योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 497, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें४६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
सातिशयपद है और जो मन का विषय नहीं है वह निरतिशयपद है। जो इन्द्रियों का विषय है, उसका नाश भी होता है और जो इन्द्रियों और मन का विषय नहीं, उसका नाश नहीं होता। वह मनुष्य उसी अविनाशी पद को पाता है। जैसे किसी को बाण लगता है और उसकी विरोधी बूटी उसके सामने रखिये तो निकल आता है, वैसे ही अनुभवरूपी बूटी को सामने रखने पर मोह बन्धनरूपी शर खुल पड़ते हैं और वह परमपद पाता है। हे राम! ज्ञानवान् जगत् से मृतक हो जाता है। वह संसार से निर्लिप्त रहता है। जैसे लकड़ी अग्नि के बिना शान्त हो जाती है, वैसे ही वासना से रहित ज्ञानवान् की चेष्टा शान्त हो जाती है, अर्थात् संसार की सत्यता से रहित चेष्टा होती है और फिर संसाररूपी अग्नि नहीं प्रज्वलित होती। तब द्वैत और अद्वैत की कल्पना भी मिट जाती है। यह उन्मत्त की तरह अपने स्वरूप में मग्न रहता है। जैसे मरुस्थल के मार्ग में चलनेवाला पथिक धूप की इच्छा नहीं करता, वैसे ही ज्ञानी विषयों की तृष्णा नहीं करता। जिसने आत्म अनुभव-रूपी अमृत पान किया है, उसको विषयरूपी काँजी की इच्छा नहीं रहती—वह पुरुष सदा निर्वासनिक है। जब जीव निर्वासनिक होता है, तब चञ्चल मन की वृत्ति सब लीन हो जाती और केवल आत्मत्व-मात्र शेष रहता है। 'मैं' 'मेरा' इत्यादि भावना नष्ट हो जाती है। जब तक चित्त का सम्बन्ध होता है, तब तक 'मैं' और 'मेरा' प्रतीत होता है और जब चित्त का सम्बन्ध मिट जाता है, तब एक हो जाता है। जैसे एक सूखा और एक गीला काष्ठ होता है। सूखा शुद्ध और गीला उपाधिक कहलाता है। और जब जल सूख जाता है, तब वह भी शुद्ध हो जाता है। वैसे ही जब मन की उपाधि नष्ट हो जाती है, तब शुद्ध आत्मा ही रहता है और एकरस भासित होता है।
हे राम! संसार भ्रम से द्वितीय भासित होता है। जैसे पत्थर की शिला में पुतली अनउपजी ही भासित होती है, जो न सत् है और न असत्। यदि उन्हें पत्थर से भिन्न करके देखिये तो सत् नहीं और जो शिला में देखिये तो वही है। वैसे ही जगत् आत्मा से भिन्न होकर