योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
४६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
सातिशयपद है और जो मन का विषय नहीं है वह निरतिशयपद है। जो इन्द्रियों का विषय है, उसका नाश भी होता है और जो इन्द्रियों और मन का विषय नहीं, उसका नाश नहीं होता। वह मनुष्य उसी अविनाशी पद को पाता है। जैसे किसी को बाण लगता है और उसकी विरोधी बूटी उसके सामने रखिये तो निकल आता है, वैसे ही अनुभवरूपी बूटी को सामने रखने पर मोह बन्धनरूपी शर खुल पड़ते हैं और वह परमपद पाता है। हे राम! ज्ञानवान् जगत् से मृतक हो जाता है। वह संसार से निर्लिप्त रहता है। जैसे लकड़ी अग्नि के बिना शान्त हो जाती है, वैसे ही वासना से रहित ज्ञानवान् की चेष्टा शान्त हो जाती है, अर्थात् संसार की सत्यता से रहित चेष्टा होती है और फिर संसाररूपी अग्नि नहीं प्रज्वलित होती। तब द्वैत और अद्वैत की कल्पना भी मिट जाती है। यह उन्मत्त की तरह अपने स्वरूप में मग्न रहता है। जैसे मरुस्थल के मार्ग में चलनेवाला पथिक धूप की इच्छा नहीं करता, वैसे ही ज्ञानी विषयों की तृष्णा नहीं करता। जिसने आत्म अनुभव-रूपी अमृत पान किया है, उसको विषयरूपी काँजी की इच्छा नहीं रहती—वह पुरुष सदा निर्वासनिक है। जब जीव निर्वासनिक होता है, तब चञ्चल मन की वृत्ति सब लीन हो जाती और केवल आत्मत्व-मात्र शेष रहता है। 'मैं' 'मेरा' इत्यादि भावना नष्ट हो जाती है। जब तक चित्त का सम्बन्ध होता है, तब तक 'मैं' और 'मेरा' प्रतीत होता है और जब चित्त का सम्बन्ध मिट जाता है, तब एक हो जाता है। जैसे एक सूखा और एक गीला काष्ठ होता है। सूखा शुद्ध और गीला उपाधिक कहलाता है। और जब जल सूख जाता है, तब वह भी शुद्ध हो जाता है। वैसे ही जब मन की उपाधि नष्ट हो जाती है, तब शुद्ध आत्मा ही रहता है और एकरस भासित होता है।
हे राम! संसार भ्रम से द्वितीय भासित होता है। जैसे पत्थर की शिला में पुतली अनउपजी ही भासित होती है, जो न सत् है और न असत्। यदि उन्हें पत्थर से भिन्न करके देखिये तो सत् नहीं और जो शिला में देखिये तो वही है। वैसे ही जगत् आत्मा से भिन्न होकर
४६८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
हे राम ! वाञ्छित देश को पथिक तब पहुँचता है, जब एक देश का त्याग करता है। वैसे ही शुद्धस्वरूप परमानन्द अपना रूप आत्मा तब प्राप्त होता है, जब धन, लोक, पुत्र, एषणा आदि का त्याग करे। जब आत्मा की प्राप्ति होती है, तब निर्विकल्प समाधि से शुद्ध चैतन्य का साक्षात्कार होता है, और जब समाधि से उसका साक्षात्कार होता है, तब चेष्टा होने पर भी उसी में स्थित रहता है; परम निर्वाणपद को प्राप्त होता है। चित्तरूपी वेल दूर हो जाती है। जैसे रस्सी में जो बल होता है, उसको खींचकर फिर छोड़ते हैं, तब वह सीधी हो जाती है, वैसे ही जिसको समाधि में चैतन्य का साक्षात्कार होता है, उसको उत्थानकाल में भी वही भासित होता है। पर जिसको उसका प्रमाद है, उसको जगत् भासित होता है। हे राम ! वस्तु एक है, परन्तु उसमें दो दृष्टियाँ हैं। जैसे रस्सी एक है, पर सम्यक्दर्शी को रस्सी दिखती है और असम्यक्दर्शी को सर्प, वैसे ही ज्ञानवान् को आत्मा प्रतीत होता है और अज्ञानी को जगत् दीखता है। जिस पुरुष ने ज्ञान से जगत् को असत्य नहीं जाना, वह मानो चित्र की अग्नि है। उससे कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। और जिसको स्वरूप की इच्छा है, जो तृष्णा के नाश का प्रयत्न करता है, जगत् को मिथ्या विचारता है, वह आत्मपद को प्राप्त होगा। उसकी तृष्णा भी निवृत्त हो जायगी। हे राम ! ज्ञानवान् की तृष्णा स्वाभाविक मिट जाती है। जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार मिट जाता है, वैसे ही वस्तु की सत्ता पाकर उसकी तृष्णा नष्ट हो जाती है। वह परमपद में स्थित होता है। हे राम ! जिसको दृश्य में नीरसता है, वह उत्तम पुरुष है। वह मनुष्यशरीर में ही ब्रह्म हो जाता है। उसको मेरा नमस्कार है। वह मेरा गुरु है। हे राम ! जब जीव की बुद्धि विषय से विरक्त होती है, तब कल्याण होता है। वैराग्य से बोध होता है और बोध से वैराग्य होता है, क्योंकि दोनों सम्बन्धित परस्पर सापेक्ष हैं। जब एक आता है, तब दूसरा भी आता है। जब ये आते हैं, तब तीनों एषणाएँ निवृत्त हो जाती हैं। जब तीनों एषणाएँ नष्ट होती हैं, तब अमृत की प्राप्ति होती है।
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४४६
