योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
४८४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
वायु चलती है तब भी पवन है, क्योंकि उसको वायु का निश्चय है, वैसे ही जगत् का वही स्वरूप है—इससे चैतन्य है। ज्ञानवान् जानता है कि जगत् मेरा ही स्वरूप है। हे राम! यह आश्चर्य देखो कि जगत् कुछ दूसरी वस्तु नहीं, पर भ्रम के कारण भिन्न भासित होता है। जैसे कथा में कथा के पात्र विद्यमान लगते हैं और काम करते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी मनोपात्र जानो।
हे राम! जो विद्यमान है, वह अविद्यमान हो जाता है और जो अविद्यमान है वह विद्यमान हो जाता है। जैसे स्वप्न में जगत् अनुभव-स्वरूप है—भिन्न नहीं, वैसे ही जाग्रत् जगत् को विचार से देखोगे, तो ब्रह्मस्वरूप ही भासित होगा। जैसे जो पुरुष सोया होता है, स्वप्नजगत् उसी का रूप है, परन्तु जब तक निद्रादोष है, तब तक भिन्न भासित होता है, पर जब जागा, तब अपना ही रूप प्रतीत होता है, वैसे ही जब मनुष्य अपने स्वरूप में स्थित होकर देखता है, तब सब अपना रूप ही भासित होता है। हे राम! रूप, अवलोक और मनस्कार भी ब्रह्मस्वरूप है, पर आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं, वह तो निरंकार है, और मन के चिन्तन से रहित है। संकल्प से आप ही रूप, अवलोक और मनस्कार करके स्थित हुआ है, भिन्न नहीं है। सब वही है और शास्त्रकारों ने शिव, ब्रह्म, आत्मा शून्य आदि उसके नाम संकल्परूप में कहे हैं। आत्मा केवल चिन्मात्र है; वह वाणी का विषय नहीं। वह शान्तरूप-चैत्य अर्थात् दृश्य से रहित और सब शब्द-अर्थों का अधिष्ठान है, और जगत् उसका चमत्कार है। हे राम! आत्मा में एक या द्वैत की कल्पना कोई नहीं; क्योंकि वह आत्मत्वमात्र है और जगत् भी आत्मरूप है। जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं, वैसे आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। हे राम! यदि ऐसा भी किसी देश अथवा काल में हो कि सुवर्ण और भूषण में कुछ भेद हो अर्थात् सुवर्ण भिन्न हो और भूषण भिन्न हो, तथापि आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। आत्मा ही ऐसे प्रकाशमान है और अपने स्वभाव में स्थित है; दूसरी वस्तु कुछ नहीं है। जैसे मृत्तिका की सेना नाना प्रकार की संज्ञा धारण करती है, परन्तु
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मृतिका से भिन्न कुछ दूसरी वस्तु नहीं है; वैसे ही स्फुरण से नाना प्रकार की संज्ञाएँ देख पड़ती हैं, परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं—उसी का रूप है। हे राम! ये सब पदार्थ अनुभव से भासित होते हैं। पदार्थ की सत्ता अनुभव से भिन्न नहीं। जब तुम अनुभव में स्थित होकर देखोगे, तब अनुभवरूप अपना रूप ही देख पड़ेगा। अपना स्वभाव ज्ञानमात्र है। उसी के जानने का नाम ज्ञान है।
हे राम! ज्ञान के बिना जो तप, यज्ञ, दान आदिक क्रिया हैं, वे सब व्यर्थ हैं। सब क्रियाओं की सिद्धि ज्ञान से होती है। हे राम! जो कुछ क्रिया ज्ञान के निमित्त कीजिये, वही पुरुषप्रयत्न श्रेष्ठ है। इससे अन्यथा सब व्यर्थ है। धन के उपजाने और रखने में भी कष्ट है, परन्तु जो ज्ञान के साधन के लिए इसको राखिये और दीजिये तो यह अमृत हो जाता है। हे राम! यह जगत् भ्रममात्र है। जैसे मलिन नेत्रवाले को रूप उलटा दिखता है और स्वप्न की सृष्टि में अज्ञ तज्ञ भी भासित होते हैं, परन्तु असत्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् विद्यमान लगता है, पर अविद्यमान है। आत्मा ही सदा विद्यमान है। हे राम! विद्यमान देव विष्णु को त्यागकर जो और देव का पूजन करते हैं, उनकी पूजा सफल नहीं होती और विष्णु उन पर कुपित भी होते हैं। इसी तरह अनुभवरूप विद्यमान आत्मा को त्यागकर जो और की उपासना पूजन करते हैं, वे जन्ममरण के बन्धन से मुक्त नहीं होते—मूढ़ता में रहते हैं। आत्मदेव की पूजा सुनो। जो कुछ अनिच्छित आवे, वह उसको अर्पण कीजिये। इसके जाननेवाले में अहंप्रत्यय करना ही बड़ी पूजा है। हे राम! इस आत्मदेव से भिन्न जो सूर्य, चन्द्रमा आदिक की भेदपूजा है। वह तुच्छ है। जब तुम आत्मपूजा में स्थित होगे, तब और पूजा तुमको सूखे तृण की तरह तुच्छ प्रतीत होगी। दान भी आत्मदेव को ही करना है, सो बोध से करने योग्य है। वैराग्य, धैर्य और सन्तोष बोध का कारण है। यथा लाभ में सन्तुष्ट रहकर ब्रह्मविद्या का विचार करो और सन्तों का संग करो। इन साधनों से जब बोधरूपी सूर्य का उदय होगा, तब द्वैतरूपी अन्धकार का नष्ट हो
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जायगा और ज्ञानरूप ही भासित होगा। फिर जो ज्ञान उपजा है, वह भी शान्त हो जायगा; इससे उसी देव की पूजा करो, जिससे आत्म-पद को पाओ। आत्मदेव की पूजा के निमित्त फूल भी चाहिए, इसलिए आत्मविचार करके चित्त की वृत्ति अन्तर्मुख करो और यथालाम में संतुष्ट रहकर सन्तों की संगति करो, इन फूलों से आत्मा की पूजा करनी चाहिए। यह पूजा भी तब होती है, जब अन्तःकरण शुद्ध होता है। उससे ज्ञान उत्पन्न होता है। जब ज्ञान उपजता है, तब आत्मदेव का साक्षात्कार होता है। ज्ञान का लक्षण सुनो। गुरु और शास्त्र से जो वस्तु सुनी है, उसमें जब बुद्धि स्थित होती है और संसार की वासना क्षीण हो जाती है तब जीव ज्ञानी कहलाता है। जब इस ज्ञान की पूर्णता होती है, तब जगत् उसको ब्रह्मस्वरूप ही देख पड़ता है। तब उसको शस्त्र काट नहीं सकते और सिंह, सर्प, अग्नि और विष का भी भय नहीं होता।
