संसार के पदार्थ हैं, उनसे भी इच्छारूपी रोग नष्ट नहीं होता। जब आत्मरूपी औषध की जावे तभी नाश होता है, अन्यथा किसी प्रकार यह रोग नहीं जाता। हे राम! जिस पुरुष को ज्ञान प्राप्त होता है, इसकी इच्छा स्वाभाविक ही निवृत्ति हो जाती है। पर आत्मज्ञान के बिना अनेक यत्नों से भी न जावेगी, जैसे स्वप्न की वासना जागे बिना नहीं जाती और अनेक उपाय करिये तो भी दूर नहीं होती। हे राम! ज्यों-ज्यों वासना क्षीण होती है, त्यों-त्यों सुख की प्राप्ति होती है और ज्यों-ज्यों वासना की अधिकता होती है, त्यों-त्यों दुःख अधिक होते हैं। यह आश्चर्य है कि मिथ्या संसार सत्य भासित होता है। जैसे बालक को वृक्ष में बेताल दिखता है और उससे वह भय पाता है, पर वह है नहीं, वैसे ही मूर्खता से आत्मा में संसार की कल्पना है। उससे जीव दुखी होता है। हे राम! जो कुछ स्थावर-जङ्गम जगत् दिखता है सो सब ब्रह्मरूप है, ब्रह्म से भिन्न नहीं, पर भ्रम से भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। जैसे आकाश में शून्यता, जल में द्रवता और सत्य में सत्यता ही है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। वह न सत्य है और न असत्य, आत्मा अनिर्वाच्य है।
हे राम! दूसरा कुछ बना नहीं तो क्या कहिये? केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। वह सबका अपना वास्तव रूप है। जब उसका साक्षात्कार होता है, तब अहंश्रूप भ्रम मिट जाता है। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार का अभाव हो जाता है, वैसे ही आत्मा का साक्षात्कार होने पर अनात्म अभिमानरूपी अन्धकार का अभाव हो जाता है, और परम निर्वाण होता है। उसको एक और दो भी नहीं कह सकते। वह केवल शान्तरूप परम शिव है। जैसे आकाश में नीलिमा दिखती है, वैसे ही आत्मा में जगत् प्रतीत होता है। हे राम! जिन्होंने ऐसे निश्चय
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ४७१
किया है, उनको इच्छा-अनिच्छा दोनों तुल्य हैं। तो भी मेरा निश्चय यह है कि इच्छा के त्याग में सुख है। जिसकी इच्छा दिन-दिन घटती जाय, और आत्मा की ओर आवे उसको ज्ञानवान् मोक्षभागी कहते हैं; क्योंकि संसार भ्रम से सिद्ध है और अपनी ही कल्पना जगतरूप होकर दिखती है; विचार करने से कुछ नहीं निकलता। संसार के उदय होने से आत्मा को कुछ आनन्द नहीं, और नाश होने से खेद नहीं होता; क्योंकि वह भिन्न नहीं है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और मिटते हैं तो जल को हर्ष या शोक कुछ नहीं होता, क्योंकि वे जल से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप है। तब इच्छा क्या और अनिच्छा क्या ? हे राम ! आदि परमात्मा से जो चित्तशक्ति उठी है, उसमें जब अहं हुआ, तब स्वरूप का प्रमाद हुआ और यही चित्तशक्ति मनरूप हुई। फिर आगे देह और इन्द्रियाँ हुईं और अज्ञान से मिथ्याभ्रम उदय हुआ। इसी प्रकार जीव अपने साथ मिथ्या शरीर देखता है। जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफ़रूप हो जाता है, वैसे ही चित्संवित् प्रमाद की दृढ़ता से जीव मन, इन्द्रियाँ देहरूप होता है। जैसे कोई स्वप्न में अपना मरना देखता है, वैसे ही जीव शरीर को अपने साथ देखता है। जब चित्तशक्ति नष्ट होती है, तब शरीर कहाँ-और मन कहाँ। यह कुछ नहीं भासित होता ? जैसे स्वप्न में भ्रम से शरीरादिक दिखते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी जानो कि मिथ्या भ्रम से उदय है। जब अपने स्वरूप की ओर जीव आवे, तब सभी भ्रम मिट जाते हैं।
हे राम ! जैसे भ्रम से आकाश में नीलापन दिखता है, वैसे ही विश्व भी न होने पर भी भ्रम से भासित होता है। आत्मा में यह कुछ आरम्भ और परिणाम करके नहीं बना, उसी का स्वरूप है। जैसे आकाश और शून्यता तथा पवन और स्पन्दन में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव-रूप है—कुछ भिन्न नहीं, वैसे ही जगत् और आत्मा अनुभव से कुछ भिन्न नहीं है। हे राम ! चैतन्य आकाश परम शान्तरूप है। उसमें देह और इन्द्रियाँ भ्रम से प्रतीत होती हैं। क्रिया, काल, पदार्थ सब
४७२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