हे राम ! सन्तों का संग और सत्शास्त्रों का श्रवण करके स्वरूप का अभ्यास करो—इससे आत्मपद की प्राप्ति होती है। ये तीनों परस्पर सहकारी हैं। जैसे आठ पाँववाला कीट प्रथम चरण को रखकर और चरणों को रखता है, तब सुख से चला जाता है, वैसे ही सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के सुनने से जो आत्मपद का अभ्यास करता है, वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होता है। उसे जगत् का अभाव हो जाता है। हे राम ! जगत् के भाव और अभाव को ज्ञानी जानता है। जैसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को तुरीयावस्थावाला जानता है, वैसे ही जगत् के भाव-अभाव को ज्ञानी जानता है। जैसे अग्नि में सूखा तृण डालो तो देख नहीं पड़ता, वैसे ही ज्ञानवान् को जगत् नहीं दीखता। हे राम ! ज्ञानवान् को सर्वदा समाधि है, कभी अहं का उत्थान नहीं होता। जब तक उस पद को प्राप्त न हो, तब तक साधना में लगा रहे और जब उस पद को प्राप्त हो, तब फिर कोई यत्न करना बाक़ी नहीं रहता। हे राम ! इस चित्त के दो प्रवाह हैं—एक तो जगत् की ओर जाता है और दूसरा स्वरूप की ओर। जो जगत् की ओर जाता है, वह औपाधिक है, और जो स्वरूप की ओर जाता है, वह उपाधि को दूर करनेवाला है। जैसे एक लकड़ी गीली और एक सूखी होती है। जो गीली है उसमें उपाधि जल है, वह फैल जाता है। और जब जल नष्ट हो जाता है, तब वह शुद्ध होती है, फिर प्रफुल्लित नहीं होती। वैसे ही संसार की सत्यता से चित्त बढ़ता है, और जब संसार की वासना नष्ट होती है तब शुद्धपद पाता है। हे राम ! वाद भी दो प्रकार के हैं। जो वाद किसी को दुःख दे, उसे मूर्ख कहते हैं। और जो परस्पर मित्रभाव से तत्त्व का निरूपण करे, वह वाद ज्ञानवान् करते हैं। जो जैसा वाद करते हैं, उन्हें उसका दृढ़ अभ्यास होता है और वैसा ही रूप उनका हो जाता है। जो झगड़ा करते हैं उनका वही रूप हो जाता है और जो मित्रता से स्वरूप का वाद करते हैं, उनका वही रूप होता है—उस पद को पाकर परम शान्ति होती है।
इति० नि० मनमृगोपाख्यानंयोगोनामशताधिकपञ्चषष्टितमसर्गः ॥१६५॥
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पूर्वार्द्ध समाप्तम्।
श्रीगणेशाय नमः ।
श्रीयोगवाशिष्ठ
निर्वाण प्रकरण उत्तरार्द्ध
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष ने समाधानरूपी वृक्ष के फल को जानकर खा लिया और उसको पचाया है, उसे परम स्थिति प्राप्त होती है। जैसे पंख टूटने से पर्वत यथास्थान स्थित है, वैसे ही तृष्णारूपी पंख टूटने से जीव स्थिर होता है। हे राम ! जब उसको फल प्राप्त होता है, तब उसका चित्त भी आत्मरूप हो जाता है। जैसे दीपक का निर्वाण होता है, तब जाना नहीं जाता कि वह कहाँ गया, वैसे ही आत्मपद के प्राप्त होने पर चित्त भिन्न होकर दिखाई नहीं देता। हे राम ! जब तक वह अकृत्रिम आनन्द नहीं प्राप्त हुआ और उस पद में विश्राम नहीं पाया, तब तक शान्ति नहीं प्राप्त होती। वह पद निर्गुण, शुद्ध, स्वच्छ और परम शान्त है। जब उस पद में स्थिति होती है, तब परम समाधि हो जाती है। ऐसा त्रिलोकी में कोई नहीं, जो उसको समाधि से उतारे। जैसे चित्त की मूर्ति होती है, वैसे ही उसकी अवस्था होती है। उसकी सब चेष्टा इच्छा से रहित होती है। जैसे पंख से रहित पर्वत स्थिर होता है, वैसे ही मन संकल्प विकल्प से रहित हो जाता है और शान्तिपद को प्राप्त होता है। हे राम ! जिसके मन में संसार का अभाव हुआ है, वह शान्तिपद को प्राप्त होता है। जब तक वासना से युक्त है, तब तक मन है। जिस क्रम और युक्ति से वासना का क्षय हो वही कर्तव्य है। हे राम ! जब वासना का क्षय होता है, तब बोधरूप शेष रहता है, इसलिए जिस क्रम से वह प्राप्त हो, वही करना चाहिए, क्योंकि उस पद के प्राप्त हुए बिना शान्ति कभी न होगी। जब चित्त उस पद की ओर आवे, तब शान्त होकर दुःख से रहित और अविनाश
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५०१
हो; क्योंकि सबका आत्मा निर्विभाग, अनन्त, परम शान्तिरूप और सबको कर्म के फल का देनेवाला है ।
हे राम ! जब ऐसे पद को जीव प्राप्त होता है, तब उसको वासना के उत्थानकाल में भी आत्मा ही भासित होता है, द्वैत नहीं दिखता । तब समाधि से उत्थान कैसे हो ? ऐसा कोई समर्थ नहीं कि उसको समाधि से उतारे । जब ऐसा पद प्राप्त होता है, तब संसार नीरस लगता है । हे राम ! जबतक मनुष्य मूर्तिवत् नहीं होता; तबतक विषय का त्याग करे, और जब ऐसी दशा हो, तब कुछ कर्तव्य नहीं रहता, त्याग करे अथवा न करे । यह मुझे निश्चय है कि जब ज्ञान उपजेगा, तब मनुष्य विषयों से विरक्त हो जावेगा । ब्रह्म से काष्ठपर्यन्त जितने पदार्थ हैं वे सब उसको नीरस हो जाते हैं । ऐसा जो पुरुष है, उसको सदा समाधि है । हे राम ! जिसको समाधि का सुख मिल जाता है, वह स्वाभाविक समाधि की ओर आता है । जैसे वर्षाकाल की नदी स्वाभाविक समुद्र को जाती है, वैसे ही वह पुरुष समाधि की ओर लगा रहता है । जो पुरुष विषयों से विरक्त और आत्माराम होता है, उसकी वज्रसार की सी दृढ़ स्थित होती है । जैसे पंख से रहित पर्वत स्थिर होते हैं वैसे ही जिस पुरुष ने संसार को नीरस जानकर त्याग दिया है और आत्मा में क्रीड़ा करके तृप्त हुआ है, उसकी मति चलायमान नहीं होती । हे राम ! जिस पुरुष की चेष्टा भी होती है, पर जो संकल्प-विकल्प से रहित है, वह सदा मुक्तरूप है । उसको कोई कर्म बन्धन नहीं करता; क्योंकि कर्म और साधन का अभाव हो जाता है । जिस पुरुष को जगत् नीरस हो गया है, उसको विषयों की तृष्णा कैसे हो ? और जब तृष्णा न रही, तब दुःख कैसे हो ? दुःख तब तक होता है, जबतक विषयों की तृष्णा होती है, और विषयों की तृष्णा तब होती है, जब अपने स्वभाव को मनुष्य छोड़ देता है । हे राम ! जब अपने स्वभाव में स्थित हो, तब परस्वभाव जो इन्द्रियों के विषय हैं, वे रससंयुक्त कैसे लगें और दुःख और तृष्णा कैसे हो ?
