भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 514

१४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

ऐसे आंमों में भी मन चलायमान नहीं होता । यह फल प्राप्त होता है कि जीव कभी स्वरूप में नहीं गिरता--यह शत्रुनाश वज्र-ध्यान है । हे राम ! अहं का त्याग करना सबसे श्रेष्ठ त्याग है । जो कार्य अहं के त्याग से होता है वह और किसी उपाय में नहीं होता । तप, दान, यज्ञ, शम, दम, उपदेश से भी बढ़कर साधन अहन्ता का त्याग करना है । और सब साधन इसके बाहर हैं । हे राम ! जब तुम अहन्ता का त्याग करोगे, तब तुमको भीतर-बाहर ब्रह्मसत्ता ही दिखेगी और सम्पूर्ण द्वैतभ्रम मिट जावेगा ।

हे राम ! मन के सब अर्थरूपी तृणों को ज्ञानरूपी अग्नि लगावे और वैराग्यरूपी वायु से जगावे । जब इन तृणों को भस्म कर डालोगे, तब तुम परम शान्ति को प्राप्त होगे । मन के जलने से परम संपदा प्राप्त होती है-इससे भिन्न सब आपदा है । मन का उपशम करने में ही कल्याण है । ये जो भीतर बाहर नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, वे मन के मोह से उत्पन्न हुए हैं । जब मन उपशम को प्राप्त होता है, तब मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, पृथ्वी आदिक नाना प्रकार के प्राणी सब आकाशरूप हो जाते हैं । हे राम ! यह सब ब्रह्म है । ज्ञानी को एक सत्ता भासित होती है; क्योंकि दूसरा कुछ बना नहीं । भ्रम से जगत् भासित होता है । उसमें जब नाना प्रकार की वासना होती है, तब अपनी-अपनी वासना के अनुसार जीव जगत् को देखते हैं । इससे तुम जागो और वासना के पिंजड़े को तोड़कर आत्मपद को प्राप्त करो । हे राम ! अज्ञान से जो आत्मपद को भूलकर सोये और वासना के पिंजड़े में पड़े हैं, उन अज्ञानियों की तरह तुम न होना । अज्ञान से जीव का नाश होता है । जो कुछ जगत् देखते हो वह भ्रममात्र है । जैसे बाँसुरी में पवन का शब्द होता है, वैसे ही ये प्राणवायु से बोलते दीखते हैं, ऐसा जानो । जगत् भ्रममात्र है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सर्वसत्ताोपदेशो नाम शताधिकनवषष्टितमसर्गः ॥१६६॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सम्पूर्ण जगत् में सप्त प्रकार की सृष्टि है ।

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 514, कुल 1734 में से · BharatKosha