हे राम ! यह सब विश्व आत्मरूप है। जैसी भावना कोई करता है, वैसा ही आगे देख पड़ता है। जब शास्त्र में शास्त्र के अर्थ की भावना होती है, तब वही भासित होते हैं। इसी प्रकार सर्प और अग्नि सब अपने-अपने अर्थाकार भासित होते हैं। जब सर्वत्र आत्म-भावना होती है, तब सर्वत्र आत्मा ही भासित होती है; क्योंकि दूसरी वस्तु कुछ बनी नहीं, तो दिखाई कैसे दे। जो पुरुष कृतकृत्य नहीं हुआ और अपने को कृतार्थ मानता है, पर दुःख की निवृत्ति का उपाय नहीं करता, उसे दुःख के आने से दुःख ही होगा, और दुःख उसको चला ले जावेगा। जब सुख आवेगा; तब सुख भी चला जावेगा। हे राम ! जो पुरुष सब में ब्रह्म कहता है, पर निश्चय से रहित है और शास्त्र भी बहुत देखता है, वह महामूर्ख है। जैसे जन्म का अन्धा सूर्य को नहीं जानता, वैसे ही वह आत्मअनुभव से रहित है। जब आत्मपद का साक्षात्कार होगा तब ऐसा आनन्द प्राप्त होगा, जिसके पाने से और पदार्थ नीरस लगें, ब्रह्मा से काष्ठपर्यन्त सब पदार्थ नीरस हो जायेंगे। इससे आत्मपरायण होकर सदा आत्मपद की भावना करो। हे
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हे राम ! जैसे शुद्धमणि के निकट जैसी वस्तु रखिये, वैसे ही प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही जीव जैसी भावना करता है, वैसा ही रूप भासित होता है। इससे जगत् को ब्रह्मस्वरूप जानो, और जो दूसरा भासित हो, उसे भ्रममात्र जानो। जैसे पत्थर की शिला पर पुतलियाँ लिखते हैं तो वे शिलारूप ही होती हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मस्वरूप है। जब तुमको आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब सब पदार्थ नीरस होंगे। हे राम ! यह जगत् मिथ्या है। जो पुरुष इस जगत् को सत् जानता है और कहता है कि हम मुक्त होंगे, वह ऐसा है, जैसे अन्धे कूप में जन्म का अन्धा गिरे और कहे कि अन्धकार में मैं सुखी हूँ। वह मूर्ख है; क्योंकि आत्मज्ञान बिना मुक्त नहीं होता।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पुनर्निर्वाणोपदेशो नाम शताधिकद्विषष्टितमसर्गः ॥ १६२ ॥
बशिष्ठजी बोले, हे राम ! अहंता आदि जो जगत् भासित होता है, वह मिथ्या भ्रम से उदय हुआ है। इसको त्यागकर अपने अनुभव-स्वरूप में स्थित होओ। इस मिथ्या जगत् में आस्था करना मूर्खता है। जो ज्ञानवान् है, उसको जगत् का अभाव है। अब ज्ञानी और अज्ञानी का लक्षण सुनो। हे राम ! जैसे किसी पुरुष को ताप बढ़ता है तो उसका हृदय जलता है और तृषा बहुत होती है, पर जिसका ताप नष्ट हो गया है, इसका हृदय शीतल होता है और जल की तृषा भी नहीं होती, वैसे ही जिस पुरुष को अज्ञानरूपी ताप चढ़ा हुआ है, उसका हृदय जलता है और भोगरूपी जल की तृष्णा बहुत होती है; पर जिसके हृदय का अज्ञानरूपी ताप मिट गया है, उसका हृदय शीतल होता है और भोग-रूपी जल की तृष्णा मिट जाती है। अब ताप निवृत्त करने का उपाय सुनो। शास्त्रों के अर्थवाद से तो बुद्धि में भ्रम हो जाता है। मैं तुमसे सुगम उपाय कहता हूँ। निरहंकार होना ही वह सुगम उपाय है। 'न मैं हूँ' और 'न यह जगत् है,' जब तुम ऐसा निश्चय कर लोगे, तब सब जगत् तुमको ब्रह्मस्वरूप देख पड़ेगा और किसी पदार्थ की कामना न रहेगी। जब सब पदार्थों को मिथ्या जानकर अपना भी अभाव
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करोगे, तब प्रत्येक चैतन्य परमानन्दस्वरूप सबका अधिष्ठान शेष रहेगा। हे राम! यह अहंतारूपी यक्ष जो उठा है सो मिथ्या है। उसी मिथ्या यक्ष ने नाना प्रकार के जगत् की कल्पना की है। अहंकार मिथ्या है और जगत् भी मिथ्या है। जब तुम अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब जगत् का भ्रम मिट जावेगा। जैसे स्वप्न के जगत् में सुन्दर पदार्थ भासित होते हैं और मनुष्य उनकी इच्छा करता है, जब तक जागता नहीं तब तक जानता है कि ये पदार्थ कभी नष्ट न होंगे और कहता है कि अमुक रूप देखिये और अमुक भोजन कीजिये, पर जब जाग उठा तब जानता है कि यह सब मेरा संकल्प ही था, और फिर वे सुन्दर पदार्थ स्मरण होते हैं अथवा भासित होते हैं तो भी उनको मिथ्या जानता है। वैसे ही जब आत्मा के विषय में यह जागता है तब सब ब्रह्म ही भासित होता है।