हे राम ! जब मनुष्य अपने स्वभाव को जानता है, तब निर्वाणपद
५०२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
को प्राप्त होता है, जो आदि और अन्त से रहित है। उसकी प्राप्ति का उपाय यह है कि वेदान्त का अध्ययन करे और प्रणव का जप करे। जब इनसे थके, तब समाधिस्थ हो और जब फिर थके, तब वहीं पूर्व-स्थित में आकर मनन करे। जब ऐसा दृढ़ अभ्यास हो तब उस पद को प्राप्त होगा, जो संसार का पार है। जब उस पद को पाया, तब परम-शान्ति को प्राप्त होगा और स्वच्छ निर्मल अपने स्वभाव में स्थित होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्वभावसत्तायोगोपदेशो नाम शताधिकषट्षष्टितमसर्गः ॥ १६६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह संसार बड़ा गम्भीर है। इसका तरना कठिन है। जिसको इसमें तरने की इच्छा हो, उसका यह कर्तव्य है कि वेदान्त का अध्ययन, प्रणव का जप और चित्त को स्थिर करे। जब ऐसा उपाय करे, तब ईश्वर उस पर प्रसन्न होंगे और उसके हृदय में विवेक उत्पन्न होगा; जिससे संसार असत्य प्रतीत होगा और सन्त जनों का संग प्राप्त होगा। संत जनों का आचार शुभ है। वे परमशान्त, गम्भीर और ऊँचे अनुभवरूपी फल से युक्त वृक्ष हैं। उनके यश, कीर्ति और शुभ आचार फूल और पत्ते हैं। ऐसे सन्तजनों की संगति जब प्राप्त होती है, तब जगत् के रागद्वेषरूपी तम मिट जाते हैं। जैसे किसी मजूर के शिर पर बोझ हो और वह तपन से दुखी हो, पर वृक्ष की शीतल छाया प्राप्त होने पर वह शीतल होता है, फल खाकर तृप्त होता है, और थकान का कष्ट दूर हो जाता है, वैसे ही सन्तों के संग से मनुष्य सुख को प्राप्त होता है। जैसे चन्द्रमा की किरणों से मनुष्य शीतल होता है, वैसे ही सन्तजनों के वचन से शान्ति होती है। हे राम! सन्तजनों की संगति करने से पाप दग्ध हो जाते हैं। जो पुरुष सकाम होकर तप, यज्ञ और व्रत करते हैं, उनकी संगति न कीजिये; क्योंकि वे ऐसे हैं, जैसे यज्ञ का खम्भा पवित्र होता है, परन्तु उसकी छाया कुछ नहीं, इससे उसके नीचे कोई सुख नहीं पाता। हे राम! सब सकाम कर्म जन्म-मरण देने-वाले हैं। यद्यपि जिज्ञासु भी यज्ञ, व्रत और तप करते हैं, तो भी वे उनमें
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५०३
श्रेष्ठ हैं, क्योंकि निष्काम हैं। उनको विषयों में नीरसता है और उनका आचार शुभ है। हे राम ! ऐसे जिज्ञासु की संगति विशेष अच्छी है, जिसकी चेष्टा की सब कोई स्तुति करते हैं और वह सबको सुखदायक लगती है। जो जिज्ञासु के समान नवनीत कोमल, सुन्दर और स्निग्ध होता है, उसको सन्तों की संगति प्राप्त होती है।
हे राम ! फूलों के बगीचे और सुन्दर फूलों की शय्या आदि विषयों से भी ऐसा निर्भय सुख नहीं प्राप्त होता, जैसा सन्तों की संगति से प्राप्त होता है; क्योंकि उनका निश्चय सदा आत्मा में रहता है। हे राम ! ऐसे ज्ञानवानों की संगति करके जब हृदय शुद्ध होता है, तब आत्म-तत्त्व की प्राप्ति होती है। जब तक हृदय मलिन है, तबतक उसकी प्राप्ति नहीं होती। जैसे उज्ज्वल आरसी प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, लोहे की शिला प्रतिबिम्ब को नहीं ग्रहण करती; वैसे ही जब हृदय उज्ज्वल होता है, सन्तों के वचन हृदय में ठहरते हैं। जैसे वर्षाकाल का बादल फैलकर थोड़े से बहुत हो जाता है, वैसे ही जब हृदय शुद्ध होता है तब बुद्धि बढ़ती जाती है। जैसे वन में केले का वृक्ष बढ़ता जाता है, वैसे ही बुद्धि बढ़ती जाती है। जब आत्मविषयिणी बुद्धि होती है, तब जीव वही रूप हो जाता है और बुद्धि की भिन्नसंज्ञा का अभाव हो जाता है। जैसे लोहे को पारस का स्पर्श होने पर वह सुवर्ण हो जाता है और फिर लोहे की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही आत्मपद की प्राप्ति होने से बुद्धि की संज्ञा नहीं रहती और विषयभोग की तृष्णा भी जाती रहती है। हे राम ! विषयों की तृष्णा और अभिलाषा ने जीव को दीन बनाया है। जब तृष्णा का त्याग करे, तब परम निर्मलता को प्राप्त होता है। जैसे हाथी जबतक शिर पर धूल डालता है तबतक मलिन रहता है और जब नदी में प्रवेश करता है, तब निर्मल हो जाता है, वैसे ही जब जीव तृष्णारूपी राख का त्याग करता है और आत्मा में स्थित होता है, तब निर्मल होता है। हे राम ! जब जीव भोगों की इच्छा त्यागता है, तब बड़ी शोभा पाता है। जैसे सुवर्ण को अग्नि में डालने से उसका मैल जल आता है और वह उज्ज्वल रूप धारण
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⚛ योगवाशिष्ठ ⚛
करता है । हे राम ! भोगरूपी बड़ा विष है । उसका दिन-दिन त्याग करना विशेष लाभदायक है । जीव जब तृष्णा का त्याग करता है, तब अति शोभा पाता है । जैसे राहु दैत्य से रहित चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तृष्णा का वियोग होने पर पुरुष शोभा पाता है । हे राम ! जब भोगों से वैराग्य होता है, तब दो पदार्थों की प्राप्ति होती है । जैसे नूतन अंकुर के दो पत्ते होते हैं, वैसे ही तृष्णा के त्याग से एक तो सन्तों की संगति मिलती है और दूसरे सत्शास्त्र का विचार उत्पन्न होता है । इनमें जब दृढ़ भावना होती है, तब अभ्यास करके वही परमानन्दरूप होता है, जिसमें वाणी की संगति नहीं । तब मनुष्य भोगों की इच्छा से मुक्त होता है, और परमशान्ति सुख पाता है । जैसे पिंजड़े से निकल-कर पक्षी सुखी होता है, वैसे ही वह सुखी होता है ।
