योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ४८५
मृतिका से भिन्न कुछ दूसरी वस्तु नहीं है; वैसे ही स्फुरण से नाना प्रकार की संज्ञाएँ देख पड़ती हैं, परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं—उसी का रूप है। हे राम! ये सब पदार्थ अनुभव से भासित होते हैं। पदार्थ की सत्ता अनुभव से भिन्न नहीं। जब तुम अनुभव में स्थित होकर देखोगे, तब अनुभवरूप अपना रूप ही देख पड़ेगा। अपना स्वभाव ज्ञानमात्र है। उसी के जानने का नाम ज्ञान है।
हे राम! ज्ञान के बिना जो तप, यज्ञ, दान आदिक क्रिया हैं, वे सब व्यर्थ हैं। सब क्रियाओं की सिद्धि ज्ञान से होती है। हे राम! जो कुछ क्रिया ज्ञान के निमित्त कीजिये, वही पुरुषप्रयत्न श्रेष्ठ है। इससे अन्यथा सब व्यर्थ है। धन के उपजाने और रखने में भी कष्ट है, परन्तु जो ज्ञान के साधन के लिए इसको राखिये और दीजिये तो यह अमृत हो जाता है। हे राम! यह जगत् भ्रममात्र है। जैसे मलिन नेत्रवाले को रूप उलटा दिखता है और स्वप्न की सृष्टि में अज्ञ तज्ञ भी भासित होते हैं, परन्तु असत्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् विद्यमान लगता है, पर अविद्यमान है। आत्मा ही सदा विद्यमान है। हे राम! विद्यमान देव विष्णु को त्यागकर जो और देव का पूजन करते हैं, उनकी पूजा सफल नहीं होती और विष्णु उन पर कुपित भी होते हैं। इसी तरह अनुभवरूप विद्यमान आत्मा को त्यागकर जो और की उपासना पूजन करते हैं, वे जन्ममरण के बन्धन से मुक्त नहीं होते—मूढ़ता में रहते हैं। आत्मदेव की पूजा सुनो। जो कुछ अनिच्छित आवे, वह उसको अर्पण कीजिये। इसके जाननेवाले में अहंप्रत्यय करना ही बड़ी पूजा है। हे राम! इस आत्मदेव से भिन्न जो सूर्य, चन्द्रमा आदिक की भेदपूजा है। वह तुच्छ है। जब तुम आत्मपूजा में स्थित होगे, तब और पूजा तुमको सूखे तृण की तरह तुच्छ प्रतीत होगी। दान भी आत्मदेव को ही करना है, सो बोध से करने योग्य है। वैराग्य, धैर्य और सन्तोष बोध का कारण है। यथा लाभ में सन्तुष्ट रहकर ब्रह्मविद्या का विचार करो और सन्तों का संग करो। इन साधनों से जब बोधरूपी सूर्य का उदय होगा, तब द्वैतरूपी अन्धकार का नष्ट हो