हे राम! इस जगत् का बीज अहं है। जैसे दुःख का बीज पाप होता है, वैसे ही जगत् का बीज अहं है। इससे तुम निरहंकार पद में स्थित होओ। यह सब तुम्हारा ही स्वरूप है, पर भ्रम से जगत् भासित होता है। हे राम! जगत् का अत्यन्ताभाव है। जैसे रस्सी में सर्प का अत्यन्ताभाव है, परन्तु भ्रमदृष्टि से सर्प दीखता है और जब विचाररूपी दीपक से देखिये तो सर्प का अभाव हो जाता है; वैसे ही आत्मा में यह जगत् भ्रम से प्रतीत होता है। जब विचार करके जगत् का अभाव निश्चय करोगे, तब आत्मपद ज्यों का त्यों भासित होगा। जैसे जब वसन्त ऋतु आती है, तब सब फूल, फल और डालें देख पड़ती हैं और एक ही रस इतनी संज्ञाओं को धारण करता है वैसे ही तुम जब आत्मपद में स्थित होगे, तब तुमको सब आत्मरूप ही प्रतीत होगा और सब आत्मा ही भासित होगा। हे राम! आदि भी आत्मा ही है और अन्त में भी आत्मा ही होगा। पर मध्य में जो जगत् के पदार्थ दीखते हैं, उनकी ओर मत जाओ, जो इनको जाननेवाला है और जिससे सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं, उसमें स्थित होओ। ये सब मनुष्य मृग की तरह हैं। जैसे मरुस्थल में जल जानकर मृग उधर दौड़ते
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है, वैसे ही जगतरूपी मरुस्थल की भूमिका शून्य है और तीनों लोक मृगतृष्णा के जल हैं। उनमें मनुष्यरूपी मृग दौड़ते हैं और दौड़ते-दौड़ते हार जाते हैं। कभी शान्ति नहीं पाते, क्योंकि जगत् के सब पदार्थ असत्य हैं। हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार सब मृगतृष्णा के जल हैं; इनको जो सत्य जानता है, वह मूर्ख है। यह जगत् गन्धर्वनगर की तरह मिथ्या है। तुम जागकर देखो, इसको सत्य जानकर क्यों तृष्णा करते हो ? इसको सत्य जानकर तृष्णा करना ही बन्धन है।
हे राम ! तुम आत्मा हो। इसकी इच्छा से बन्धन में क्यों पड़ते हो ? जैसे सिंह पिंजड़े में आकर दीन होता है, पर बल करके जब पिंजड़े को तोड़ डालता है, तब बड़े वन में जाकर निवास करता और निर्भय होता है, वैसे ही तुम भी वासनारूपी पिंजड़े को तोड़कर आत्म पद में स्थित होओ, जो सबका अधिष्ठान और सबसे उत्कृष्ट है। जब तुम उस पद को प्राप्त होगे, तब इस संसार की वासना नष्ट होकर आनन्द होगा और तुम निर्वाण पद को प्राप्त होकर शान्त होगे। परम उपशम ज्ञेय पद को पाओगे और द्वैतभाव मिटकर केवल परमार्थसत्ता भासित होगी—इसी का नाम निर्वाण है। जैसे कोई मार्ग चलकर तपता आवे तो वह शीतल स्थान में आकर शान्ति पाता है, वैसे ही ये चारों भूमिका शान्ति का स्थान हैं। निर्वाण, निरहंकारता, वासना का त्याग और परम उपशम ये चार भूमिका हैं। इनसे ज्ञेय में स्थित होओ। जब तुम भी इन भूमिकाओं में स्थित होगे, तब द्रष्टा, दर्शन और दृश्य की त्रिपुटी का अभाव हो जायगा और केवल द्रष्टा ही रहेगा। हे राम ! द्रष्टा भी उपदेश जनाने के निमित्त कहा है। जब दृश्य का अभाव हुआ, तब द्रष्टा किसका हो ? केवल अपने रूप में स्थित होओ, जो शुद्ध है। यह जगत् की सत्यता जन्मों को देनेवाली है। जो जगत् के पदार्थ सुखदायी लगते हैं, वे दुःख के देनेवाले हैं। इनको विष जानकर त्याग करो। जैसे आकाश में तरुवर दीखते हैं, वैसे ही यह जगत् न 'होने पर भी भासित होता है—आत्मा में दृश्य नहीं है। एक ही पदार्थ में दो दृष्टियाँ हैं। ज्ञानी उसको आत्मा और अज्ञानी जगत् जानते हैं।
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<p align="center">❇ योगवाशिष्ठ ❇</p>दो० सब भूतन की रात्रि में, सन्तन का दिन होय । जो लोकन दिन मानियाँ, सन्त रन्त रहे तहँ सोय ॥
ज्ञानी परमार्थतत्त्व में जागते हैं और संसार की ओर से सो रहे हैं और अज्ञानी परमार्थतत्त्व में सोये हुए हैं और संसार की ओर सावधान हैं ।
हे राम ! यह जगत् मन से उदय हुआ है । ज्ञानी का मन सत्यद् को प्राप्त हुआ है इससे उसे जगत् की भावना नहीं होती । जैसे बालक को संसार के पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी के निश्चय में जगत् कुछ वस्तु नहीं । हे राम ! जब ज्ञान उपजता है, तब जगत् कुछ भिन्न वस्तु नहीं प्रतीत होता । जैसे जल की बूँदें जल में डालिये तो भिन्न नहीं लगतीं, वैसे ही ज्ञानी को जगत् भिन्न नहीं दिखता । जैसे बीज में वृक्ष होता है, वैसे ही मन में जगत् स्थित होता है, और जैसे वृक्ष बीजरूप है, वैसे ही जगत् मनरूप है । जब जगत् नष्ट होगा, तब मन भी नष्ट हो जावेगा, और मन नष्ट होगा, तब दृश्य भी नष्ट होगा । एक का अभाव होने से दोनों का अभाव हो जाता है—मन नष्ट हो तो वासना भी नष्ट हो और वासना नष्ट हो तो मन भी नष्ट होता है । हे राम ! जगत् के भीतर-बाहर जो रमता है, वही मन है । इससे जब मन को स्थिर करके देखोगे, तब जगत् की सत्यता न प्रतीत होगी । अज्ञानी के हृदय में जगत् दृढ़ स्थित है, इससे वह दुःख पाता है, जैसे बालक को अपनी परछाहीं में भूत दिखता है, जिससे वह दुःख पाता है । जो निकट है, वह उसको नहीं भासित होता, इससे वह दुःख नहीं पाता । हे राम ! यह जगत् यदि सत्य होता तो ज्ञानवान् को भी प्रतीत होता । पर ज्ञानी को नहीं प्रतीत होता, इससे जगत् कुछ वस्तु नहीं है । जैसे एक ही स्थान में दो पुरुष बैठे हों और एक को निद्रा आवे तो उसको स्वप्न का जगत् देख पड़ता है और नाना प्रकार की चेष्टा होती है, पर दूसरा जो जागता है, उसको उसका जगत् नहीं देख पड़ता, वैसे ही जो पुरुष परमार्थसत्ता में जागा है, उसको जगत् शून्य दिखता है । हे राम ! यह जगत् मिथ्या है । उसकी तृष्णा तुम क्यों
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४६१