भ्रममात्र है । जब आत्मस्वरूप में जागकर देखोगे, तब द्वैतभ्रम निवृत्त हो जावेगा और केवल अद्वैत आत्मा ही प्रतीत होगा, दृश्य का अभाव हो जावेगा । ये पृथ्वी आदिक जो तत्त्व भासित होते हैं, सो अविद्यमान हैं और इनकी प्रतिभात होना मिथ्या उदय हुआ है । जैसे स्वप्न में न होने पर भी पृथ्वी आदिक तत्त्व प्रतीत होते हैं, परन्तु हैं नहीं, वैसे ही आत्मा में यह जगत् भासित होता है । हे राम ! पृथ्वी, दीवार, कोट, पर्वत आदि प्रपञ्च आकाशरूप हैं । तब ग्रहण या त्याग किस का हो ? आकाशरूपी दीवार पर संकल्प ने चित्त रचे हैं, और रङ्ग चेतना का चढ़ा है । इससे विश्व संकल्पमात्र है । जैसा-जैसा निश्चय होता है, वैसी ही वैसी सृष्टि प्रतीत होती है । यदि कुछ बना होता तो और का और न प्रतीत होता । इससे कुछ बना नहीं, जैसा संकल्प होता है, वैसा ही रूप आगे हो भासित होता है ।
हे राम ! सिद्धों के पास एक चूर्ण होता है । उससे वे जो चाहते हैं, सो करते हैं । पर्वत को आकाश और आकाश को पर्वत बना देते हैं । वह चूर्ण मैं तुमसे कहता हूँ । जब चित्तरूपी सिद्ध संकल्परूपी चूर्ण से स्फुरता है, तब आत्मरूपी आकाश में पर्वत हो भासित होते हैं । और जब चित्तरूपी सिद्ध का संकल्प उलटता है, तब पर्वत भी आकाशरूप भासित होता है । जैसे स्वप्न में संकल्प उठता है, तब अनुभव में पर्वत आदिक पदार्थ भासित होते हैं, और जब संकल्प से जागता है, तब स्वप्न के पर्वत आकाशरूप हो जाते हैं । तो आकाश ही पर्वतरूप हुआ और पर्वत ही आकाशरूप होता है । वैसे ही हे राम ! यह सृष्टि कुछ बनी नहीं, संकल्पमात्र है । जैसा संकल्प होता है, वैसा ही भासित होता है । जब विश्व के अत्यन्त अभाव का संकल्प किया, तब वैसा ही प्रतीत होता है । जैसे विश्व का अभ्यास किया है और विश्व भासित हुआ है, वैसे ही आत्मा का अभ्यास कीजिये तो क्यों न भासित हो ? वह तो अपना ही स्वरूप है । जब आत्मा का अभ्यास कीजियेगा, तब आत्मा ही भासित होगा, विश्व का अभाव हो जावेगा । अपने-अपने संकल्प से आकाश में अनेक सृष्टि भासित होती हैं । जैसा
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४७३
किसी का संकल्प होता है, वैसी ही सृष्टि उसको देख पड़ती है । जैसे चिन्तामणि और कल्पवृक्ष में दृढ़ संकल्प होता है तो उनसे यथेच्छित पदार्थ निकल आते हैं, पर वे कुछ बने नहीं, और चिन्तामणि भी परिणाम को प्राप्त नहीं हुई, ज्यों की त्यों पड़ी है, केवल संकल्प की दृढ़ता से वे पदार्थ भासित होते हैं, वैसे ही यह प्रपञ्च भी आकाश-रूप है । जैसे आकाश में शून्यता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है ।
हे राम ! सिद्ध के जो वचन स्फुरते हैं, वही संकल्प की तीव्रता होती है । जो चित्त शुद्ध होता है तो दूसरी सृष्टि को भी जानता है । जो पुरुष वचन सिद्ध होने के निमित्त वासना को सूक्ष्म करता है, अर्थात् रोकता है तो उससे वचन सिद्ध पाता है, और जैसा संकल्प करता है, वैसा ही सिद्ध होता है । हे राम ! जितना यह दृश्य की ओर से उपरत होकर अन्तर्मुख होता है, उतने ही वचन सिद्ध होते जाते हैं—चाहे वर दे, चाहे शाप दे, वह पूरा होता है । हे राम ! एक प्रमाण ज्ञान है कि यह पदार्थ इस प्रकार है । उसका जो नामरूप है, वह सब आकाश-रूप भ्रममात्र है—आत्मा में और कुछ नहीं । आत्मरूपी समुद्र में जगत्-रूपी तरङ्ग उठते हैं । वे आत्मरूप ही हैं । जिनको ऐसा ज्ञान हुआ है, उनको इच्छा और अनिच्छा का ज्ञान नहीं रहता और सब आकाश-रूप भासित होता है । हे राम ! आत्मरूपी फूल में यह जगत् सुगन्ध रूप है । जैसे पवन और स्पन्दन में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है । पत्थर पर लकीर खींचिये तो वह पत्थर से भिन्न नहीं होती, वैसे ही ब्रह्म से जगत् भिन्न नहीं है । हे राम ! देश, काल, पृथ्वी, आदिक तत्त्व और मैं, मेरा सब आत्मरूप और अविनाशी है । जिनको ऐसा निश्चय हुआ है, उनको रागद्वेष नहीं रहता । उन्हें सब आत्मरूप ही प्रतीत होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदुपदेशो नाम शताधिकसप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध आत्मतत्त्व में जो संवेदन हुआ है, उससे आगे जगत् भासित हुआ है । जैसे किसी के नेत्र में एक अञ्जन
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✵ योगवाशिष्ट ✵
