योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४८१
है। माया स्वभाव से परस्वभाव है, परन्तु इनका अधिष्ठान आत्मसत्ता है, इससे आत्मस्वरूप है। आत्मा को जानने से इसका अभाव हो जाता है। हे राम! जब ज्ञान उपजता है, तब संसार स्वप्न समान हो जाता है, और उसकी सत्ता कुछ नहीं भासित होती। जब दृढ़ता होती है, तब सुषुप्त हो जाता है, इनका भाव भी नहीं रहता, तुरीयावस्था में स्थित होता है। जब जीव तुरीयातीत होता है, तब अभाव का भी अभाव हो जाता है, और परमकल्याणरूप सत्ता समानपद को प्राप्त होती है, जो आदि-अन्त से रहित परमपद है। ऐसा मैं ब्रह्मस्वरूप, परमशान्तरूप और निर्दोष हूँ। सब जगत् भी ब्रह्मरूप है। मुझको सदा यही निश्चय है, और ऐसा भाव हृदय में नहीं उठता कि मैं वशिष्ठ हूँ। मेरा परिच्छिन्न अहंकार नष्ट हो गया है, इससे मैं निरहंकारपद में स्थित हूँ। जब तुम ऐसे होकर स्थित होगे, तब परम निर्मल स्वरूप हो जाओगे। जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही तुम भी शोभित होगे। हे राम! पुरुष को कैसे बन्धन होता है, जिससे वह आत्मपद को नहीं प्राप्त होता, यह भी सुनो। प्रथम धन और गृह का बन्धन है। दूसरा भोग की तृष्णा और तीसरा बान्धवों का बन्धन है। जिसको इन तीनों की वासना होती है, उसको धिक्कार है। यह वासना बड़ा अनर्थ करनेवाली है। यह भोग महारोग है। बान्धव दृढ़बन्धनरूप हैं और अर्थ की प्राप्ति अनर्थ का कारण है। इससे इस वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित होओ। यह संसार भ्रममात्र है। इसकी वासना करना व्यर्थ है। इसको सत्य न जानना। यह जो तुमको संग और मिलाप प्रतीत होता है, सो ऐसा है, जैसे बैठे हुए स्मरण आवे कि मैं अमुक से मिला था तो उसकी वह प्रतिमा प्रत्यक्ष हृदय में भासित होती है। जैसे संकल्प से मन में नगर रच लिया तो उसमें मनुष्यादिक के चित्र भासित होने लगते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी जानो। हे राम! तुम, मैं और यह जगत् भ्रममात्र और संकल्पनगर के समान है। जैसे भविष्यत् नगर की रचना है, वैसे ही यह जगत् है। कर्त्ता, क्रिया और कर्म जो भासित होते हैं, वे भी भ्रममात्र हैं। केवल