करते हो ? अपने स्वभाव में स्थित होओ । यह जगत् परस्वभाव है, यह जानकर चाहे जैसी चेष्टा करो, तुमको बन्धन न होगा और पूर्वपद की प्राप्ति होगी । जैसे अग्नि से जले सूखे तृण को पवन उड़ा ले जाता है और नहीं जाना जाता कि कहाँ गया, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि से जलाया और निरहंकारतारूप पवन से उड़ाया हुआ संसाररूपी तृण न जाना जायगा कि कहाँ गया। जैसा चाहे लाख योजन तक चला जाय तो भी यही देख पड़ता है कि आकाश ही सर्व सृष्टि को धारण किये है, वैसे ही सब दृश्य जगत् को आत्मा धारण करता है। संसार का शब्द-अर्थ आत्मा में नहीं । इसको छोड़कर देखो कि सब शब्द-अर्थ का अधिष्ठान आत्मा ही है ।
हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार मिथ्या उदय हुए हैं । इनका त्याग करो। जैसे मरुस्थल में जलाभास मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या भ्रममात्र है । इसके सम्बन्ध से जीव दुखी होता है । जैसे रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् है । तुम आत्मब्रह्म हो, दुःख से रहित अपने स्वभाव में स्थित हो और आत्मदृष्टि से देखो कि सब आत्मा है; अथवा जगत् को मिथ्या जानो तो भी शेष आत्मपद ही रहेगा । जैसे जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति का अभाव होने पर शान्तपद शेष रहता है, वैसे ही जगत् का अभाव निश्चित होने पर आत्मपद शेष प्रतीत होगा। इस जगत् का अत्यन्ताभाव है, और जो दीखता है, वह भ्रममात्र है । जो एक काल में होता है, वह दूसरे काल में नष्ट हो जाता है । स्वप्न में जाग्रत् का अभाव हो जाता है और जाग्रत् में स्वप्न का अभाव हो जाता है। पर सुषुप्ति में दोनों का अभाव हो जाता है । इससे वे भ्रममात्र हैं । विश्व आत्मा का चमत्कार है । जैसे समुद्र में तरङ्ग होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् है । अहंता से यह उदय होता है और अहं का अभाव होने पर इसका भी अभाव हो जाता है । जिनको अहंता के अभाव का निश्चय हुआ है, वे ही सन्त और उत्तम पुरुष हैं । उन महानुभाव पुरुषों का अभिमान और भोगों की आशा नष्ट
४४२ ❀ योगवासिष्ठ ❀
हो जाती है। वे भ्रान्ति रहित और नित्य ही समाधिस्थ होते हैं। इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकताप्रतिपादननाम शताधिकत्रिषष्टितमसर्गः ॥ १६३ ॥
राम बोले, हे भगवन् ! यह मनरूपी मृग संसाररूपी बन में भटकत है । वह समाधानरूप कौन वृक्ष है, जिसके नीचे आकर शान्त हो उसके फूल, फल और लता कैसे हैं और वह वृक्ष कहाँ होता है । यह कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार समाधानरूप वृक्ष उत्पन्न होता है, सो सुनो । सब साधन इसके पत्ते, पुष्प और लता आदि हैं । हे राम ! यह वृक्ष सब जीवों को कल्याण के निमित्त साधन चाहिये । अब तुम इसका क्रम सुनो । आत्मिक बल से तो यह उगता है और सन्तजनों के हृदय में यह उपजता है । चित्तरूपी पृथ्वी में लगता है और वैराग्य इसका बीज है वैराग्य दो प्रकार से प्राप्त होता है—एक तो दुःख और कष्ट प्राप्त होने से वैराग्य उपज आता है । दूसरा शुद्ध निष्काम हृदय होने पर भी वैराग्य उपजता है । उस वैराग्यरूपी बीज को जब चित्तरूपी भूमि में डालते हैं और निर्वासनारूपी हल फेरते हैं । निर्मल, शीतल और हृदयगम्य सन्तों की संगति और सत् शास्त्ररूपी जल जब मनरूपी क्यारी में पड़ता है, तब उस वृक्ष के बढ़ने की आशा होती है । बहुत जल से भी उसकी रक्षा करते हैं । आत्म विचाररूपी सूर्य की किरणों से पुष्ट करते हैं और उसके चहुँफेर धैर्यरूप बाड़ी करते हैं । तप, दान, तीर्थ, स्नानरूपी चौतरे पर उस बीज को रखकर रखवाली करते हैं कि सूख या जल न जाय । आशारूपी पक्षी से रक्षा करते हैं कि वैराग्यरूपी बीज को वह निकाल न ले जावे अभिलाषारूपी बूढ़े बैल से रक्षा करते हैं कि खेत में प्रवेश करके वह उसको रौंद न डाले । उसके निमित्त सन्तोष और सन्तोष की स्त्री मुदिता दोनों को पहरे पर बिठा रखते हैं । इस बीज का नाशक कुहिरा, जो मेघ से उपजता है, उससे भी इसकी रक्षा करते हैं, संपदा, धन और सुन्दर स्त्रियों का प्राप्त होना ही वैराग्यरूपी बीज का नाशक ओला है ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४६३
इसकी रक्षा का एक सामान्य और एक विशेष उपाय है। तप से इन्द्रियों को वश करना, दुखी पर दया करना और शास्त्र का पाठ और जप करना इत्यादिक शुभ क्रियारूपी यन्त्र की पुतली इसके पास विद्यमान रखिये तो सब विघ्न दूर हो जाते हैं। दूसरा श्रेष्ठ उपाय यह है कि सन्तों की संगति करके सत्-शास्त्रों को सुने। प्रणव जो ॐकार है उसका ध्यान और जप करे और उसका अर्थ विचारे। यही त्रिशूल-रूप ओलों के नाश का परम उपाय है। जब इतने शत्रुओं से रक्षा करे, तब उस बीज की रक्षा हो। सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के विचाररूपी वर्षाकाल के जल से सींचिये, तब अंकुर निकलता है और वह खूब लहलहाता है। जैसे द्वितीया के चन्द्रमा को सब कोई प्रणाम करता है, वैसे ही सन्तोष, दया और यशरूपी अंकुर निकलता है। उसके दो पत्ते