हे राम ! जीव को भोग की इच्छा ने ही दीन किया है । जब इच्छा निवृत्त होती है, तब गोपद की तरह वह संसारसमुद्र को लाँघ जाता है, तब उसको तीनों जगत् सूखे तृण जैसे तुच्छ लगते हैं । हे राम ! जब वह भोग की इच्छा से मुक्त होता है, तब ईश्वर होता है । जिस पुरुष को आत्मसुख प्राप्त हुआ है, वह भोगों की इच्छा कभी नहीं करता और जब वे आकर प्राप्त होते हैं, तब भी वे उसको नीरस और मिथ्या प्रतीत होते हैं, इससे वह उनके भोग को नहीं चाहता । जैसे जाल से निकला हुआ पक्षी फिर जाल में नहीं पड़ता, वैसे ही वह पुरुष भोगों को नहीं चाहता । जब विषयों की तृष्णा निवृत्त होती है, तब परम शान्ति पाता है और सन्तों के वचन उसके हृदय में शीघ्र ही प्रवेश करते हैं ।
हे राम ! मोक्षरूपी स्त्री के कानों के भूषण सन्तों की संगति है । जब साधु की संगति होती है, तब अशुभ कर्मों का त्याग हो जाता है और पराये धन की इच्छा नहीं रहती । तब जो कुछ अपना होता है, उसके भी त्यागने की इच्छा होती है और भले भोग जो भोगने के लिए आते हैं, उनको वह बाँटकर भोग करता है । निदान बड़े उत्तम भोगों से लेकर साग तक जो कुछ प्राप्त है, उसमें से औरों को
# * निर्वाण प्रकरण *
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देकर वह खाता है। तब यदि कोई शरीर माँगे तो वह शरीर भी दे देता
है; क्योंकि उसको देने का अभ्यास हो जाता है। पर और से साग
माँगने की भी इच्छा नहीं रखता। संतोष से यथाप्राप्त चेष्टा और तप,
दान करता है। यज्ञ, व्रत और ध्यान करके पवित्र रहता है और तृष्णा
का त्याग करता है। हे राम! ऐसा दुःख घोर नरक में भी नहीं होता,
जैसा तृष्णा से होता है। जो धनवान् हैं, उनको धन के कमाने और
रखने की चिन्ता है। उन्हें उठते-बैठते, खाते-पीते, चलते-सोते सदा
धन की ही चिन्ता रहती है। इसी चिन्ता में वे पच-पचकर मर जाते हैं
और फिर जन्म लेते हैं। हे राम! निर्धन को भी चिन्ता रहती है, परन्तु
थोड़ी होती है। जब तक चिन्ता रहती है, तब तक जीव दुखी रहता है,
पर जब चिन्ता नष्ट होती है, तब परम सुखी होता है।
हे राम! यद्यपि धनी हो और उसे संतोष नहीं तो वह परम दरिद्री
है, और जो धन से हीन है, परन्तु संतोषवान् है, वह ईश्वर है। जिसको
संतोष है, उसको विषय बन्धन नहीं कर सकते। हे राम! जब तक धन
की इच्छा नहीं करता, तब तक भोगरूपी विष नहीं व्यापता। पर जब
धन की इच्छा उपजती है, तब परम विष व्यापता है। विपरीत भावना
में दुःख होता है और जो दुःखदायक पदार्थ हैं, वे सुखदायक जान
पड़ते हैं। हे राम! जो कुछ अर्थ है, वही अनर्थ है। जिसको संपदा
जानते हैं, वही आपदा है और जिनको भोग जानते हैं, वही सब
रोगरूप है। इनको संपदा जानकर चाहता है, इससे बड़ा दुखी होता
है। हे राम! रसायन सब दुःखों का नाश करती है, परन्तु वह देव-
ताओं के पास होती है। यदि अमृत चाहिए तो संतोष ही परम रसा-
यन है। जब विषयों में दोषदृष्टि होती है और मनुष्य संतोष धारण
करता है, तब मूर्खता दूर हो जाती है और गोपद की तरह संसारसमुद्र
से शीघ्र ही तर जाता है। जैसे गऊ के पैर के गढ़े को सहज ही लाँघ
जाते हैं, वैसे ही संसारसमुद्र को वह सहज में तर जाता है। हे राम!
जिसको संतोष प्राप्त होता है, उसको परम शान्ति होती है। कभी
बसन्तऋतु भी सुख का स्थान हो, नन्दनवन भी सुख का स्थान हो,
५०६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
उर्वशी आदिक अप्सरागण प्राप्त हों; चन्द्रमा निकला हो, कामधेनु विद्यमान हो और इन्द्रियों के सब सुख प्राप्त हों, तो भी शान्ति न होगी, एक संतोष से ही शान्ति होगी। सन्तोषवान् को ये विषय डिगा नहीं सकते।
हे राम ! जैसे धवाँ भरकर छोड़ने से तालाव नहीं भर जाता, पर जब वर्षा होती है, तब शीघ्र ही भर जाता है, वैसे ही विषयों के भोग में शान्ति नहीं होती; सन्तोष ही से पूर्ण आनन्द और ओज की प्राप्ति होती है। गम्भीर, निर्मल, शीतल, हृदयगम्य और सबका हितकारी ओज सन्तोषी पुरुषों को प्राप्त होता है। और जो ओज है वे सात्त्विक, राजस और तामस होते हैं, पर यह शुद्ध सात्त्विक है। जिस पुरुष को सन्तोष होता है, वह ऐसे शोभित होता है, जैसे वसन्तऋतु का वृक्ष फूल, फल और पत्तों से शोभा पाता है। और जिसको तृष्णा है, वह चरणों के नीचे आये कीड़े की तरह कुचल जाता है। हे राम ! जिसको तृष्णा है, उसको सन्तोष और शान्ति भी नहीं होती। जैसे जल में डाला गया तृणों का पूला तीव्र पवन में उड़ता-फिरता है, वैसे ही तृष्णावान् पुरुष को क्षोभ होता है। हे राम ! जो पुरुष अर्थ की सदा इच्छा करता है वह अग्नि में प्रवेश करता है, अर्थात् सर्वदा तपती रहती है। जैसे गर्दभ विष्ठा के स्थान में प्रवेश करता है, वैसे ही तृष्णावान् जो विषय-रूपी गंदे स्थान में प्रवेश करता है, वह गर्दभ है। जैसे गर्दभ का स्पर्श करना अनुचित है, वैसे ही तृष्णावान् गर्दभ से स्पर्श करना योग्य नहीं है। हे राम ! यह संसार मिथ्या है। जो इस संसार के पदार्थों को चाहता है, वह मूर्ख है। इस जगत के अधिष्ठान को प्राप्त होने से जीव निर्वासनिक होता है, और जब निर्वासनिक होता है, तब सन्तोष को प्राप्त होता है। तब ऐसा होता है जैसे तारों में चन्द्रमा शोभा पाता है—इससे इच्छा के नाश का उपाय करो। हे राम ! जब इच्छा नष्ट होती है और सन्तोषरूपी गम्भीरता प्राप्त होकर द्वैतकल्पना मिटती है, तब उसी को पण्डितजन परमपद कहते हैं। यह पद कैसे प्राप्त होता है, सो भी श्रवण करो। हे राम ! जब संसार में वैराग्य, सन्तों की संगति और सतशास्त्रों के अर्थों और आत्मा में दृढ़भावना होती है, तब जगत्
