योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 1734 में से
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करोगे, तब प्रत्येक चैतन्य परमानन्दस्वरूप सबका अधिष्ठान शेष रहेगा। हे राम! यह अहंतारूपी यक्ष जो उठा है सो मिथ्या है। उसी मिथ्या यक्ष ने नाना प्रकार के जगत् की कल्पना की है। अहंकार मिथ्या है और जगत् भी मिथ्या है। जब तुम अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब जगत् का भ्रम मिट जावेगा। जैसे स्वप्न के जगत् में सुन्दर पदार्थ भासित होते हैं और मनुष्य उनकी इच्छा करता है, जब तक जागता नहीं तब तक जानता है कि ये पदार्थ कभी नष्ट न होंगे और कहता है कि अमुक रूप देखिये और अमुक भोजन कीजिये, पर जब जाग उठा तब जानता है कि यह सब मेरा संकल्प ही था, और फिर वे सुन्दर पदार्थ स्मरण होते हैं अथवा भासित होते हैं तो भी उनको मिथ्या जानता है। वैसे ही जब आत्मा के विषय में यह जागता है तब सब ब्रह्म ही भासित होता है।
हे राम! इस जगत् का बीज अहं है। जैसे दुःख का बीज पाप होता है, वैसे ही जगत् का बीज अहं है। इससे तुम निरहंकार पद में स्थित होओ। यह सब तुम्हारा ही स्वरूप है, पर भ्रम से जगत् भासित होता है। हे राम! जगत् का अत्यन्ताभाव है। जैसे रस्सी में सर्प का अत्यन्ताभाव है, परन्तु भ्रमदृष्टि से सर्प दीखता है और जब विचाररूपी दीपक से देखिये तो सर्प का अभाव हो जाता है; वैसे ही आत्मा में यह जगत् भ्रम से प्रतीत होता है। जब विचार करके जगत् का अभाव निश्चय करोगे, तब आत्मपद ज्यों का त्यों भासित होगा। जैसे जब वसन्त ऋतु आती है, तब सब फूल, फल और डालें देख पड़ती हैं और एक ही रस इतनी संज्ञाओं को धारण करता है वैसे ही तुम जब आत्मपद में स्थित होगे, तब तुमको सब आत्मरूप ही प्रतीत होगा और सब आत्मा ही भासित होगा। हे राम! आदि भी आत्मा ही है और अन्त में भी आत्मा ही होगा। पर मध्य में जो जगत् के पदार्थ दीखते हैं, उनकी ओर मत जाओ, जो इनको जाननेवाला है और जिससे सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं, उसमें स्थित होओ। ये सब मनुष्य मृग की तरह हैं। जैसे मरुस्थल में जल जानकर मृग उधर दौड़ते