भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 480

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ४७६

हे राम ! जिन पुरुषों ने आत्मा में स्थिति पाई है, उनको मोक्ष की इच्छा भी नहीं होती तो स्वर्गादिक की इच्छा कैसे हो ? मोक्ष और स्वर्ग आत्मा में, रस्सी के सर्प सदृश, मिथ्या भासित होते हैं—उनको केवल अद्वैत आत्मा का निश्चय होता है । हे राम ! स्वप्न में सुषुप्ति नहीं और सुषुप्ति में स्वप्न नहीं—इनका अनुभव करनेवाला शुद्ध सत्ता है, और ये दोनों मिथ्या हैं । ज्ञानियों को निर्वाण और जीना, दोनों तुल्य हैं । ऐसा जानकर वे किसी की इच्छा नहीं करते—यह प्रपञ्च उनको खरगोश की सींग और वन्ध्या के पुत्र सा मिथ्या प्रतीत होता है । हे राम ! हमको तो संसार सदा आकाशरूप लगता है । यदि तुम कहो कि उपदेश क्यों करते हो ? तो हमको कुछ आभास नहीं, तुम्हारी ही इच्छा तुमको वशिष्ठरूप होकर उपदेश करती है । हमको विश्व सदा शून्यरूप भासमान है । अज्ञानी हमको चेष्टा करते भी जानते हैं, पर हमारे निश्चय में चेष्टा भी नहीं, और हमारी चेष्टा कुछ अर्थाकार भी नहीं । अज्ञानी की चेष्टा अर्थाकार होती है; हमारी चेष्टा सत्य नहीं । इससे अर्थाकार भी नहीं होती । जैसे ढोल के शब्द का अर्थ नहीं होता कि क्या कहता है और वाणी से जो शब्द बोला जाता है, उसका अर्थ होता है, वैसे ही हमारी चेष्टा अर्थाकार नहीं, अर्थात् जन्म नहीं देती, और अज्ञानी की चेष्टा जन्म देती है । हमको संसार ऐसे प्रतीत होता है, जैसे अवयवी सब अवयवों को अपना स्वरूप ही देखता है, अर्थात् हाथ, पैर, शीश आदि सबको अपने ही अङ्ग देखता है । हे राम ! जगत् में एक ऐसे जीव दिखते हैं जिनको हम स्वप्न के जीव समझ पड़ते हैं और हमको वे शून्य आकाश-सदृश प्रतीत होते हैं । उनकी दृष्टि में हम नाना प्रकार की चेष्टा करते दीखते हैं । हमको तो जगत् ऐसा भासित होता है, जैसे समुद्र में तरङ्ग । मैं भी ब्रह्म हूँ, तुम भी ब्रह्म हो, जगत् भी ब्रह्म है और रूप, अवलोक, मनस्कार सब ब्रह्मरूप है । इससे तुम भी सर्वत्र ब्रह्म की भावना करो । अपने स्वभाव में स्थित होना परम कल्याण है और पर स्वभाव में स्थित होना दुःख है ।