निकलते हैं—एक वैराग्य, दूसरा विचार और वे दिन प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं। शास्त्रों से जो सुना है कि आत्मा सत्य है और जगत् मिथ्या है, उसका बारम्बार अभ्यास करना चाहिए। इस जल के सींचने से वे अंकुर दिन प्रतिदिन बढ़ते जावेंगे और उनके तने बड़े होंगे। हे राम ! जब डालें बड़ी होती हैं, तब रागद्वेषरूपी वानर उन पर चढ़कर उन्हें तोड़ डालते हैं, इससे इस वृक्ष को दृढ़ वैराग्य, सन्तोष और अभ्यासरूपी रस से पुष्ट करना उचित है। जैसे सुमेरु पर्वत है, वैसे ही सन्तोष से उसे पुष्ट करना चाहिए। जब यह होगा, तब उसमें सुन्दर पत्ते, डालें, फल और मञ्जरी लगेंगी; मार्ग में बहुत दूर तक इसकी छाया होगी और शान्ति, शीतलता, शुद्धता, कोमलता, दया, यश और कीर्ति इत्यादिक गुण प्रकट होंगे। उसके नीचे मनरूपी मृग विश्राम पाकर शीतल होता है, आध्यात्मिक आधिभौतिक और आधिदैविक ताप मिट जाते हैं और मन परम शान्ति पाता है। हे राम ! यह मैंने तुमसे समाधानरूपी वृक्ष कहा है। जहाँ यह वृक्ष उत्पन्न होता है, उस स्थान की शोभा कहीं नहीं जा सकती। जो इस वृक्ष की शरण जाता है, उसके ताप मिट जाते हैं और वह शान्ति पाता है। यह वृक्ष ब्रह्मरूपी
विचार एवंम् सर्वम् ।
४६४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
आकाश के आश्रय से बढ़ता है और वैराग्यरूपी रस और सन्तोषरूपी फल से पुष्ट होता है। जो पुरुष इसका आश्रय लेगा, वह शान्ति पावेगा।
हे राम ! जबतक मनरूपी मृग इस समाधानरूपी वृक्ष का आश्रय नहीं लेता, तब तक भटकता फिरता है, शान्ति नहीं पाता। जैसे मृग वन में भटकता है, वैसे ही मनमृग भटकता है। द्वैत, अज्ञान और प्रमादरूपी वधिक उसे मारने लगते हैं, इससे दुःख पाता है। जब भय से इन्द्रियरूपी गाँववासियों के निकट जाता है, तब वे आप ही इसको देखकर पकड़ लेते हैं अर्थात् विषयों की ओर खींचते हैं और उससे यह बड़ा कष्ट पाता है। इनके भय से जब फिर वन में जाता है तो वहाँ विषयों के न मिलने की तपन से दुःखी होता है। जब उसको भी त्यागकर रसरूपी स्थानों को शान्ति के निमित्त दौड़ता है, तब काम-रूपी कुत्ता काटने को दौड़ता है और उसके भय से जब फिर वैराग्य-रूपी वन की ओर दौड़ता है तब क्रोधरूपी अग्नि जलाती है; वासना-रूपी मच्छर दुःख देते हैं। लोभ और मोहरूपी अँधेरी इसे अन्धा बना देती है। निदान पुत्र और धनरूपी हरे-हरे तृणों को देखकर यह उनको ग्रहण करता है, तब गढ़े में गिर पड़ता है। वह गढ़ा तृण से ढका हुआ है। वह तृण पुत्र और धन है। उनको सुन्दर देख यह ममतारूपी गढ़े में गिर पड़ता है। इस प्रकार दुःख पाता है। हे राम ! जब यह मनुष्य झूठ बोलता है, तब मृत्तिका में लौटने की सी चेष्टा करता है और जब मनरूपी भेड़िया आता है, तब वह उसको भक्षण कर जाता है। जब समाधानरूपी वृक्ष से जीव विमुख होता है, तब इतने कष्ट पाता है। और जब मनरूपी भेडिये से छूटता है, तब आशा रूपी जञ्जीर में बँध जाता है। निदान जब तक इस वृक्ष के निकट नहीं आता है; तब-तक बड़े कष्टदायक स्थानों को जाता है। तमाल वृक्षादिक के तले भी जाता है और कण्टक के वृक्षों के तले भी जाता है, परन्तु शान्ति किसी स्थान में नहीं पाता—बड़े-बड़े कष्टों को ही पाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हरिणोपाख्याने वृत्तान्तयोगोपदेशो नाम शताधिकचतुःषष्टितमसर्गः ॥ १६४ ॥
✹ निर्वाण प्रकरण ✹
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वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार मूढ़ मनरूपी हरिण भटकता है। इसमें मेरा यही आशीर्वाद है कि तुमको उस वृक्ष का संग हो। जब उस वृक्ष के निकट जीव जाता है, तब शान्ति होती है। जब उसके नीचे आ बैठता है, तब तीनों ताप अन्तःकरण से मिट जाते हैं। जितने विषयरूपी वृक्ष हैं, उनके निकट गया हुआ मनरूपी मृग शान्ति नहीं पाता। पर जब समाधान रूपी वृक्ष के निकट आता है, तब शान्ति पाता है और बुद्धि खिल उठती है—जैसे सूर्यमुखी कमल सूर्य को देखकर खिल उठता है। उस वृक्ष के अनुभव रूपी फल और शास्त्र-विचाररूपी पत्तों और फूलों को देखकर वह बड़ा आनन्द पाता है, फिर उस वृक्ष के ऊपर चढ़ जाता है और पृथ्वी का त्याग करता है, जैसे सर्प अपनी पुरानी केचुल को छोड़ देता है और नूतन सुन्दर शरीर में शोभित होता है। जब उस वृक्ष पर चढ़ता है, तब गिरता नहीं; क्योंकि उसके पत्ते बहुत मजबूत हैं, उनके आश्रय से ठहरता है समाधानरूपी वृक्ष के पत्ते सत्शास्त्र हैं। जब समाधानरूपी वृक्ष से जीव उतरता है, तब शास्त्र के अर्थ में ठहरता है और जितने पदार्थ देखता है, वे उसे मिट्टी धूल से जान पड़ते हैं। तब वह अपनी पिछली चेष्टा को स्मरण करके पछताता है। जैसे कोई मद्यपान करके नीच चेष्टा करे तो जब मद उतरता है तब पछताता है, वैसे ही मनरूपी मृग अपनी पिछली चेष्टा को धिक्कारता है और कहता है कि बड़ा आश्चर्य है, जो मैं इतने काल तक इस वृक्ष से विमुख हुआ भटकता रहा—अब मुझको शान्ति हुई है। जैसे दिन की तपन न रहने पर चन्द्रमुखी कमलिनी को शान्ति होती है, वैसे ही मनरूपी मृग को शान्ति होती है ?