डालकर आकाश में पर्वत उड़ते दिखाते हैं, वैसे ही अस्तित्वहीन जगत संकल्प के स्फुरण से भासित होता है। हे राम! ब्रह्मसर्ग और चित्तसर्ग में कुछ भेद नहीं। परमार्थ दृष्टि से दोनों एक ही हैं। दृष्टि, सृष्टि पर्याय हैं, और नानात्व भी इसकी भावना से भासित होते हैं। आत्मा में दूसरा कुछ नहीं बना। चित्त और चैत्य आत्मा से भिन्न नहीं। चित्त ही चैत्य होकर भासित होता है। ज्ञान से इनकी एकता होती है—इसी से दृश्य भी द्रष्टारूप है, जैसे स्वप्न में शुद्ध संवित् ही दृश्यरूप होकर स्थित होती है, और जागने से एक हो जाती है। एकता भी तब होती है, जब वही रूप हो। इससे तुम अब भी वही जानो। दृश्य, दर्शन और द्रष्टा की त्रिपुटी भी सब वही रूप है। हे राम! जो सजाति है उसकी एकता होती है, विजाति की एकता नहीं होती। जैसे जल में जल की एकता होती है, वैसे ही बोध से सब की एकता होती है। दृश्य भी वही रूप है, जिससे एकता हो जाती है। जो दृश्य आत्मा से भिन्न होता तो एकता न होती। हे राम! आकाश आदिक तत्त्व भी आत्मरूप हैं। जिससे ये सब हैं, जो यह सब है और जो सर्वव्यापी सर्वगत सबको धारण कर रहा है, सब वही है। ऐसे सर्वात्मा को मेरा नमस्कार है। जो भासित होता है, सब वही है। जैसे जल में गलाने की शक्ति है और काष्ठ में नहीं वैसे ही ब्रह्म में भावना स्वभाव है, और में नहीं। ब्रह्मभावना से सब ब्रह्म ही भासित होता है।
हे राम! जड़ पदार्थ भी भ्रम ही हैं; क्योंकि जो दिखता है, वह ब्रह्म ही है; जड़ हो तो दिखे नहीं। जड़ चेतना शुद्ध संवित् में है, उसमें चेतन से भिन्न कुछ नहीं है। जैसे शुद्ध संवित् में स्वप्न आता है और उसमें जड़ और चेतन भी दिखते हैं, परन्तु जो जड़ दिखते हैं, वे भी उस संवित् में चेतन हैं; क्योंकि चेतन हैं, तब दिखते हैं। जिनको शुद्ध संवित् में अहं प्रत्यय नहीं, वह अज्ञानी है जान नहीं सकता। परन्तु सब ब्रह्म है। जैसे समुद्र में जो जल होता है, वह ऊँचे आवे तो भी जल है और नीचे को जावे तो भी जल है, वैसे ही जो कुछ दीखता या भासित होता है, सो सब ब्रह्मस्वरूप है, भिन्न नहीं। वह ब्रह्म इन्द्रियों का भी
✻ निर्वाण प्रकरण ✻
४७५
आत्मा है। पृथ्वी आदिक तत्त्व जो प्रकट हुए हैं, उनमें प्रथम आकाश है, फिर वायु, फिर अग्नि, फिर जल और फिर पृथ्वी प्रकट हुई है। ये सब अनिच्छित चमत्कार प्रकट हुए हैं—इससे सब आत्मरूप हैं। जैसे वट-बीज में वृक्ष होता है वैसे ही आत्मरूपी बीज में जगत् होता है और नाना प्रकार भासित होते हैं। हे राम ! जैसे एक बीज ही नाना प्रकार के रूप रखता है, परन्तु बीज से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही आत्मसत्ता नाना प्रकार से भासित होती है, परन्तु बीज की तरह परिणामी नहीं है। विश्व आत्मा का चमत्कार है, इससे उसी का रूप है। जैसे सुवर्ण में अनेक आभूषण होते हैं, सो वे सुवर्ण भिन्न नहीं होते वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है, द्वैत नहीं। जो आत्मा से इतर हो तो भासित न हो; इससे जो भासित होता है, वह चैतन्यरूप है। दृश्य और द्रष्टा एक ही रूप है; द्रष्टा ही दृश्य की तरह होकर भासित होता है।
हे राम ! जैसे कोई पुरुष तुम्हारे निकट सोया हो और उसको स्वप्न आवे कि मेघ गर्जते हैं और नाना प्रकार की चेष्टा होती है तो वह सब उसी को दिखता है, तुमको नहीं दिखता, वैसे ही यह दृश्य तुम्हारी भावना में स्थित है और हमको आकाशरूप है। हे राम ! चैतन्य आकाश शान्त-रूप है; उसमें सृष्टि नहीं बनी और जब कुछ उपजा नहीं तो नष्ट भी नहीं होता। वह केवल शान्तरूप है, पर भ्रम से जगत् दिखता है। कोई जैसे बालक मनोराज्य से आकाश में पुतलियाँ रचे तो आकाश में कुछ नहीं बना, परन्तु उसके संकल्प में है, वैसे ही यह विश्व मनरूपी बालक ने रचा है। उसके रचे हुए में ज्ञानवान् को शून्यता भासित होती है। हे राम ! संकल्पमात्र से ही सृष्टि हुई है। जब इसका संकल्प नष्ट होता है, तब शान्तपद शेष रहता है। निरहंकार सत्तामात्र असत् की तरह स्थित है। फिर उस चिन्मात्र अद्वैत में अहन्ता करके जगत् भासित होता है। जब अहं भाव उठता है, तब जगत् भासित होता है, और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब अहन्तारूप भ्रम मिट जाता है, जब अहन्ता-रूप भ्रम मिट जाता है, तब जगत् और इच्छा का भी अभाव हो जाता है। इससे ज्ञानी को इच्छा और वासना कोई नहीं रहती। जब परिच्छिन्न
४७६ ☸ योगवाशिष्ट ☸
