भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 483

४८२ ❊ योगवाशिष्ट ❊

आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। आत्मरूपी आकाश में यह जगत् पुतलियों के समान है और संकल्प से ही प्रत्यक्ष हुआ है। वास्तव में केवल शान्तरूप आत्मतत्त्व है। हे राम! जो पुरुष स्वभाव-निष्ठ हैं, उनको आत्मतत्त्व ही भासित होता है और जिनको आत्म-तत्त्व का प्रमाद है, उनको नाना प्रकार का जगत् भासित होता है, पर आत्मा में यह जगत् कुछ आरम्भ परिणाम से नहीं बना, जैसे सूर्य की किरणों में अज्ञान से जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् की प्रतीति होती है। जब आत्मा का सम्यक्ज्ञान हो, तब जगत् का भ्रम निवृत्त हो जाता है—जैसे सूर्य की किरणों के हटने से जल का भ्रम निवृत्त हो जाता है।

इति श्री० नि० वशिष्ठगीतासंसारो० नाम शताधिकषष्ठितमसर्गः ॥ १६० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! रूप, अवलोक, मनस्कार, सब ब्रह्मरूप हैं। जिसको ज्ञान प्राप्त होता है, उसको सब ब्रह्मस्वरूप दिखता है—यही ज्ञान का लक्षण है। ज्यों-ज्यों ज्ञानकला उदय होती है, त्यों-त्यों भोगों की वासना क्षीण होती जाती है, और जब पूर्णबोध की प्राप्ति होती है, तब किसी की इच्छा नहीं रहती। जैसे ज्यों-ज्यों सूर्य प्रकाशता है, त्यों-त्यों अन्धकार नष्ट होता जाता है, और जब पूर्ण प्रकाश होता है; तब रात्रि का अभाव हो जाता है, वैसे ही जिसको ज्ञान उत्पन्न हुआ है, उसको भोगों की वासना नहीं रहती। संसार उसको जले वस्त्र की तरह भासित होता है, पर अज्ञानी को सत्य लगता है। जैसे स्वप्न में सुषुप्ति नहीं होती, सुषुप्ति में स्वप्न नहीं होता, स्वप्न का पुरुष सुषुप्ति वाले को नहीं जानता और सुषुप्तिवाला स्वप्नवाले को नहीं जानता, वैसे ही जिसको तुरीयपद की प्राप्ति हो जाती है, उसको संसार का अभाव हो जाता है और वह अपने स्वभाव में स्थित होता है। जो संसार को सत् जानते हैं, वे स्वप्न नर हैं—सुषुप्ति को नहीं जानते। हे राम! तुम्हारा स्वरूप जो तुरीयपद है, उसको अज्ञानी नहीं जान सकते। जो जानें तो उनका परिच्छिन्न अहंकार नष्ट हो जावे। जब अहंकार नष्ट हुआ, तब सब आत्मा ही हुआ।