भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 488

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ [४८७]

हे राम ! जैसे शुद्धमणि के निकट जैसी वस्तु रखिये, वैसे ही प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही जीव जैसी भावना करता है, वैसा ही रूप भासित होता है। इससे जगत् को ब्रह्मस्वरूप जानो, और जो दूसरा भासित हो, उसे भ्रममात्र जानो। जैसे पत्थर की शिला पर पुतलियाँ लिखते हैं तो वे शिलारूप ही होती हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मस्वरूप है। जब तुमको आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब सब पदार्थ नीरस होंगे। हे राम ! यह जगत् मिथ्या है। जो पुरुष इस जगत् को सत् जानता है और कहता है कि हम मुक्त होंगे, वह ऐसा है, जैसे अन्धे कूप में जन्म का अन्धा गिरे और कहे कि अन्धकार में मैं सुखी हूँ। वह मूर्ख है; क्योंकि आत्मज्ञान बिना मुक्त नहीं होता।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पुनर्निर्वाणोपदेशो नाम शताधिकद्विषष्टितमसर्गः ॥ १६२ ॥

बशिष्ठजी बोले, हे राम ! अहंता आदि जो जगत् भासित होता है, वह मिथ्या भ्रम से उदय हुआ है। इसको त्यागकर अपने अनुभव-स्वरूप में स्थित होओ। इस मिथ्या जगत् में आस्था करना मूर्खता है। जो ज्ञानवान् है, उसको जगत् का अभाव है। अब ज्ञानी और अज्ञानी का लक्षण सुनो। हे राम ! जैसे किसी पुरुष को ताप बढ़ता है तो उसका हृदय जलता है और तृषा बहुत होती है, पर जिसका ताप नष्ट हो गया है, इसका हृदय शीतल होता है और जल की तृषा भी नहीं होती, वैसे ही जिस पुरुष को अज्ञानरूपी ताप चढ़ा हुआ है, उसका हृदय जलता है और भोगरूपी जल की तृष्णा बहुत होती है; पर जिसके हृदय का अज्ञानरूपी ताप मिट गया है, उसका हृदय शीतल होता है और भोग-रूपी जल की तृष्णा मिट जाती है। अब ताप निवृत्त करने का उपाय सुनो। शास्त्रों के अर्थवाद से तो बुद्धि में भ्रम हो जाता है। मैं तुमसे सुगम उपाय कहता हूँ। निरहंकार होना ही वह सुगम उपाय है। 'न मैं हूँ' और 'न यह जगत् है,' जब तुम ऐसा निश्चय कर लोगे, तब सब जगत् तुमको ब्रह्मस्वरूप देख पड़ेगा और किसी पदार्थ की कामना न रहेगी। जब सब पदार्थों को मिथ्या जानकर अपना भी अभाव