हे राम ! पुत्र, धन, स्त्री आदि जो दीखते हैं, उनको वह संकल्पपुर और स्वप्न सदृश देखता है। जैसे स्वप्न से जागकर कोई स्वप्नपुर को स्मरण करता है, परन्तु उसमें अभिमान नहीं होता, वैसे ही उसमें भी अभिमान नहीं होता। जब जीव अनुभवरूपी फल को खाता, तब बड़ा आनन्द पाता है, जिसको वाणी नहीं कह सकती। वह शान्त निर्मल और निरतिशयपद को प्राप्त होता है। जो मन का विषय हो, वह
४६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
सातिशयपद है और जो मन का विषय नहीं है वह निरतिशयपद है। जो इन्द्रियों का विषय है, उसका नाश भी होता है और जो इन्द्रियों और मन का विषय नहीं, उसका नाश नहीं होता। वह मनुष्य उसी अविनाशी पद को पाता है। जैसे किसी को बाण लगता है और उसकी विरोधी बूटी उसके सामने रखिये तो निकल आता है, वैसे ही अनुभवरूपी बूटी को सामने रखने पर मोह बन्धनरूपी शर खुल पड़ते हैं और वह परमपद पाता है। हे राम! ज्ञानवान् जगत् से मृतक हो जाता है। वह संसार से निर्लिप्त रहता है। जैसे लकड़ी अग्नि के बिना शान्त हो जाती है, वैसे ही वासना से रहित ज्ञानवान् की चेष्टा शान्त हो जाती है, अर्थात् संसार की सत्यता से रहित चेष्टा होती है और फिर संसाररूपी अग्नि नहीं प्रज्वलित होती। तब द्वैत और अद्वैत की कल्पना भी मिट जाती है। यह उन्मत्त की तरह अपने स्वरूप में मग्न रहता है। जैसे मरुस्थल के मार्ग में चलनेवाला पथिक धूप की इच्छा नहीं करता, वैसे ही ज्ञानी विषयों की तृष्णा नहीं करता। जिसने आत्म अनुभव-रूपी अमृत पान किया है, उसको विषयरूपी काँजी की इच्छा नहीं रहती—वह पुरुष सदा निर्वासनिक है। जब जीव निर्वासनिक होता है, तब चञ्चल मन की वृत्ति सब लीन हो जाती और केवल आत्मत्व-मात्र शेष रहता है। 'मैं' 'मेरा' इत्यादि भावना नष्ट हो जाती है। जब तक चित्त का सम्बन्ध होता है, तब तक 'मैं' और 'मेरा' प्रतीत होता है और जब चित्त का सम्बन्ध मिट जाता है, तब एक हो जाता है। जैसे एक सूखा और एक गीला काष्ठ होता है। सूखा शुद्ध और गीला उपाधिक कहलाता है। और जब जल सूख जाता है, तब वह भी शुद्ध हो जाता है। वैसे ही जब मन की उपाधि नष्ट हो जाती है, तब शुद्ध आत्मा ही रहता है और एकरस भासित होता है।
हे राम! संसार भ्रम से द्वितीय भासित होता है। जैसे पत्थर की शिला में पुतली अनउपजी ही भासित होती है, जो न सत् है और न असत्। यदि उन्हें पत्थर से भिन्न करके देखिये तो सत् नहीं और जो शिला में देखिये तो वही है। वैसे ही जगत् आत्मा से भिन्न होकर
४६८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
हे राम ! वाञ्छित देश को पथिक तब पहुँचता है, जब एक देश का त्याग करता है। वैसे ही शुद्धस्वरूप परमानन्द अपना रूप आत्मा तब प्राप्त होता है, जब धन, लोक, पुत्र, एषणा आदि का त्याग करे। जब आत्मा की प्राप्ति होती है, तब निर्विकल्प समाधि से शुद्ध चैतन्य का साक्षात्कार होता है, और जब समाधि से उसका साक्षात्कार होता है, तब चेष्टा होने पर भी उसी में स्थित रहता है; परम निर्वाणपद को प्राप्त होता है। चित्तरूपी वेल दूर हो जाती है। जैसे रस्सी में जो बल होता है, उसको खींचकर फिर छोड़ते हैं, तब वह सीधी हो जाती है, वैसे ही जिसको समाधि में चैतन्य का साक्षात्कार होता है, उसको उत्थानकाल में भी वही भासित होता है। पर जिसको उसका प्रमाद है, उसको जगत् भासित होता है। हे राम ! वस्तु एक है, परन्तु उसमें दो दृष्टियाँ हैं। जैसे रस्सी एक है, पर सम्यक्दर्शी को रस्सी दिखती है और असम्यक्दर्शी को सर्प, वैसे ही ज्ञानवान् को आत्मा प्रतीत होता है और अज्ञानी को जगत् दीखता है। जिस पुरुष ने ज्ञान से जगत् को असत्य नहीं जाना, वह मानो चित्र की अग्नि है। उससे कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। और जिसको स्वरूप की इच्छा है, जो तृष्णा के नाश का प्रयत्न करता है, जगत् को मिथ्या विचारता है, वह आत्मपद को प्राप्त होगा। उसकी तृष्णा भी निवृत्त हो जायगी। हे राम ! ज्ञानवान् की तृष्णा स्वाभाविक मिट जाती है। जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार मिट जाता है, वैसे ही वस्तु की सत्ता पाकर उसकी तृष्णा नष्ट हो जाती है। वह परमपद में स्थित होता है। हे राम ! जिसको दृश्य में नीरसता है, वह उत्तम पुरुष है। वह मनुष्यशरीर में ही ब्रह्म हो जाता है। उसको मेरा नमस्कार है। वह मेरा गुरु है। हे राम ! जब जीव की बुद्धि विषय से विरक्त होती है, तब कल्याण होता है। वैराग्य से बोध होता है और बोध से वैराग्य होता है, क्योंकि दोनों सम्बन्धित परस्पर सापेक्ष हैं। जब एक आता है, तब दूसरा भी आता है। जब ये आते हैं, तब तीनों एषणाएँ निवृत्त हो जाती हैं। जब तीनों एषणाएँ नष्ट होती हैं, तब अमृत की प्राप्ति होती है।
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४४६
