भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 1734 में से

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<p align="center">❇ योगवाशिष्ठ ❇</p>

दो० सब भूतन की रात्रि में, सन्तन का दिन होय । जो लोकन दिन मानियाँ, सन्त रन्त रहे तहँ सोय ॥

ज्ञानी परमार्थतत्त्व में जागते हैं और संसार की ओर से सो रहे हैं और अज्ञानी परमार्थतत्त्व में सोये हुए हैं और संसार की ओर सावधान हैं ।

हे राम ! यह जगत् मन से उदय हुआ है । ज्ञानी का मन सत्यद् को प्राप्त हुआ है इससे उसे जगत् की भावना नहीं होती । जैसे बालक को संसार के पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी के निश्चय में जगत् कुछ वस्तु नहीं । हे राम ! जब ज्ञान उपजता है, तब जगत् कुछ भिन्न वस्तु नहीं प्रतीत होता । जैसे जल की बूँदें जल में डालिये तो भिन्न नहीं लगतीं, वैसे ही ज्ञानी को जगत् भिन्न नहीं दिखता । जैसे बीज में वृक्ष होता है, वैसे ही मन में जगत् स्थित होता है, और जैसे वृक्ष बीजरूप है, वैसे ही जगत् मनरूप है । जब जगत् नष्ट होगा, तब मन भी नष्ट हो जावेगा, और मन नष्ट होगा, तब दृश्य भी नष्ट होगा । एक का अभाव होने से दोनों का अभाव हो जाता है—मन नष्ट हो तो वासना भी नष्ट हो और वासना नष्ट हो तो मन भी नष्ट होता है । हे राम ! जगत् के भीतर-बाहर जो रमता है, वही मन है । इससे जब मन को स्थिर करके देखोगे, तब जगत् की सत्यता न प्रतीत होगी । अज्ञानी के हृदय में जगत् दृढ़ स्थित है, इससे वह दुःख पाता है, जैसे बालक को अपनी परछाहीं में भूत दिखता है, जिससे वह दुःख पाता है । जो निकट है, वह उसको नहीं भासित होता, इससे वह दुःख नहीं पाता । हे राम ! यह जगत् यदि सत्य होता तो ज्ञानवान् को भी प्रतीत होता । पर ज्ञानी को नहीं प्रतीत होता, इससे जगत् कुछ वस्तु नहीं है । जैसे एक ही स्थान में दो पुरुष बैठे हों और एक को निद्रा आवे तो उसको स्वप्न का जगत् देख पड़ता है और नाना प्रकार की चेष्टा होती है, पर दूसरा जो जागता है, उसको उसका जगत् नहीं देख पड़ता, वैसे ही जो पुरुष परमार्थसत्ता में जागा है, उसको जगत् शून्य दिखता है । हे राम ! यह जगत् मिथ्या है । उसकी तृष्णा तुम क्यों

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