भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 484

निर्वाण प्रकरण४८३

हे राम ! जीव को अहंता ने तुच्छ किया है; इससे तुम अहंता का त्याग करके अपने स्वभाव में स्थित हो जाओ। संसाररूपी एक पुतली है जो भ्रम से उठी है। उसका शीश ऊपर ब्रह्मलोक है। टखने और पाँव पाताललोक हैं दशोदिशा वक्षःस्थल हैं। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। तारागण रोम हैं। आकाश वस्त्र है। सुख-दुःख स्वभाव हैं। पवन प्राणवायु है। बगीचे भूषण हैं। द्वीप और समुद्र कङ्गण हैं और लोका-लोक पर्वत मेखला है। हे राम ! ऐसी यह पुतली नृत्य करती है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और नष्ट होते हैं, परन्तु जल ज्यों का त्यों है। वैसे ही जल की तरह सब ब्रह्मरूप है। विकार भ्रम मे देख पड़ते हैं। हे राम ! कर्त्ता, क्रिया और कर्म भी आत्मस्वरूप हैं। जब तुम आत्मा की भावना करोगे, तब तुम्हारा हृदय आकाश की तरह शून्य हो जावेगा। जैसे पत्थर की शिला जड़ होती हे, वैसे ही तुम्हारा हृदय जगत् से जड़ और शून्य हो जायगा। हे राम ! आत्मपद शान्तरूप और आकाश सदृश निर्मल है। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। यह न उदय होता है, न अस्त होता है, केवल शान्तरूप हे। उदय-अस्त भी तब होता है, जब कुछ दूसरी वस्तु होती है। पर जगत् कुछ भिन्न नहीं, आत्मास्वरूप ही है। द्वैत या एक की कल्पना से रहित आत्मा अपने आपमें स्थित है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदुपयोगोपदेशो नाम शताधिकैकषष्टितमसर्गः ॥ १६१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह विश्व आत्मा का चमत्कार है। जैसे मृत्तिका की पुतली मृत्तिका और कागज की पुतली कागज होती है वैसे ही विश्व आत्मरूप है। जैसे मृत्तिका का दीपक देखने भर का होता है और प्रकाश का काम नहीं देता, वैसे ही यह जगत् देखने भर को है, विचार करने से आत्मा के सिवा भिन्न सत्ता कुछ नहीं है इससे जगत् की सत्यता आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। जगत् की आस्था आत्मा के आश्रित होती है। जैसे जल में तरङ्ग आकाश में शून्यता और पवन में स्पंदन है, वैसे ही आत्मा में जगत् अभिन्नरूप है। जैसे