हे राम ! सन्तों का संग और सत्शास्त्रों का श्रवण करके स्वरूप का अभ्यास करो—इससे आत्मपद की प्राप्ति होती है। ये तीनों परस्पर सहकारी हैं। जैसे आठ पाँववाला कीट प्रथम चरण को रखकर और चरणों को रखता है, तब सुख से चला जाता है, वैसे ही सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के सुनने से जो आत्मपद का अभ्यास करता है, वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होता है। उसे जगत् का अभाव हो जाता है। हे राम ! जगत् के भाव और अभाव को ज्ञानी जानता है। जैसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को तुरीयावस्थावाला जानता है, वैसे ही जगत् के भाव-अभाव को ज्ञानी जानता है। जैसे अग्नि में सूखा तृण डालो तो देख नहीं पड़ता, वैसे ही ज्ञानवान् को जगत् नहीं दीखता। हे राम ! ज्ञानवान् को सर्वदा समाधि है, कभी अहं का उत्थान नहीं होता। जब तक उस पद को प्राप्त न हो, तब तक साधना में लगा रहे और जब उस पद को प्राप्त हो, तब फिर कोई यत्न करना बाक़ी नहीं रहता। हे राम ! इस चित्त के दो प्रवाह हैं—एक तो जगत् की ओर जाता है और दूसरा स्वरूप की ओर। जो जगत् की ओर जाता है, वह औपाधिक है, और जो स्वरूप की ओर जाता है, वह उपाधि को दूर करनेवाला है। जैसे एक लकड़ी गीली और एक सूखी होती है। जो गीली है उसमें उपाधि जल है, वह फैल जाता है। और जब जल नष्ट हो जाता है, तब वह शुद्ध होती है, फिर प्रफुल्लित नहीं होती। वैसे ही संसार की सत्यता से चित्त बढ़ता है, और जब संसार की वासना नष्ट होती है तब शुद्धपद पाता है। हे राम ! वाद भी दो प्रकार के हैं। जो वाद किसी को दुःख दे, उसे मूर्ख कहते हैं। और जो परस्पर मित्रभाव से तत्त्व का निरूपण करे, वह वाद ज्ञानवान् करते हैं। जो जैसा वाद करते हैं, उन्हें उसका दृढ़ अभ्यास होता है और वैसा ही रूप उनका हो जाता है। जो झगड़ा करते हैं उनका वही रूप हो जाता है और जो मित्रता से स्वरूप का वाद करते हैं, उनका वही रूप होता है—उस पद को पाकर परम शान्ति होती है।
इति० नि० मनमृगोपाख्यानंयोगोनामशताधिकपञ्चषष्टितमसर्गः ॥१६५॥
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पूर्वार्द्ध समाप्तम्।
श्रीगणेशाय नमः ।
श्रीयोगवाशिष्ठ
निर्वाण प्रकरण उत्तरार्द्ध
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष ने समाधानरूपी वृक्ष के फल को जानकर खा लिया और उसको पचाया है, उसे परम स्थिति प्राप्त होती है। जैसे पंख टूटने से पर्वत यथास्थान स्थित है, वैसे ही तृष्णारूपी पंख टूटने से जीव स्थिर होता है। हे राम ! जब उसको फल प्राप्त होता है, तब उसका चित्त भी आत्मरूप हो जाता है। जैसे दीपक का निर्वाण होता है, तब जाना नहीं जाता कि वह कहाँ गया, वैसे ही आत्मपद के प्राप्त होने पर चित्त भिन्न होकर दिखाई नहीं देता। हे राम ! जब तक वह अकृत्रिम आनन्द नहीं प्राप्त हुआ और उस पद में विश्राम नहीं पाया, तब तक शान्ति नहीं प्राप्त होती। वह पद निर्गुण, शुद्ध, स्वच्छ और परम शान्त है। जब उस पद में स्थिति होती है, तब परम समाधि हो जाती है। ऐसा त्रिलोकी में कोई नहीं, जो उसको समाधि से उतारे। जैसे चित्त की मूर्ति होती है, वैसे ही उसकी अवस्था होती है। उसकी सब चेष्टा इच्छा से रहित होती है। जैसे पंख से रहित पर्वत स्थिर होता है, वैसे ही मन संकल्प विकल्प से रहित हो जाता है और शान्तिपद को प्राप्त होता है। हे राम ! जिसके मन में संसार का अभाव हुआ है, वह शान्तिपद को प्राप्त होता है। जब तक वासना से युक्त है, तब तक मन है। जिस क्रम और युक्ति से वासना का क्षय हो वही कर्तव्य है। हे राम ! जब वासना का क्षय होता है, तब बोधरूप शेष रहता है, इसलिए जिस क्रम से वह प्राप्त हो, वही करना चाहिए, क्योंकि उस पद के प्राप्त हुए बिना शान्ति कभी न होगी। जब चित्त उस पद की ओर आवे, तब शान्त होकर दुःख से रहित और अविनाश
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५०१
हो; क्योंकि सबका आत्मा निर्विभाग, अनन्त, परम शान्तिरूप और सबको कर्म के फल का देनेवाला है ।
हे राम ! जब ऐसे पद को जीव प्राप्त होता है, तब उसको वासना के उत्थानकाल में भी आत्मा ही भासित होता है, द्वैत नहीं दिखता । तब समाधि से उत्थान कैसे हो ? ऐसा कोई समर्थ नहीं कि उसको समाधि से उतारे । जब ऐसा पद प्राप्त होता है, तब संसार नीरस लगता है । हे राम ! जबतक मनुष्य मूर्तिवत् नहीं होता; तबतक विषय का त्याग करे, और जब ऐसी दशा हो, तब कुछ कर्तव्य नहीं रहता, त्याग करे अथवा न करे । यह मुझे निश्चय है कि जब ज्ञान उपजेगा, तब मनुष्य विषयों से विरक्त हो जावेगा । ब्रह्म से काष्ठपर्यन्त जितने पदार्थ हैं वे सब उसको नीरस हो जाते हैं । ऐसा जो पुरुष है, उसको सदा समाधि है । हे राम ! जिसको समाधि का सुख मिल जाता है, वह स्वाभाविक समाधि की ओर आता है । जैसे वर्षाकाल की नदी स्वाभाविक समुद्र को जाती है, वैसे ही वह पुरुष समाधि की ओर लगा रहता है । जो पुरुष विषयों से विरक्त और आत्माराम होता है, उसकी वज्रसार की सी दृढ़ स्थित होती है । जैसे पंख से रहित पर्वत स्थिर होते हैं वैसे ही जिस पुरुष ने संसार को नीरस जानकर त्याग दिया है और आत्मा में क्रीड़ा करके तृप्त हुआ है, उसकी मति चलायमान नहीं होती । हे राम ! जिस पुरुष की चेष्टा भी होती है, पर जो संकल्प-विकल्प से रहित है, वह सदा मुक्तरूप है । उसको कोई कर्म बन्धन नहीं करता; क्योंकि कर्म और साधन का अभाव हो जाता है । जिस पुरुष को जगत् नीरस हो गया है, उसको विषयों की तृष्णा कैसे हो ? और जब तृष्णा न रही, तब दुःख कैसे हो ? दुःख तब तक होता है, जबतक विषयों की तृष्णा होती है, और विषयों की तृष्णा तब होती है, जब अपने स्वभाव को मनुष्य छोड़ देता है । हे राम ! जब अपने स्वभाव में स्थित हो, तब परस्वभाव जो इन्द्रियों के विषय हैं, वे रससंयुक्त कैसे लगें और दुःख और तृष्णा कैसे हो ?