🔆 निर्वाण प्रकरण 🔆 ५०७
नीरस हो जाता है, अर्थात् जगत् असत् प्रतीत होता है, हृदय में शान्ति होती है, जीव अपने को ब्रह्म जानता है और परिच्छिन्नता मिट जाती है । जब तक जीव अपने को परिच्छिन्न जानता था, तब तक सब दुःखों का अनुभव करता था और जब सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों से जगत् नीरस प्रतीत होता है, तब परमपद को प्राप्त होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे मोक्षोपदेशो नाम शताधिकसप्तषष्टितमस्सर्गः ॥ १६७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब संसार में वैराग्य होता है, तब सन्तों की संगति होती है । फिर शास्त्र सुनता है । तब सम्पूर्ण जगत् नीरस हो जाता है । जब जगत् नीरस लगा और आत्मा में दृढ़ अभ्यास हुआ, तब अपनी स्वभाव सत्ता प्रकाशित होती है । उसी स्वभावसत्ता में स्थित होने पर परमानन्द की प्राप्ति होती है, जिसमें वाणी की गति नहीं है । हे राम ! जब यह अवस्था प्राप्त होती है, तब मन स्थिर हो जाता है; अर्थों की तृष्णा नहीं रहती । जो अपने पास होता है उसको रखने की भी इच्छा नहीं रहती—सहज त्याग हो जाता है—और पुत्र, धन, स्त्री आदिक सब नीरस हो जाते हैं । यद्यपि वह मनुष्य इनके बीच में रहता है तो भी इनमें 'अहं' 'मम' अभिमान नहीं करता । जैसे मजदूर चलता-चलता किसी मार्ग में आ उतरता है और मार्गवालों से कुछ सम्बन्ध नहीं रखता, वैसे ही वह किसी विषय से सम्बन्ध नहीं रखता, और जो अनिच्छित इन्द्रियों के सुख प्राप्त होते हैं, उनमें रागद्वेष नहीं रखता । जैसे किसी पत्थर की शिला पर जल चला जाता है तो उसको कुछ रागद्वेष नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान को किसी में रागद्वेष नहीं होता ।
हे राम ! उसके शरीर की यह स्वाभाविक अवस्था हो जाती है कि वह एकान्त को चाहता है और बन और कन्दरा में रहने की इच्छा करता है । मुमुक्षु को अज्ञान के स्थान जो स्त्री भोग, राग-द्वेष के इष्ट-अनिष्ट भी दैवसंयोग से प्राप्त होते हैं तो भी उन्हें शीघ्र ही त्याग देता है । हे राम ! जब क्षेत्र में बीज डालना होता है, तब पहले जो
५०८ ✻ योगवाशिष्ट ✻
काँटे आदि होते हैं, उन्हें खड्ग से काटकर दूर किया जाता है। तब खेत अच्छा फलता है। वैसे ही जिस पुरुष को मनरूपी क्षेत्र में अनुभव-रूपी फल देखना हो वह इच्छारूपी कण्टकों और वृक्षों को अनिच्छा-रूपी खड्ग से काटे और सन्तोषरूपी बीज को बोवे तो खेत भी अच्छा फलेगा। हे राम ! जब अनुभवीरूपी फल प्राप्त होता है, तब मनुष्य सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से भी स्थूल हो जाता है, और सबमें आत्मा को देखता है। हे राम ! जब चित्त अदृश्य होता है, तब द्वैत भावना मिट जाती है और जब द्वैत भावना मिटी तब चित्त अदृश्य होता है। उस चित्त को जो उपशम का सुख होता है, वह वाणी से कहा नहीं जा सकता—उसका नाम निर्वाणपद है। जब मनुष्य ईश्वर की भक्ति करता है और दिनरात्रिचिरकाल तक भक्ति करता रहता है, तब ईश्वर प्रसन्न होते हैं और निर्वाणपद की प्राप्ति होती है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! हे सब तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ ! वह कौन ईश्वर है और उसकी भक्ति क्या है, जिसके करने से निर्वाणपद प्राप्त होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वह ईश्वर दूर नहीं; उसमें भेद भी कुछ नहीं और वह दुर्लभ भी नहीं; क्योंकि वह अनुभवस्वरूप ज्योति और परमबोधस्वरूप है। सब जिसके वश है, जो सब है और जिसमें सब है, उस सर्वात्मा को मेरा नमस्कार है। हे राम ! सब कोई उसी को पूजते हैं। जप, मन्त्र, तप, दान, होम जो कुछ कोई करता है, वह सभी उसी की पूजा है। देवता, दैत्य, मनुष्य आदि जो स्थावर-जङ्गम प्राणी हैं, वे सब उसी को पूजते हैं और सबको फल देनेवाला भी वही है। उत्पत्ति और प्रलय में जो पदार्थ दीखते हैं; वे सब उसी में सिद्ध होते हैं—ऐसा वह ईश्वर है। जब वह ईश्वर प्रसन्न होता है, तब वह पवित्र, शुभाचरण करने वाला अपना एक दूत भेजता है।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! ईश्वर अद्वैत आत्मा शुद्ध ब्रह्म है। उसका दूत कौन है और वह कैसे आता है, यह मुझसे कहिये। वशिष्ठ ने कहा, हे राम ! उस ईश्वर जो परमदेव का दूतविवेक है वह हृदयरूपी गुफा में उदय होता है। जब वह उदय होता है, तब उससे जीव परम
- निर्वाण प्रकरण * ५०६
शोभा प्राप्त करता है। जैसे चन्द्रमा के उदय होने पर आकाश शोभा पाता है, वैसे ही वह पुरुष शोभा पाता है। हे राम! जब विवेकरूपी दूत आता है, तब जीव को संसार से पवित्र करता है। मनुष्य प्रथम वासनारूपी मैल से भरा था और चिन्तारूपी शत्रु ने उसे बाँधा था; पर जब विवेकरूपी दूत आता है, तब वह चित्तरूपी शत्रु को मारता है और वासनारूपी मैल का नाश करके देव के निकट ले जाता है। जब उस देव का दर्शन होता है, तब परमानन्द को प्राप्त होता और बड़ा सुख पाता है। हे राम! संसाररूपी समुद्र में मृत्युरूपी भँवर है, तृष्णारूपी तरंगें हैं, अज्ञानरूपी जल है और इन्द्रियाँरूपी ग्राह हैं। उसी समुद्र में ये जीव पड़े हैं। जब विवेकरूपी नौका अकस्मात् प्राप्त होती है, तब वे संसारसमुद्र से पार होते हैं। हे राम! जीव प्रमाद से ही जड़ता को प्राप्त हुए