योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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जायगा और ज्ञानरूप ही भासित होगा। फिर जो ज्ञान उपजा है, वह भी शान्त हो जायगा; इससे उसी देव की पूजा करो, जिससे आत्म-पद को पाओ। आत्मदेव की पूजा के निमित्त फूल भी चाहिए, इसलिए आत्मविचार करके चित्त की वृत्ति अन्तर्मुख करो और यथालाम में संतुष्ट रहकर सन्तों की संगति करो, इन फूलों से आत्मा की पूजा करनी चाहिए। यह पूजा भी तब होती है, जब अन्तःकरण शुद्ध होता है। उससे ज्ञान उत्पन्न होता है। जब ज्ञान उपजता है, तब आत्मदेव का साक्षात्कार होता है। ज्ञान का लक्षण सुनो। गुरु और शास्त्र से जो वस्तु सुनी है, उसमें जब बुद्धि स्थित होती है और संसार की वासना क्षीण हो जाती है तब जीव ज्ञानी कहलाता है। जब इस ज्ञान की पूर्णता होती है, तब जगत् उसको ब्रह्मस्वरूप ही देख पड़ता है। तब उसको शस्त्र काट नहीं सकते और सिंह, सर्प, अग्नि और विष का भी भय नहीं होता।
हे राम ! यह सब विश्व आत्मरूप है। जैसी भावना कोई करता है, वैसा ही आगे देख पड़ता है। जब शास्त्र में शास्त्र के अर्थ की भावना होती है, तब वही भासित होते हैं। इसी प्रकार सर्प और अग्नि सब अपने-अपने अर्थाकार भासित होते हैं। जब सर्वत्र आत्म-भावना होती है, तब सर्वत्र आत्मा ही भासित होती है; क्योंकि दूसरी वस्तु कुछ बनी नहीं, तो दिखाई कैसे दे। जो पुरुष कृतकृत्य नहीं हुआ और अपने को कृतार्थ मानता है, पर दुःख की निवृत्ति का उपाय नहीं करता, उसे दुःख के आने से दुःख ही होगा, और दुःख उसको चला ले जावेगा। जब सुख आवेगा; तब सुख भी चला जावेगा। हे राम ! जो पुरुष सब में ब्रह्म कहता है, पर निश्चय से रहित है और शास्त्र भी बहुत देखता है, वह महामूर्ख है। जैसे जन्म का अन्धा सूर्य को नहीं जानता, वैसे ही वह आत्मअनुभव से रहित है। जब आत्मपद का साक्षात्कार होगा तब ऐसा आनन्द प्राप्त होगा, जिसके पाने से और पदार्थ नीरस लगें, ब्रह्मा से काष्ठपर्यन्त सब पदार्थ नीरस हो जायेंगे। इससे आत्मपरायण होकर सदा आत्मपद की भावना करो। हे