रूप अहन्ता नष्ट होता है, तब जीव उस पद को प्राप्त होता है, जिसमें अणिमा आदिक सिद्धियाँ भी सूखे तृण की तरह तुच्छ लगती हैं। वह ऐसा आनन्दरूप है जिसमें ब्रह्मादिक का सुख भी तृण समान लगता है। हे राम ! जिसको ऐसा ब्रह्मानन्द पद प्राप्त हुआ है, उसको फिर किसी की इच्छा नहीं रहती। मारनेवाले विष आदिक पदार्थ उसको मृतक नहीं करते और जिलानेवाले पदार्थ अमृत आदिक नहीं जिलाते, केवल निर्वाणपद में उसकी स्थिति है।
हे राम ! जिस पुरुष को संपूर्ण संसार से वैराग्य हुआ है, उसको संसार के पदार्थ सुखदायक नहीं लगते, मिथ्या जान पड़ते हैं। वह संसारसमुद्र के पार हो गया है। जिनकी संसार की वासना और अहंता नष्ट हुई है, उनकी मूर्ति देखने भर को भासित होती है। वे वासनाहीन ज्ञानवान् शान्तरूप हैं। हे राम ! इच्छा ही बन्धन है। जब इच्छा का अभाव हो, तब आनन्द हो। इच्छा भी तब उठती है, जब जीव संसार का सत्य जानता है और संसार की सत्यता अहंता से प्रतीत होती है। जब अहंतारूपी बीज नष्ट हो, तब निर्वाणपद की प्राप्ति हो। हे राम ! संसार कुछ बना नहीं, भ्रम से सिद्ध हुआ है। सब ही ब्रह्म है; उस परमात्मा में जो परिच्छिन्न अहंता उत्पन्न हुई, वही उपाधि है। हे राम ! बुद्धि आदि जितने दृश्य हैं, ये जिसको अपने में स्वाद नहीं देते और जो आकाश की तरह निसंग रहता है, उसको सन्त मुक्तरूप कहते हैं। हे राम ! यह अहंता अविचार से उपजती है और विचार करने में असत्य हो जाती है। वास्तव में अहंता दुःख देती है; इससे तुम निरहंकार होकर चेष्टा करो। जैसे यन्त्र की पुतली अहं अभिमान से रहित चेष्टा करती है, वैसे ही तुम निरहंकार होकर चेष्टा करो और अपने स्वरूप में स्थित होओ, तब व्यवहार और अव्यवहार तुमको तुल्य हो जावेगा। जैसे पवन को स्पन्दन-निःस्पन्द, दोनों तुल्य होते हैं, वैसे ही तुमको तुल्य हो जावेगा और अहंकार से रहित तुम्हारी चेष्टा होगी। अहंता ही दुःख है; जब अहंता का नाश होगा, तब तुम शान्त, निर्मल और अनामय पद को प्राप्त होगे, जो सब पदार्थों का अधिष्ठान है और सबका अपना
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४७७
रूप है । उसमें न कोई सुख है, न दुःख है न कोई इन्द्रियों का विषय है, वह परमशान्तरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमनिर्वाणयोगोपदेशो नाम शताधिकाष्टपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो ज्ञानवान् पुरुष है, वह निरावरण अर्थात् दोनों आवरणों से रहित है । एक असत्त्वापादक आवरण है और दूसरा अभानापादक आवरण । जब आत्मब्रह्म की सत्यता हृदय में न भासित हो वह असत्त्वापादक है, और जब आत्मा की सत्यता हृदय में भासित हो; परन्तु दृढ़ प्रत्यक्ष न भासित हो, वह अभानापादकआवरण है । असत्त्वापादक आवरण अज्ञानी को होता है और अभानापादक आवरणजिज्ञासु को । पर ज्ञानवान् को ये दोनों आवरण नहीं रहते । इस से वह निरावरण, शान्तरूप आकाशवत् निर्मल और निरालम्ब होता है । किसी गुणत्व के आश्रित नहीं होता । उसका एक-द्वैत भ्रम नष्ट हो जाता है क्योंकि उसने आत्मरूपी तीर्थ में स्नान किया है, जो अपवित्र को भी पवित्र कर देता है । जिस पुरुष ने शरीर में आत्मा का दर्शन किया है, उसका शरीर भी पवित्र हो जाता है । ऐसे पुरुष को शरीर की सत्यता नहीं रहती और संसार भी नहीं रहता । आत्मा का साक्षात्कार होने से सब इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं, और सब ब्रह्म ही देख पड़ता है, द्वैत कुछ नहीं रहता । सब आत्मस्वरूप है, पर उसमें संकल्प से नाना प्रकार की सृष्टि भासित होती है ।
हे राम ! तुम संकल्प की ओर मत जाओ; क्योंकि चित्त की वृत्ति क्षण-क्षण में बदलती है और अनन्त योजनपर्यन्त चली जाती है । जो उसका अनुभव करनेवाली सत्ता मध्य में है और जिसके आश्रय मे वह जाती है, वह चिन्मात्र तुम्हारा स्वरूप है । जब तुम उसमें स्थित होकर देखोगे तब अहं या इच्छा फुरने में भी ब्रह्मसत्ता भासित होगी । हे राम ! यह संवित् सदा प्रकाशरूप, चित्त के क्षोभ से रहित और द्वैत-रूप विकार से रहित शुद्ध है । जितने प्रकाश हैं, उनके विरोधी भी हैं । जैसे दीपक का विरोधी पवन है, जो निर्वाण करता है । सूर्य का
४७८ ☸ योगवासिष्ठ ☸