हैं। जैसे जल शीतलता से ओला कहलाता है, वैसे ही प्रमाद से आत्मा जीवसंज्ञा पाता है और वासना से ढक जाता है। पर जब अन्तर्मुख होता है, तब उस देव के सम्मुख होता है और वह देव प्रसन्न होता है। उसके सहस्र शीश, सहस्र पाद, सहस्र भुजा, सहस्र नेत्र और सहस्र कर्ण हैं। सब चेष्टाएँ वही करता है। देखता, सुनता, बोलता और चलता भी वही है। वह अपनी स्वभावसत्ता से प्रकाशित होता है। जैसे सब देहों में चलनशक्ति पवन की है, वैसे ही प्रकाशशक्ति उस देव की है। जब जीव उसके सम्मुख होता है, तब वह प्रसन्न होकर विवेकरूपी दूत भेजता है। तब मनुष्य सन्तों की संगति करता है। तब सत्शास्त्रों को सुनकर उनके अर्थ में दृढ़भावना होती है और वह विवेकरूपी दूत अहं को अदृश्य करता है। तब यह जीव शून्य हो जाता है। फिर यह शून्य को भी त्यागकर बोधमात्र में स्थित होता है। तब पूर्ण आनन्द प्राप्त होता है।
हे राम! जीव आनन्दस्वरूप है और यह विश्व अपना रूप है। परन्तु अज्ञान से भिन्न प्रतीत होता है। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा, मरुस्थल में जल और आकाश में तरुवर दीखते हैं, वैसे ही भ्रान्ति से जगत् प्रतीत होता है। पर सब प्राणियों के भीतर-बाहर और नीचे-ऊपर
५२० ✴ योगवाशिष्ठ ✴
सर्वत्र ब्रह्मदेव ही व्याप्त रहा है। स्थावर, जङ्गम आदि सब जगत उसी आत्मतत्त्व के आश्रय से फुरता है। इसमें वही आत्मा का स्वरूप है और वही सबका धारण कर रहा है। वही ईश्वर ब्रह्म है। गम्भीर, साक्षी, आत्मा, ॐकार, प्रणव सब उसी के नाम हैं। जब उस ईश्वर की कृपा होती है, तब जीव अन्तर्मुख होकर निर्मल होता है। हे राम! जब हृदय शुद्ध होता है, तब आत्मपद की ओर भावना होती है कि सब आत्मा ही है। यह भावना ही भक्ति है—तब ईश्वर वह कृपा करके विवेकरूपी दूत भेजता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विवेकदूतवर्णनं नाम शताधिकअष्टषष्टितमसर्गः ॥ १६८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब विवेक दृढ़ होता है, तब जीव उस परमपद को प्राप्त होता है, जो चैत्य से रहित चैतन्य घन है। तब चैत्य का सम्बन्ध टूट जाता है। जब चैतन्य का सम्बन्ध टूटा, तब विश्व का क्षय हो जाता है। जब विश्व का क्षय हुआ, तब वासना भी नहीं रहती। हे राम! यह जगत भी संकल्प के फुरने से है। जब जीव शुद्ध चैतन्य में चैतन्यान्मुख होता है, तब मनोमात्र शरीर होता है, जिसको अन्तर्वाहक कहते हैं। और जब वासना दृढ़ होती है, तब आधिभौतिक प्रतीत होने लगता है। हे राम! इसका उत्थान ही अनर्थ का कारण है। जब यह चेतन होता है, तब इसको अनर्थ की प्राप्ति होती है और मैं मेरा इत्यादिक जगत भासित होता है। जो यह न हो तो जगत भी न हो। इसके होने से ही जगत प्रतीत होता है। इससे मेरा यही आशीर्वाद है कि तुम चेतनता से शून्य हो जाओ और अहंतारूपी चेतनता से रहित अपने बोध में स्थित रहो।
हे राम! मन से ही जगत हुआ है। मन और जगत, दोनों मिथ्या और शून्य हैं। रूप, अवलोक और मनस्कार, तीनों का नाम जगत है। वह मृगतृष्णा के जल सा मिथ्या और शून्य है। जब इनका अभाव होता है, तब शून्य भी नहीं रहता, केवल बोधमात्र चैतन्य होता है। हे राम! दृश्य, दर्शन और द्रष्टा, ये तीनों भावनामात्र हैं। जब ये
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
होते हैं, तब जगत् भासित होता है और जब अहंता का अभाव होता है, तब आत्मपद शेष रहता है। जैसे सुवर्ण में भूषण होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् है, दूसरी वस्तु कोई नहीं बनी। वासना से दृश्य दिखता है। वह वासना मन में उठी है और मन अज्ञान से हुआ है। जब मन संकल्प-विकल्प से रहित होता है, तब सब दृश्य एक ही रूप हो जाता है। जब तक वासना उठती है, तब तक मन में शान्ति नहीं होती। जैसे कोई पुरुष भोंरी घुमाता है, तो बल चढ़ते जाते हैं, और जब ठहरता है, तब वह बल उतर जाता है, वैसे ही जब तक चित्त वासना में भ्रमता है, तब तक जन्मरूपी बल चढ़ते जाते हैं, और जब चित्त ठहरता है, तब जन्म का अभाव हो जाता है। हे राम! जब तक चित्त का दृश्य के साथ सम्बन्ध है, तब तक जीव कर्मबंधन से नहीं छूटता। जब चित्त का दृश्य से सम्बन्ध टूटता है, तब शुद्ध अद्वैतपद को प्राप्त होता है। हे राम! जब शुद्धचिन्मात्र में उत्थान होता है, तब उसका नाम चैत्योन्मुख होता है। वहीं अहंता दृश्य की ओर बढ़ती जाती है, तब प्रमाद हो जाता है और जड़ता होती है। जैसे जल ओला हो जाता है, वैसे ही चित्तशक्ति प्रमाद में जड़ हो जाती है। जब जीव दृढ़ वासना को ग्रहण करता है, तब अपना शरीर अन्तवाहक मे आधिभौतिक देख पड़ता है। फिर पृथ्वी आदिक तत्त्व भासित होने लगते हैं। ज्यों-ज्यों चित्तशक्ति बहिर्मुख होती जाती है, त्यों-त्यों संसार होता जाता है। जब चित्तवृत्ति स्फुरण से रहित होकर अपने स्वरूप की ओर आती है, तब अपना रूप ही भासित होता है द्वैत मिट जाता है और परमानन्द अद्वैतपद दीखता है। जब पूर्णबोध होता है, तब द्वैत और एक की संज्ञा भी जाती रहती है, केवल आत्मतत्त्वमात्र शुद्ध चैतन्य रहता है। तब ईश्वर से एकता होती है और जगत् की प्रतीति जाती रहती है। जब उस पद की प्राप्ति होती है, तब दृश्य का अभाव हो जाता है; क्योंकि जगत् भावनामात्र है। जैसे भविष्य-काल का वृक्ष आकाश में हो, वैसे ही यह जगत् है, क्योंकि इसका अत्यन्त अभाव है-कुछ बना नहीं, भ्रान्ति से भासित होता है।
५१२ ✹ योगवाशिष्ठ ✹
