योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार मूढ़ मनरूपी हरिण भटकता है। इसमें मेरा यही आशीर्वाद है कि तुमको उस वृक्ष का संग हो। जब उस वृक्ष के निकट जीव जाता है, तब शान्ति होती है। जब उसके नीचे आ बैठता है, तब तीनों ताप अन्तःकरण से मिट जाते हैं। जितने विषयरूपी वृक्ष हैं, उनके निकट गया हुआ मनरूपी मृग शान्ति नहीं पाता। पर जब समाधान रूपी वृक्ष के निकट आता है, तब शान्ति पाता है और बुद्धि खिल उठती है—जैसे सूर्यमुखी कमल सूर्य को देखकर खिल उठता है। उस वृक्ष के अनुभव रूपी फल और शास्त्र-विचाररूपी पत्तों और फूलों को देखकर वह बड़ा आनन्द पाता है, फिर उस वृक्ष के ऊपर चढ़ जाता है और पृथ्वी का त्याग करता है, जैसे सर्प अपनी पुरानी केचुल को छोड़ देता है और नूतन सुन्दर शरीर में शोभित होता है। जब उस वृक्ष पर चढ़ता है, तब गिरता नहीं; क्योंकि उसके पत्ते बहुत मजबूत हैं, उनके आश्रय से ठहरता है समाधानरूपी वृक्ष के पत्ते सत्शास्त्र हैं। जब समाधानरूपी वृक्ष से जीव उतरता है, तब शास्त्र के अर्थ में ठहरता है और जितने पदार्थ देखता है, वे उसे मिट्टी धूल से जान पड़ते हैं। तब वह अपनी पिछली चेष्टा को स्मरण करके पछताता है। जैसे कोई मद्यपान करके नीच चेष्टा करे तो जब मद उतरता है तब पछताता है, वैसे ही मनरूपी मृग अपनी पिछली चेष्टा को धिक्कारता है और कहता है कि बड़ा आश्चर्य है, जो मैं इतने काल तक इस वृक्ष से विमुख हुआ भटकता रहा—अब मुझको शान्ति हुई है। जैसे दिन की तपन न रहने पर चन्द्रमुखी कमलिनी को शान्ति होती है, वैसे ही मनरूपी मृग को शान्ति होती है ?
हे राम ! पुत्र, धन, स्त्री आदि जो दीखते हैं, उनको वह संकल्पपुर और स्वप्न सदृश देखता है। जैसे स्वप्न से जागकर कोई स्वप्नपुर को स्मरण करता है, परन्तु उसमें अभिमान नहीं होता, वैसे ही उसमें भी अभिमान नहीं होता। जब जीव अनुभवरूपी फल को खाता, तब बड़ा आनन्द पाता है, जिसको वाणी नहीं कह सकती। वह शान्त निर्मल और निरतिशयपद को प्राप्त होता है। जो मन का विषय हो, वह