भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 515

✳ निर्वाण प्रकरण ✳ ५१५

और सात ही भाँति के जीव हैं। उनको भिन्न-भिन्न सुनो। एक स्वप्न-जाग्रत् के हैं। दूसरे संकल्प-जाग्रत् के हैं। तीसरे केवल जाग्रत् के हैं। चौथे फिर जाग्रत् के हैं। पञ्चम दृढ़ जाग्रत् के हैं। छठे जाग्रत्-स्वप्न के हैं। और सप्तम क्षीण-जाग्रत् के हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने जो यह सात प्रकार की सृष्टि कही, सो समझाने के लिए मुझसे खुलासा करके कहिये। यह ऐसे है, जैसे नदियों के जल का समुद्र में अभेद हो और इनको पूछना भी ऐसे ही है, जैसे एक जल मे फेन बुलबुले और तरङ्ग वायु से होते हैं। इसलिए विस्तार से कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! प्रथम सृष्टि तो यह है कि किसी जीव को किसी कल्प में अपनी जाग्रत् में सुषुप्ति हुई और उसमें जो स्वप्न हुआ तो उसको हमारे जाग्रत् का जगत भासित हुआ और वह उसको शब्द-अर्थ-संयुक्त सत् जानकर ग्रहण करने लगा। तो उसके स्वप्न में हम स्वप्न के नर हैं, परन्तु उसके निश्चय में नहीं, क्योंकि वह अपनी जाग्रत् अवस्था मानता है। पर हमारा और उसका कल्प एक हो गया है, इसी से वह भी जाग्रत् जानता है। और पूर्वकल्प में भी उसका शरीर चैतन्य फुरता था, परन्तु अब सोया पड़ा है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब वह पुरुष अपने कल्प में जागे, तब यह उसको क्या भासित होता है। और यदि वह जागे नहीं और वहाँ कल्प का प्रलय हो, तब उसकी क्या अवस्था होगी? एवम् यदि यहाँ ज्ञान की प्राप्ति हो तो उस शरीर की क्या अवस्था होगी? सो क्रम से कहो।

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यदि वह पुरुष अपने कल्प में जागेगा तो यह जाग्रत् उसको स्वप्न भासित होगा, और जो वहाँ न जागेगा और उस कल्प का प्रलय हो जायगा तो वह जीव वहीं चेष्टा करेगा। यदि ज्ञान की प्राप्ति हो तो उस शरीर और इस शरीर की वासना इकट्ठी होकर निर्वाण हो जायगी और जो ज्ञान न प्राप्त हो तो उस शरीर को त्याग कर और जाग्रत्भ्रम भासित होगा। अपने को पूर्ववत् जाने चाहे न जाने, परन्तु बिना ज्ञान के जगत्भ्रम नहीं मिटता। हे राम! यह और वह दोनों तुल्य हैं। ब्रह्मसत्ता सब जगत् ममान प्रकाशित होती है। हे