विरोधी हेतु है, जो उसे घेर लेता है । महाप्रलय में सब प्रकाश तमरूप हो जाते हैं। पर आत्मप्रकाश नित्य सिद्ध है; वह तम को भी प्रकाशित करता है और सदा ज्ञानरूप एकरस है। उसको त्यागकर और किसी ओर न लगना । हे राम ! सब दृश्य मिथ्या है; जैसे रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा कल्पित हो । जब तुम जागकर देखोगे, तब सबका अभाव हो जावेगा, जैसे बन्ध्या के पुत्र के रूप का अभाव है, वैसे ही सब विश्व मिथ्या भासित होगा, क्योंकि वह है ही नहीं, भ्रममात्र स्वप्न की नाईं अविचारसिद्ध है । विचार करने से वह आत्मा ही है; भिन्न नहीं । जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव से भिन्न नहीं होती, वैसे ही यह आत्मस्वरूप विश्व भी ज्ञानमात्र है । सब अहं, मम, देह, इन्द्रियादिक भी ज्ञानमात्र हैं—दृश्य कुछ दूसरी वस्तु नहीं, जब ऐसे निश्चय करोगे; तब विगतशोक और मोह से भी रहित होंगे और परमार्थसत्ता ज्यों की त्यों भासित होगी । जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते तैसे ही आत्मा में दृश्य उठता है । वह उसका रूप है, और जो भिन्न भासित हो, वह मिथ्या है । सब सृष्टि इस मनुष्य के हृदय में स्थित है, पर अज्ञान से बाहर भासित होती है । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने भीतर होती है और अपना स्वरूप होती है, पर निद्रादोष से बाहर जान पड़ती है और जब जागता है, तब अपना स्वरूप भासित होता है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी विचार करने से अपने अनुभव में भासित होती है । इससे स्थिर होकर देखो कि यह आत्मा सर्वदा जागती ज्योति है । उसको त्यागकर और किसी के लिए यत्न करना व्यर्थ है। हे राम ! अपने अनुभव में स्थित होने में क्या कष्ट है ? जो इसे कठिन जानते हैं, वे मूढ़ हैं और उनको धिक्कार है; क्योंकि वे गऊ के पग को समुद्र सदृश अपार और दुस्तर जानते हैं। उनसे बड़ा और कौन मूर्ख है ? अनुभव में स्थित होना गऊ के पग के गढ़े को नाँघने की तरह ही सुगम है । जो कोई और पदार्थों को पाने की इच्छा करेगा तो उनमें व्यवधान है, पर आत्मा में कुछ व्यवधान नहीं; क्योंकि वह अपना ही रूप है ।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ४७६
हे राम ! जिन पुरुषों ने आत्मा में स्थिति पाई है, उनको मोक्ष की इच्छा भी नहीं होती तो स्वर्गादिक की इच्छा कैसे हो ? मोक्ष और स्वर्ग आत्मा में, रस्सी के सर्प सदृश, मिथ्या भासित होते हैं—उनको केवल अद्वैत आत्मा का निश्चय होता है । हे राम ! स्वप्न में सुषुप्ति नहीं और सुषुप्ति में स्वप्न नहीं—इनका अनुभव करनेवाला शुद्ध सत्ता है, और ये दोनों मिथ्या हैं । ज्ञानियों को निर्वाण और जीना, दोनों तुल्य हैं । ऐसा जानकर वे किसी की इच्छा नहीं करते—यह प्रपञ्च उनको खरगोश की सींग और वन्ध्या के पुत्र सा मिथ्या प्रतीत होता है । हे राम ! हमको तो संसार सदा आकाशरूप लगता है । यदि तुम कहो कि उपदेश क्यों करते हो ? तो हमको कुछ आभास नहीं, तुम्हारी ही इच्छा तुमको वशिष्ठरूप होकर उपदेश करती है । हमको विश्व सदा शून्यरूप भासमान है । अज्ञानी हमको चेष्टा करते भी जानते हैं, पर हमारे निश्चय में चेष्टा भी नहीं, और हमारी चेष्टा कुछ अर्थाकार भी नहीं । अज्ञानी की चेष्टा अर्थाकार होती है; हमारी चेष्टा सत्य नहीं । इससे अर्थाकार भी नहीं होती । जैसे ढोल के शब्द का अर्थ नहीं होता कि क्या कहता है और वाणी से जो शब्द बोला जाता है, उसका अर्थ होता है, वैसे ही हमारी चेष्टा अर्थाकार नहीं, अर्थात् जन्म नहीं देती, और अज्ञानी की चेष्टा जन्म देती है । हमको संसार ऐसे प्रतीत होता है, जैसे अवयवी सब अवयवों को अपना स्वरूप ही देखता है, अर्थात् हाथ, पैर, शीश आदि सबको अपने ही अङ्ग देखता है । हे राम ! जगत् में एक ऐसे जीव दिखते हैं जिनको हम स्वप्न के जीव समझ पड़ते हैं और हमको वे शून्य आकाश-सदृश प्रतीत होते हैं । उनकी दृष्टि में हम नाना प्रकार की चेष्टा करते दीखते हैं । हमको तो जगत् ऐसा भासित होता है, जैसे समुद्र में तरङ्ग । मैं भी ब्रह्म हूँ, तुम भी ब्रह्म हो, जगत् भी ब्रह्म है और रूप, अवलोक, मनस्कार सब ब्रह्मरूप है । इससे तुम भी सर्वत्र ब्रह्म की भावना करो । अपने स्वभाव में स्थित होना परम कल्याण है और पर स्वभाव में स्थित होना दुःख है ।
४८० ❈ योगवाशिष्ठ ❈