हे राम ! मेरे वचनों का अनुभव तब होगा, जब स्वरूप का ज्ञान होगा और तभी ये वचन हृदय में स्थान पावेंगे । जैसे कथावाले के हृदय में कथा के अर्थ आते हैं, वैसे ही मेरे ये वचन तुम्हारे मन में स्थान पावेंगे । हे राम ! जब तक मन अपना काम करता है, तब तक जगत का अभाव नहीं होता । जब मन का उपशम होता है, तब जगत् का अभाव हो जाता है । जैसे मनुष्य जब स्वप्न को स्वप्न जानता है, तब फिर स्वप्न के पदार्थों की इच्छा नहीं करता, पर जब तक उनको सत्य जानता है, तब तक इच्छा करता है । हे राम ! सब जीव वासना से ढके हुए हैं । वासना के क्षय का ही नाम ज्ञान है । अज्ञानरूपी भूत जीव को लगा है, इसी से उन्मत्त होकर इसे जगत् प्रतीत होता है, और जगत् के प्रतीत होने से नाना प्रकार की वासना दृढ होती हैं । उसमे जीव दुःख पाने है । जब यह चित्त उलटकर अन्तर्मुख हो और आत्मा में दृढ भावना करे, तब ज्ञानरूपी मन्त्र प्राप्त होता है और अज्ञानरूपी भूत जाता रहता है । हे राम ! अनुभवरूपी कल्पवृक्ष में जैसी भावना होती है, वैसा ही भान होता है । हे राम ! प्रथम इस जीव का शरीर अन्तवाहक था और अपना स्वरूप भूला न था, इसमें अपने को आत्मा ही जानता था और इसे जगत् अपना संकल्पमात्र भासित होता था । जब उस संकल्प में दृढ भावना हुई, तब वह शरीर आधिभौतिक भासित होने लगा । जब उसमें दृढभावना हुई, तब देह और इन्द्रियाँ सब अपने में भासित होने लगीं । तब इनके सुख-दुःख को जानने लगा । जब जगत के सुख-दुःख भासित हुए, तब सब आपदा प्राप्त हुई । पर वास्तव में न कोई सुख है, न दुःख न जगत् है । केवल भावना मात्र है । जैसी चित्त की भावना होती है, वैसे ही आगे भासित होता है । हे राम ! जब यह भावना उलटकर अन्तर्मुख आत्मा की ओर होती है, तब एक ही बोध का भान होता है। और जब एक बोध का भान होता है, तब सब द्वैत मिट जाता है ।
हे राम ! आत्मा में अन्तवाहक भी नहीं है । यह ब्रह्मा भी बोधस्वरूप है । यदि बोध से भिन्न अन्तवाहक कुछ होता, तो भासित होता ।
- निर्वाण प्रकरण * ५१३
अन्तवाहक भी उसी से है—अन्तवाहक शुद्धचिन्मात्र में चैत्योन्मुख होने और चित्तशक्ति के स्फुरित रहने का नाम है । जब उसको पञ्चतन्मात्रा का सम्बन्ध होता है, तब वही जड़ चेतन ग्रन्थि है । चित्तशक्ति चेतन है और पञ्चतन्मात्रा जड़ । इनके इकट्ठा होने का नाम अन्तवाहक शरीर है । यदि यह भी आत्मा में कुछ हुआ होता तो ये वचन न होते—इसमें चिन्मात्र है, कुछ बना नहीं; क्योंकि आत्मा अद्वैत है। हे राम ! दूसरा कुछ बना नहीं, पर भ्रम से द्वैत भासित होता है । जैसे ही यह जगत् भी भ्रान्ति से भासित होता है, कुछ है नहीं । हे राम ! जब है नहीं तो किसकी इच्छा करता है ? उतना सुख इन्द्रियों के इष्ट-भोग से नहीं होता, जितना इनके त्यागने से होता है । हे राम ! एक यज्ञ है, जिसके करने से पुरुष परमपद को प्राप्त होता है । पर वह यज्ञ तब होता है, जब एक खम्भा गाड़े और उसके नीचे बलिदान करे । जब यज्ञ कर चुके, तब सर्व त्याग करना होता है । तभी फल की प्राप्ति होती है । इस क्रम के किये बिना यज्ञ सफल नहीं होता । वह खम्भा क्या है, बलि क्या है, यज्ञ क्या है, त्याग क्या है और फल क्या है, यह सुनो ।
हे राम ! ध्यानरूपी तो खम्भा गाड़े, जिसमें आत्मपद का सदा अभ्यास हो । उसके आगे तृष्णा की बलि दे और ज्ञानरूपी यज्ञ करे—अर्थात् आत्मा के जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप, अद्वैत, निर्विकल्प, देह, इन्द्रियाँ, प्राण आदिक से रहित इत्यादि विशेषण वेदशास्त्र में कहे हैं, उनके अनुसार आत्मा को जानने का नाम ज्ञान है । यही यज्ञ है । ध्यान-रूपी खम्भे, तृष्णारूपी बलि और मनरूपी दृश्य को जीतकर यह यज्ञ पूर्ण होता है । जब यह यज्ञ समाप्त होता है, तब उसके पीछे दक्षिणा भी चाहिए जिससे यज्ञ सफल हो । सर्वस्व देना ही दक्षिणा है—और अहंकार त्याग करना ही सर्वस्व-त्याग है । जब सर्वस्व-त्याग होता है, तब यह यज्ञ सफल होता है । इसका नाम विश्वजित् यज्ञ है । जब इस प्रकार यज्ञ होता है तब इसका फल भी होता है । फल यह है कि चाहे अङ्गारों की वर्षा हो, प्रलयकाल का पवन चले, और पृथ्वी आदिक तत्त्व नष्ट हों
१४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
ऐसे आंमों में भी मन चलायमान नहीं होता । यह फल प्राप्त होता है कि जीव कभी स्वरूप में नहीं गिरता--यह शत्रुनाश वज्र-ध्यान है । हे राम ! अहं का त्याग करना सबसे श्रेष्ठ त्याग है । जो कार्य अहं के त्याग से होता है वह और किसी उपाय में नहीं होता । तप, दान, यज्ञ, शम, दम, उपदेश से भी बढ़कर साधन अहन्ता का त्याग करना है । और सब साधन इसके बाहर हैं । हे राम ! जब तुम अहन्ता का त्याग करोगे, तब तुमको भीतर-बाहर ब्रह्मसत्ता ही दिखेगी और सम्पूर्ण द्वैतभ्रम मिट जावेगा ।
