भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 481

४८० ❈ योगवाशिष्ठ ❈

हे राम ! अपना स्वभाव साधने का नाम मोक्ष और न साधने का नाम बन्धन है। हे राम ! धन, मित्र, कर्म आदि कोई पदार्थ उपकार नहीं करता, केवल अपना पुरुषार्थ ही उपकार करता है अर्थात् काम आता है। अत एव अपने चैतन्य स्वभाव में स्थित होना और पर स्वभाव का त्याग करना ठीक है। जब अपने स्वभाव में स्थित होगे तब सब अपना ही स्वरूप प्रतीत होगा। जो स्वरूप से भिन्न होकर देखो तो न मैं हूँ, न तुम हो और न जगत् है; सब भ्रममात्र है और मृगतृष्णा के जलसदृश भासता है। ऐसे जानो कि मैं भी ब्रह्म हूँ, तुम भी ब्रह्म हो और जगत् भी ब्रह्म है। या ऐसे जानो कि न तुम हो, न मैं हूँ और न जगत् है। तो पीछे जो शेष रहेगा, वही तुम्हारा स्वरूप है। हे राम ! जिन पुरुषों को ऐसा निश्चय हुआ है कि मैं, तुम और जगत्, सब ब्रह्म है, अथवा मैं, तुम और जगत्, सब मिथ्या है, उनको फिर कोई इच्छा नहीं रहती। और जिनको इच्छा उठती है, उनको जानिये कि ब्रह्म आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ। जब भोगों की वासना निवृत्त हो और संसार नीरस हो जाय, तब जानिये कि यह संसार से पार हुआ अथवा होगा। हे राम ! यह निश्चय करके जानो कि जिसकी भोगों की वासना क्षीण हो जाती है, उसका स्वभावरूपी सूर्य उदय होता है और भोगों की तृष्णारूपी रात्रि नष्ट हो जाती है। यद्यपि उसमें प्रत्यक्ष भोगों की तृष्णा देख पड़ती है, तो भी भीतर वासना जाती रहती है और ब्रह्मसत्ता ही सबमें भासित होती है। संसार की ओर से वह सुषुप्त और मृतक के समान हो जाता है, अपने स्वरूप में सदा जाग्रत् रहता है और अपने स्वभावरूपी अमृत में मग्न हो जाता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाण प्रकरणे वशिष्ठगीतोपदेशो नाम शताधिकैकोनषष्टितमस्सर्गः ॥ १५६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार, ये पर-स्वभाव हैं; इनको ब्रह्मरूप जानो। परस्वभाव क्या है और ब्रह्मरूप क्या है, यह भी सुनो। हे राम ! तुम्हारा स्वरूप शुद्ध आकाश है और उसमें जो रूप, अवलोक और मनस्कार दिखते हैं, वे माया से उपजे