हे राम ! अपना स्वभाव साधने का नाम मोक्ष और न साधने का नाम बन्धन है। हे राम ! धन, मित्र, कर्म आदि कोई पदार्थ उपकार नहीं करता, केवल अपना पुरुषार्थ ही उपकार करता है अर्थात् काम आता है। अत एव अपने चैतन्य स्वभाव में स्थित होना और पर स्वभाव का त्याग करना ठीक है। जब अपने स्वभाव में स्थित होगे तब सब अपना ही स्वरूप प्रतीत होगा। जो स्वरूप से भिन्न होकर देखो तो न मैं हूँ, न तुम हो और न जगत् है; सब भ्रममात्र है और मृगतृष्णा के जलसदृश भासता है। ऐसे जानो कि मैं भी ब्रह्म हूँ, तुम भी ब्रह्म हो और जगत् भी ब्रह्म है। या ऐसे जानो कि न तुम हो, न मैं हूँ और न जगत् है। तो पीछे जो शेष रहेगा, वही तुम्हारा स्वरूप है। हे राम ! जिन पुरुषों को ऐसा निश्चय हुआ है कि मैं, तुम और जगत्, सब ब्रह्म है, अथवा मैं, तुम और जगत्, सब मिथ्या है, उनको फिर कोई इच्छा नहीं रहती। और जिनको इच्छा उठती है, उनको जानिये कि ब्रह्म आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ। जब भोगों की वासना निवृत्त हो और संसार नीरस हो जाय, तब जानिये कि यह संसार से पार हुआ अथवा होगा। हे राम ! यह निश्चय करके जानो कि जिसकी भोगों की वासना क्षीण हो जाती है, उसका स्वभावरूपी सूर्य उदय होता है और भोगों की तृष्णारूपी रात्रि नष्ट हो जाती है। यद्यपि उसमें प्रत्यक्ष भोगों की तृष्णा देख पड़ती है, तो भी भीतर वासना जाती रहती है और ब्रह्मसत्ता ही सबमें भासित होती है। संसार की ओर से वह सुषुप्त और मृतक के समान हो जाता है, अपने स्वरूप में सदा जाग्रत् रहता है और अपने स्वभावरूपी अमृत में मग्न हो जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाण प्रकरणे वशिष्ठगीतोपदेशो नाम शताधिकैकोनषष्टितमस्सर्गः ॥ १५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार, ये पर-स्वभाव हैं; इनको ब्रह्मरूप जानो। परस्वभाव क्या है और ब्रह्मरूप क्या है, यह भी सुनो। हे राम ! तुम्हारा स्वरूप शुद्ध आकाश है और उसमें जो रूप, अवलोक और मनस्कार दिखते हैं, वे माया से उपजे
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४८१
है। माया स्वभाव से परस्वभाव है, परन्तु इनका अधिष्ठान आत्मसत्ता है, इससे आत्मस्वरूप है। आत्मा को जानने से इसका अभाव हो जाता है। हे राम! जब ज्ञान उपजता है, तब संसार स्वप्न समान हो जाता है, और उसकी सत्ता कुछ नहीं भासित होती। जब दृढ़ता होती है, तब सुषुप्त हो जाता है, इनका भाव भी नहीं रहता, तुरीयावस्था में स्थित होता है। जब जीव तुरीयातीत होता है, तब अभाव का भी अभाव हो जाता है, और परमकल्याणरूप सत्ता समानपद को प्राप्त होती है, जो आदि-अन्त से रहित परमपद है। ऐसा मैं ब्रह्मस्वरूप, परमशान्तरूप और निर्दोष हूँ। सब जगत् भी ब्रह्मरूप है। मुझको सदा यही निश्चय है, और ऐसा भाव हृदय में नहीं उठता कि मैं वशिष्ठ हूँ। मेरा परिच्छिन्न अहंकार नष्ट हो गया है, इससे मैं निरहंकारपद में स्थित हूँ। जब तुम ऐसे होकर स्थित होगे, तब परम निर्मल स्वरूप हो जाओगे। जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही तुम भी शोभित होगे। हे राम! पुरुष को कैसे बन्धन होता है, जिससे वह आत्मपद को नहीं प्राप्त होता, यह भी सुनो। प्रथम धन और गृह का बन्धन है। दूसरा भोग की तृष्णा और तीसरा बान्धवों का बन्धन है। जिसको इन तीनों की वासना होती है, उसको धिक्कार है। यह वासना बड़ा अनर्थ करनेवाली है। यह भोग महारोग है। बान्धव दृढ़बन्धनरूप हैं और अर्थ की प्राप्ति अनर्थ का कारण है। इससे इस वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित होओ। यह संसार भ्रममात्र है। इसकी वासना करना व्यर्थ है। इसको सत्य न जानना। यह जो तुमको संग और मिलाप प्रतीत होता है, सो ऐसा है, जैसे बैठे हुए स्मरण आवे कि मैं अमुक से मिला था तो उसकी वह प्रतिमा प्रत्यक्ष हृदय में भासित होती है। जैसे संकल्प से मन में नगर रच लिया तो उसमें मनुष्यादिक के चित्र भासित होने लगते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी जानो। हे राम! तुम, मैं और यह जगत् भ्रममात्र और संकल्पनगर के समान है। जैसे भविष्यत् नगर की रचना है, वैसे ही यह जगत् है। कर्त्ता, क्रिया और कर्म जो भासित होते हैं, वे भी भ्रममात्र हैं। केवल
४८२ ❊ योगवाशिष्ट ❊
आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। आत्मरूपी आकाश में यह जगत् पुतलियों के समान है और संकल्प से ही प्रत्यक्ष हुआ है। वास्तव में केवल शान्तरूप आत्मतत्त्व है। हे राम! जो पुरुष स्वभाव-निष्ठ हैं, उनको आत्मतत्त्व ही भासित होता है और जिनको आत्म-तत्त्व का प्रमाद है, उनको नाना प्रकार का जगत् भासित होता है, पर आत्मा में यह जगत् कुछ आरम्भ परिणाम से नहीं बना, जैसे सूर्य की किरणों में अज्ञान से जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् की प्रतीति होती है। जब आत्मा का सम्यक्ज्ञान हो, तब जगत् का भ्रम निवृत्त हो जाता है—जैसे सूर्य की किरणों के हटने से जल का भ्रम निवृत्त हो जाता है।
इति श्री० नि० वशिष्ठगीतासंसारो० नाम शताधिकषष्ठितमसर्गः ॥ १६० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! रूप, अवलोक, मनस्कार, सब ब्रह्मरूप हैं। जिसको ज्ञान प्राप्त होता है, उसको सब ब्रह्मस्वरूप दिखता है—यही ज्ञान का लक्षण है। ज्यों-ज्यों ज्ञानकला उदय होती है, त्यों-त्यों भोगों की वासना क्षीण होती जाती है, और जब पूर्णबोध की प्राप्ति होती है, तब किसी की इच्छा नहीं रहती। जैसे ज्यों-ज्यों सूर्य प्रकाशता है, त्यों-त्यों अन्धकार नष्ट होता जाता है, और जब पूर्ण प्रकाश होता है; तब रात्रि का अभाव हो जाता है, वैसे ही जिसको ज्ञान उत्पन्न हुआ है, उसको भोगों की वासना नहीं रहती। संसार उसको जले वस्त्र की तरह भासित होता है, पर अज्ञानी को सत्य लगता है। जैसे स्वप्न में सुषुप्ति नहीं होती, सुषुप्ति में स्वप्न नहीं होता, स्वप्न का पुरुष सुषुप्ति वाले को नहीं जानता और सुषुप्तिवाला स्वप्नवाले को नहीं जानता, वैसे ही जिसको तुरीयपद की प्राप्ति हो जाती है, उसको संसार का अभाव हो जाता है और वह अपने स्वभाव में स्थित होता है। जो संसार को सत् जानते हैं, वे स्वप्न नर हैं—सुषुप्ति को नहीं जानते। हे राम! तुम्हारा स्वरूप जो तुरीयपद है, उसको अज्ञानी नहीं जान सकते। जो जानें तो उनका परिच्छिन्न अहंकार नष्ट हो जावे। जब अहंकार नष्ट हुआ, तब सब आत्मा ही हुआ।
✳ निर्वाण प्रकरण ✳ ४८३
हे राम ! जीव को अहंता ने तुच्छ किया है; इससे तुम अहंता का त्याग करके अपने स्वभाव में स्थित हो जाओ। संसाररूपी एक पुतली है जो भ्रम से उठी है। उसका शीश ऊपर ब्रह्मलोक है। टखने और पाँव पाताललोक हैं दशोदिशा वक्षःस्थल हैं। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। तारागण रोम हैं। आकाश वस्त्र है। सुख-दुःख स्वभाव हैं। पवन प्राणवायु है। बगीचे भूषण हैं। द्वीप और समुद्र कङ्गण हैं और लोका-लोक पर्वत मेखला है। हे राम ! ऐसी यह पुतली नृत्य करती है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और नष्ट होते हैं, परन्तु जल ज्यों का त्यों है। वैसे ही जल की तरह सब ब्रह्मरूप है। विकार भ्रम मे देख पड़ते हैं। हे राम ! कर्त्ता, क्रिया और कर्म भी आत्मस्वरूप हैं। जब तुम आत्मा की भावना करोगे, तब तुम्हारा हृदय आकाश की तरह शून्य हो जावेगा। जैसे पत्थर की शिला जड़ होती हे, वैसे ही तुम्हारा हृदय जगत् से जड़ और शून्य हो जायगा। हे राम ! आत्मपद शान्तरूप और आकाश सदृश निर्मल है। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। यह न उदय होता है, न अस्त होता है, केवल शान्तरूप हे। उदय-अस्त भी तब होता है, जब कुछ दूसरी वस्तु होती है। पर जगत् कुछ भिन्न नहीं, आत्मास्वरूप ही है। द्वैत या एक की कल्पना से रहित आत्मा अपने आपमें स्थित है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदुपयोगोपदेशो नाम शताधिकैकषष्टितमसर्गः ॥ १६१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह विश्व आत्मा का चमत्कार है। जैसे मृत्तिका की पुतली मृत्तिका और कागज की पुतली कागज होती है वैसे ही विश्व आत्मरूप है। जैसे मृत्तिका का दीपक देखने भर का होता है और प्रकाश का काम नहीं देता, वैसे ही यह जगत् देखने भर को है, विचार करने से आत्मा के सिवा भिन्न सत्ता कुछ नहीं है इससे जगत् की सत्यता आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। जगत् की आस्था आत्मा के आश्रित होती है। जैसे जल में तरङ्ग आकाश में शून्यता और पवन में स्पंदन है, वैसे ही आत्मा में जगत् अभिन्नरूप है। जैसे
४८४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
