भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 485, कुल 1734 में से

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४८४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

वायु चलती है तब भी पवन है, क्योंकि उसको वायु का निश्चय है, वैसे ही जगत् का वही स्वरूप है—इससे चैतन्य है। ज्ञानवान् जानता है कि जगत् मेरा ही स्वरूप है। हे राम! यह आश्चर्य देखो कि जगत् कुछ दूसरी वस्तु नहीं, पर भ्रम के कारण भिन्न भासित होता है। जैसे कथा में कथा के पात्र विद्यमान लगते हैं और काम करते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी मनोपात्र जानो।

हे राम! जो विद्यमान है, वह अविद्यमान हो जाता है और जो अविद्यमान है वह विद्यमान हो जाता है। जैसे स्वप्न में जगत् अनुभव-स्वरूप है—भिन्न नहीं, वैसे ही जाग्रत् जगत् को विचार से देखोगे, तो ब्रह्मस्वरूप ही भासित होगा। जैसे जो पुरुष सोया होता है, स्वप्नजगत् उसी का रूप है, परन्तु जब तक निद्रादोष है, तब तक भिन्न भासित होता है, पर जब जागा, तब अपना ही रूप प्रतीत होता है, वैसे ही जब मनुष्य अपने स्वरूप में स्थित होकर देखता है, तब सब अपना रूप ही भासित होता है। हे राम! रूप, अवलोक और मनस्कार भी ब्रह्मस्वरूप है, पर आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं, वह तो निरंकार है, और मन के चिन्तन से रहित है। संकल्प से आप ही रूप, अवलोक और मनस्कार करके स्थित हुआ है, भिन्न नहीं है। सब वही है और शास्त्रकारों ने शिव, ब्रह्म, आत्मा शून्य आदि उसके नाम संकल्परूप में कहे हैं। आत्मा केवल चिन्मात्र है; वह वाणी का विषय नहीं। वह शान्तरूप-चैत्य अर्थात् दृश्य से रहित और सब शब्द-अर्थों का अधिष्ठान है, और जगत् उसका चमत्कार है। हे राम! आत्मा में एक या द्वैत की कल्पना कोई नहीं; क्योंकि वह आत्मत्वमात्र है और जगत् भी आत्मरूप है। जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं, वैसे आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। हे राम! यदि ऐसा भी किसी देश अथवा काल में हो कि सुवर्ण और भूषण में कुछ भेद हो अर्थात् सुवर्ण भिन्न हो और भूषण भिन्न हो, तथापि आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। आत्मा ही ऐसे प्रकाशमान है और अपने स्वभाव में स्थित है; दूसरी वस्तु कुछ नहीं है। जैसे मृत्तिका की सेना नाना प्रकार की संज्ञा धारण करती है, परन्तु

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