हे राम ! जब मनुष्य अपने स्वभाव को जानता है, तब निर्वाणपद
५०२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
को प्राप्त होता है, जो आदि और अन्त से रहित है। उसकी प्राप्ति का उपाय यह है कि वेदान्त का अध्ययन करे और प्रणव का जप करे। जब इनसे थके, तब समाधिस्थ हो और जब फिर थके, तब वहीं पूर्व-स्थित में आकर मनन करे। जब ऐसा दृढ़ अभ्यास हो तब उस पद को प्राप्त होगा, जो संसार का पार है। जब उस पद को पाया, तब परम-शान्ति को प्राप्त होगा और स्वच्छ निर्मल अपने स्वभाव में स्थित होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्वभावसत्तायोगोपदेशो नाम शताधिकषट्षष्टितमसर्गः ॥ १६६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह संसार बड़ा गम्भीर है। इसका तरना कठिन है। जिसको इसमें तरने की इच्छा हो, उसका यह कर्तव्य है कि वेदान्त का अध्ययन, प्रणव का जप और चित्त को स्थिर करे। जब ऐसा उपाय करे, तब ईश्वर उस पर प्रसन्न होंगे और उसके हृदय में विवेक उत्पन्न होगा; जिससे संसार असत्य प्रतीत होगा और सन्त जनों का संग प्राप्त होगा। संत जनों का आचार शुभ है। वे परमशान्त, गम्भीर और ऊँचे अनुभवरूपी फल से युक्त वृक्ष हैं। उनके यश, कीर्ति और शुभ आचार फूल और पत्ते हैं। ऐसे सन्तजनों की संगति जब प्राप्त होती है, तब जगत् के रागद्वेषरूपी तम मिट जाते हैं। जैसे किसी मजूर के शिर पर बोझ हो और वह तपन से दुखी हो, पर वृक्ष की शीतल छाया प्राप्त होने पर वह शीतल होता है, फल खाकर तृप्त होता है, और थकान का कष्ट दूर हो जाता है, वैसे ही सन्तों के संग से मनुष्य सुख को प्राप्त होता है। जैसे चन्द्रमा की किरणों से मनुष्य शीतल होता है, वैसे ही सन्तजनों के वचन से शान्ति होती है। हे राम! सन्तजनों की संगति करने से पाप दग्ध हो जाते हैं। जो पुरुष सकाम होकर तप, यज्ञ और व्रत करते हैं, उनकी संगति न कीजिये; क्योंकि वे ऐसे हैं, जैसे यज्ञ का खम्भा पवित्र होता है, परन्तु उसकी छाया कुछ नहीं, इससे उसके नीचे कोई सुख नहीं पाता। हे राम! सब सकाम कर्म जन्म-मरण देने-वाले हैं। यद्यपि जिज्ञासु भी यज्ञ, व्रत और तप करते हैं, तो भी वे उनमें
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५०३
श्रेष्ठ हैं, क्योंकि निष्काम हैं। उनको विषयों में नीरसता है और उनका आचार शुभ है। हे राम ! ऐसे जिज्ञासु की संगति विशेष अच्छी है, जिसकी चेष्टा की सब कोई स्तुति करते हैं और वह सबको सुखदायक लगती है। जो जिज्ञासु के समान नवनीत कोमल, सुन्दर और स्निग्ध होता है, उसको सन्तों की संगति प्राप्त होती है।
हे राम ! फूलों के बगीचे और सुन्दर फूलों की शय्या आदि विषयों से भी ऐसा निर्भय सुख नहीं प्राप्त होता, जैसा सन्तों की संगति से प्राप्त होता है; क्योंकि उनका निश्चय सदा आत्मा में रहता है। हे राम ! ऐसे ज्ञानवानों की संगति करके जब हृदय शुद्ध होता है, तब आत्म-तत्त्व की प्राप्ति होती है। जब तक हृदय मलिन है, तबतक उसकी प्राप्ति नहीं होती। जैसे उज्ज्वल आरसी प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, लोहे की शिला प्रतिबिम्ब को नहीं ग्रहण करती; वैसे ही जब हृदय उज्ज्वल होता है, सन्तों के वचन हृदय में ठहरते हैं। जैसे वर्षाकाल का बादल फैलकर थोड़े से बहुत हो जाता है, वैसे ही जब हृदय शुद्ध होता है तब बुद्धि बढ़ती जाती है। जैसे वन में केले का वृक्ष बढ़ता जाता है, वैसे ही बुद्धि बढ़ती जाती है। जब आत्मविषयिणी बुद्धि होती है, तब जीव वही रूप हो जाता है और बुद्धि की भिन्नसंज्ञा का अभाव हो जाता है। जैसे लोहे को पारस का स्पर्श होने पर वह सुवर्ण हो जाता है और फिर लोहे की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही आत्मपद की प्राप्ति होने से बुद्धि की संज्ञा नहीं रहती और विषयभोग की तृष्णा भी जाती रहती है। हे राम ! विषयों की तृष्णा और अभिलाषा ने जीव को दीन बनाया है। जब तृष्णा का त्याग करे, तब परम निर्मलता को प्राप्त होता है। जैसे हाथी जबतक शिर पर धूल डालता है तबतक मलिन रहता है और जब नदी में प्रवेश करता है, तब निर्मल हो जाता है, वैसे ही जब जीव तृष्णारूपी राख का त्याग करता है और आत्मा में स्थित होता है, तब निर्मल होता है। हे राम ! जब जीव भोगों की इच्छा त्यागता है, तब बड़ी शोभा पाता है। जैसे सुवर्ण को अग्नि में डालने से उसका मैल जल आता है और वह उज्ज्वल रूप धारण
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⚛ योगवाशिष्ठ ⚛
करता है । हे राम ! भोगरूपी बड़ा विष है । उसका दिन-दिन त्याग करना विशेष लाभदायक है । जीव जब तृष्णा का त्याग करता है, तब अति शोभा पाता है । जैसे राहु दैत्य से रहित चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तृष्णा का वियोग होने पर पुरुष शोभा पाता है । हे राम ! जब भोगों से वैराग्य होता है, तब दो पदार्थों की प्राप्ति होती है । जैसे नूतन अंकुर के दो पत्ते होते हैं, वैसे ही तृष्णा के त्याग से एक तो सन्तों की संगति मिलती है और दूसरे सत्शास्त्र का विचार उत्पन्न होता है । इनमें जब दृढ़ भावना होती है, तब अभ्यास करके वही परमानन्दरूप होता है, जिसमें वाणी की संगति नहीं । तब मनुष्य भोगों की इच्छा से मुक्त होता है, और परमशान्ति सुख पाता है । जैसे पिंजड़े से निकल-कर पक्षी सुखी होता है, वैसे ही वह सुखी होता है ।
हे राम ! जीव को भोग की इच्छा ने ही दीन किया है । जब इच्छा निवृत्त होती है, तब गोपद की तरह वह संसारसमुद्र को लाँघ जाता है, तब उसको तीनों जगत् सूखे तृण जैसे तुच्छ लगते हैं । हे राम ! जब वह भोग की इच्छा से मुक्त होता है, तब ईश्वर होता है । जिस पुरुष को आत्मसुख प्राप्त हुआ है, वह भोगों की इच्छा कभी नहीं करता और जब वे आकर प्राप्त होते हैं, तब भी वे उसको नीरस और मिथ्या प्रतीत होते हैं, इससे वह उनके भोग को नहीं चाहता । जैसे जाल से निकला हुआ पक्षी फिर जाल में नहीं पड़ता, वैसे ही वह पुरुष भोगों को नहीं चाहता । जब विषयों की तृष्णा निवृत्त होती है, तब परम शान्ति पाता है और सन्तों के वचन उसके हृदय में शीघ्र ही प्रवेश करते हैं ।
हे राम ! मोक्षरूपी स्त्री के कानों के भूषण सन्तों की संगति है । जब साधु की संगति होती है, तब अशुभ कर्मों का त्याग हो जाता है और पराये धन की इच्छा नहीं रहती । तब जो कुछ अपना होता है, उसके भी त्यागने की इच्छा होती है और भले भोग जो भोगने के लिए आते हैं, उनको वह बाँटकर भोग करता है । निदान बड़े उत्तम भोगों से लेकर साग तक जो कुछ प्राप्त है, उसमें से औरों को