वायु चलती है तब भी पवन है, क्योंकि उसको वायु का निश्चय है, वैसे ही जगत् का वही स्वरूप है—इससे चैतन्य है। ज्ञानवान् जानता है कि जगत् मेरा ही स्वरूप है। हे राम! यह आश्चर्य देखो कि जगत् कुछ दूसरी वस्तु नहीं, पर भ्रम के कारण भिन्न भासित होता है। जैसे कथा में कथा के पात्र विद्यमान लगते हैं और काम करते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी मनोपात्र जानो।
हे राम! जो विद्यमान है, वह अविद्यमान हो जाता है और जो अविद्यमान है वह विद्यमान हो जाता है। जैसे स्वप्न में जगत् अनुभव-स्वरूप है—भिन्न नहीं, वैसे ही जाग्रत् जगत् को विचार से देखोगे, तो ब्रह्मस्वरूप ही भासित होगा। जैसे जो पुरुष सोया होता है, स्वप्नजगत् उसी का रूप है, परन्तु जब तक निद्रादोष है, तब तक भिन्न भासित होता है, पर जब जागा, तब अपना ही रूप प्रतीत होता है, वैसे ही जब मनुष्य अपने स्वरूप में स्थित होकर देखता है, तब सब अपना रूप ही भासित होता है। हे राम! रूप, अवलोक और मनस्कार भी ब्रह्मस्वरूप है, पर आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं, वह तो निरंकार है, और मन के चिन्तन से रहित है। संकल्प से आप ही रूप, अवलोक और मनस्कार करके स्थित हुआ है, भिन्न नहीं है। सब वही है और शास्त्रकारों ने शिव, ब्रह्म, आत्मा शून्य आदि उसके नाम संकल्परूप में कहे हैं। आत्मा केवल चिन्मात्र है; वह वाणी का विषय नहीं। वह शान्तरूप-चैत्य अर्थात् दृश्य से रहित और सब शब्द-अर्थों का अधिष्ठान है, और जगत् उसका चमत्कार है। हे राम! आत्मा में एक या द्वैत की कल्पना कोई नहीं; क्योंकि वह आत्मत्वमात्र है और जगत् भी आत्मरूप है। जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं, वैसे आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। हे राम! यदि ऐसा भी किसी देश अथवा काल में हो कि सुवर्ण और भूषण में कुछ भेद हो अर्थात् सुवर्ण भिन्न हो और भूषण भिन्न हो, तथापि आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। आत्मा ही ऐसे प्रकाशमान है और अपने स्वभाव में स्थित है; दूसरी वस्तु कुछ नहीं है। जैसे मृत्तिका की सेना नाना प्रकार की संज्ञा धारण करती है, परन्तु
⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ४८५
मृतिका से भिन्न कुछ दूसरी वस्तु नहीं है; वैसे ही स्फुरण से नाना प्रकार की संज्ञाएँ देख पड़ती हैं, परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं—उसी का रूप है। हे राम! ये सब पदार्थ अनुभव से भासित होते हैं। पदार्थ की सत्ता अनुभव से भिन्न नहीं। जब तुम अनुभव में स्थित होकर देखोगे, तब अनुभवरूप अपना रूप ही देख पड़ेगा। अपना स्वभाव ज्ञानमात्र है। उसी के जानने का नाम ज्ञान है।
हे राम! ज्ञान के बिना जो तप, यज्ञ, दान आदिक क्रिया हैं, वे सब व्यर्थ हैं। सब क्रियाओं की सिद्धि ज्ञान से होती है। हे राम! जो कुछ क्रिया ज्ञान के निमित्त कीजिये, वही पुरुषप्रयत्न श्रेष्ठ है। इससे अन्यथा सब व्यर्थ है। धन के उपजाने और रखने में भी कष्ट है, परन्तु जो ज्ञान के साधन के लिए इसको राखिये और दीजिये तो यह अमृत हो जाता है। हे राम! यह जगत् भ्रममात्र है। जैसे मलिन नेत्रवाले को रूप उलटा दिखता है और स्वप्न की सृष्टि में अज्ञ तज्ञ भी भासित होते हैं, परन्तु असत्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् विद्यमान लगता है, पर अविद्यमान है। आत्मा ही सदा विद्यमान है। हे राम! विद्यमान देव विष्णु को त्यागकर जो और देव का पूजन करते हैं, उनकी पूजा सफल नहीं होती और विष्णु उन पर कुपित भी होते हैं। इसी तरह अनुभवरूप विद्यमान आत्मा को त्यागकर जो और की उपासना पूजन करते हैं, वे जन्ममरण के बन्धन से मुक्त नहीं होते—मूढ़ता में रहते हैं। आत्मदेव की पूजा सुनो। जो कुछ अनिच्छित आवे, वह उसको अर्पण कीजिये। इसके जाननेवाले में अहंप्रत्यय करना ही बड़ी पूजा है। हे राम! इस आत्मदेव से भिन्न जो सूर्य, चन्द्रमा आदिक की भेदपूजा है। वह तुच्छ है। जब तुम आत्मपूजा में स्थित होगे, तब और पूजा तुमको सूखे तृण की तरह तुच्छ प्रतीत होगी। दान भी आत्मदेव को ही करना है, सो बोध से करने योग्य है। वैराग्य, धैर्य और सन्तोष बोध का कारण है। यथा लाभ में सन्तुष्ट रहकर ब्रह्मविद्या का विचार करो और सन्तों का संग करो। इन साधनों से जब बोधरूपी सूर्य का उदय होगा, तब द्वैतरूपी अन्धकार का नष्ट हो