भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 490

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४८६

है, वैसे ही जगतरूपी मरुस्थल की भूमिका शून्य है और तीनों लोक मृगतृष्णा के जल हैं। उनमें मनुष्यरूपी मृग दौड़ते हैं और दौड़ते-दौड़ते हार जाते हैं। कभी शान्ति नहीं पाते, क्योंकि जगत् के सब पदार्थ असत्य हैं। हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार सब मृगतृष्णा के जल हैं; इनको जो सत्य जानता है, वह मूर्ख है। यह जगत् गन्धर्वनगर की तरह मिथ्या है। तुम जागकर देखो, इसको सत्य जानकर क्यों तृष्णा करते हो ? इसको सत्य जानकर तृष्णा करना ही बन्धन है।

हे राम ! तुम आत्मा हो। इसकी इच्छा से बन्धन में क्यों पड़ते हो ? जैसे सिंह पिंजड़े में आकर दीन होता है, पर बल करके जब पिंजड़े को तोड़ डालता है, तब बड़े वन में जाकर निवास करता और निर्भय होता है, वैसे ही तुम भी वासनारूपी पिंजड़े को तोड़कर आत्म पद में स्थित होओ, जो सबका अधिष्ठान और सबसे उत्कृष्ट है। जब तुम उस पद को प्राप्त होगे, तब इस संसार की वासना नष्ट होकर आनन्द होगा और तुम निर्वाण पद को प्राप्त होकर शान्त होगे। परम उपशम ज्ञेय पद को पाओगे और द्वैतभाव मिटकर केवल परमार्थसत्ता भासित होगी—इसी का नाम निर्वाण है। जैसे कोई मार्ग चलकर तपता आवे तो वह शीतल स्थान में आकर शान्ति पाता है, वैसे ही ये चारों भूमिका शान्ति का स्थान हैं। निर्वाण, निरहंकारता, वासना का त्याग और परम उपशम ये चार भूमिका हैं। इनसे ज्ञेय में स्थित होओ। जब तुम भी इन भूमिकाओं में स्थित होगे, तब द्रष्टा, दर्शन और दृश्य की त्रिपुटी का अभाव हो जायगा और केवल द्रष्टा ही रहेगा। हे राम ! द्रष्टा भी उपदेश जनाने के निमित्त कहा है। जब दृश्य का अभाव हुआ, तब द्रष्टा किसका हो ? केवल अपने रूप में स्थित होओ, जो शुद्ध है। यह जगत् की सत्यता जन्मों को देनेवाली है। जो जगत् के पदार्थ सुखदायी लगते हैं, वे दुःख के देनेवाले हैं। इनको विष जानकर त्याग करो। जैसे आकाश में तरुवर दीखते हैं, वैसे ही यह जगत् न 'होने पर भी भासित होता है—आत्मा में दृश्य नहीं है। एक ही पदार्थ में दो दृष्टियाँ हैं। ज्ञानी उसको आत्मा और अज्ञानी जगत् जानते हैं।