हे राम ! मन के सब अर्थरूपी तृणों को ज्ञानरूपी अग्नि लगावे और वैराग्यरूपी वायु से जगावे । जब इन तृणों को भस्म कर डालोगे, तब तुम परम शान्ति को प्राप्त होगे । मन के जलने से परम संपदा प्राप्त होती है-इससे भिन्न सब आपदा है । मन का उपशम करने में ही कल्याण है । ये जो भीतर बाहर नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, वे मन के मोह से उत्पन्न हुए हैं । जब मन उपशम को प्राप्त होता है, तब मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, पृथ्वी आदिक नाना प्रकार के प्राणी सब आकाशरूप हो जाते हैं । हे राम ! यह सब ब्रह्म है । ज्ञानी को एक सत्ता भासित होती है; क्योंकि दूसरा कुछ बना नहीं । भ्रम से जगत् भासित होता है । उसमें जब नाना प्रकार की वासना होती है, तब अपनी-अपनी वासना के अनुसार जीव जगत् को देखते हैं । इससे तुम जागो और वासना के पिंजड़े को तोड़कर आत्मपद को प्राप्त करो । हे राम ! अज्ञान से जो आत्मपद को भूलकर सोये और वासना के पिंजड़े में पड़े हैं, उन अज्ञानियों की तरह तुम न होना । अज्ञान से जीव का नाश होता है । जो कुछ जगत् देखते हो वह भ्रममात्र है । जैसे बाँसुरी में पवन का शब्द होता है, वैसे ही ये प्राणवायु से बोलते दीखते हैं, ऐसा जानो । जगत् भ्रममात्र है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सर्वसत्ताोपदेशो नाम शताधिकनवषष्टितमसर्गः ॥१६६॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सम्पूर्ण जगत् में सप्त प्रकार की सृष्टि है ।
✳ निर्वाण प्रकरण ✳ ५१५
और सात ही भाँति के जीव हैं। उनको भिन्न-भिन्न सुनो। एक स्वप्न-जाग्रत् के हैं। दूसरे संकल्प-जाग्रत् के हैं। तीसरे केवल जाग्रत् के हैं। चौथे फिर जाग्रत् के हैं। पञ्चम दृढ़ जाग्रत् के हैं। छठे जाग्रत्-स्वप्न के हैं। और सप्तम क्षीण-जाग्रत् के हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने जो यह सात प्रकार की सृष्टि कही, सो समझाने के लिए मुझसे खुलासा करके कहिये। यह ऐसे है, जैसे नदियों के जल का समुद्र में अभेद हो और इनको पूछना भी ऐसे ही है, जैसे एक जल मे फेन बुलबुले और तरङ्ग वायु से होते हैं। इसलिए विस्तार से कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! प्रथम सृष्टि तो यह है कि किसी जीव को किसी कल्प में अपनी जाग्रत् में सुषुप्ति हुई और उसमें जो स्वप्न हुआ तो उसको हमारे जाग्रत् का जगत भासित हुआ और वह उसको शब्द-अर्थ-संयुक्त सत् जानकर ग्रहण करने लगा। तो उसके स्वप्न में हम स्वप्न के नर हैं, परन्तु उसके निश्चय में नहीं, क्योंकि वह अपनी जाग्रत् अवस्था मानता है। पर हमारा और उसका कल्प एक हो गया है, इसी से वह भी जाग्रत् जानता है। और पूर्वकल्प में भी उसका शरीर चैतन्य फुरता था, परन्तु अब सोया पड़ा है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब वह पुरुष अपने कल्प में जागे, तब यह उसको क्या भासित होता है। और यदि वह जागे नहीं और वहाँ कल्प का प्रलय हो, तब उसकी क्या अवस्था होगी? एवम् यदि यहाँ ज्ञान की प्राप्ति हो तो उस शरीर की क्या अवस्था होगी? सो क्रम से कहो।
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यदि वह पुरुष अपने कल्प में जागेगा तो यह जाग्रत् उसको स्वप्न भासित होगा, और जो वहाँ न जागेगा और उस कल्प का प्रलय हो जायगा तो वह जीव वहीं चेष्टा करेगा। यदि ज्ञान की प्राप्ति हो तो उस शरीर और इस शरीर की वासना इकट्ठी होकर निर्वाण हो जायगी और जो ज्ञान न प्राप्त हो तो उस शरीर को त्याग कर और जाग्रत्भ्रम भासित होगा। अपने को पूर्ववत् जाने चाहे न जाने, परन्तु बिना ज्ञान के जगत्भ्रम नहीं मिटता। हे राम! यह और वह दोनों तुल्य हैं। ब्रह्मसत्ता सब जगत् ममान प्रकाशित होती है। हे
५१६ ❇ योगवासिष्ठ ❇
राम ! जैसे गूलर में मच्छर होते हैं, वैसे ही ये जीव भी भ्रम में फुरते हैं । यह जाग्रत् सृष्टि कहा । और स्वप्न में जो जाग्रत् है, उसका नाम स्वप्न-जाग्रत् है । पुरुष बैठा हो और चित्त की वृत्ति ठहर जाय, पर निद्रा नहीं आई । उसने मनोराज्य हुआ और उस मनोराज्य में जगत होकर उसी में दृढ वासना हो गई और पूर्व की वासना भूल गई । यह मत भासित हुई और उसमें मनोराज्य का शरीर भासित हुआ । वही आधि-भौतिकता दृढ़ हो गई । उसका नाम संकल्प-जाग्रत् है । आदि-परमा-त्मतत्त्व में जो प्रकट हुआ और आत्मा में जो जगत् भासित हुआ, उसको संकल्पमात्र जाना । उसका नाम केवल जाग्रत् है । आदि परमात्मतत्त्व से क्षोभ हुआ; उसमें सृष्टि हुई और उसको मत जानकर ग्रहण किया । स्वरूप का प्रमाद हुआ और आगे जन्मान्तर को प्राप्त हुआ । उसका नाम चिरजाग्रत् है । जब इसमें दृढ़ घनीभूत वासना हुई और जीव पापकर्म करने लगा, उसके कारण स्थावर योनि पाई, तो उसका नाम घनजाग्रत् और सुषुप्तजाग्रत् है । जब इसमें सन्तों की संगति और मनशास्त्रों के विचार से बोध प्राप्त हुआ, तब यह जाग्रतसृष्टि उसको स्वप्न हो जाती है । उसका नाम स्वप्नजाग्रत् है । जब बोध में दृढ़ स्थिति हुई, तब उसको तुरीयपद कहते हैं—उसका नाम क्षीणजाग्रत् है । जब जीव इस पद को प्राप्त होता है, तब परमानन्द की प्राप्ति होती है ।
हे राम ! ये सात प्रकार के जीव और सृष्टि मैंने तुमसे कही । इनको विचार करके देखो तो तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जायगा । यह भी क्या बताना है कि यह जीव है और यह सृष्टि है ? सब ब्रह्मसत्ता है, दूसरा कुछ हुआ नहीं । मन के स्फुरण में दृश्य भासित होता है । मन को स्थिर करके देखो तो सब शून्य हो जावेगा, और शून्य भी न रहकर शून्य का कहना भी न रहेगा—इस गिनती को भी विस्मरण करो ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सप्तप्रकारजीवसृष्टिवर्णनं नाम शताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ १७० ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने जो केवल जाग्रत् की उत्पत्ति अकारण, अकर्म और बोधमात्र में कही, सो असम्भव है—जैसे आकाश