भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 516, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 516

५१६ ❇ योगवासिष्ठ ❇

राम ! जैसे गूलर में मच्छर होते हैं, वैसे ही ये जीव भी भ्रम में फुरते हैं । यह जाग्रत् सृष्टि कहा । और स्वप्न में जो जाग्रत् है, उसका नाम स्वप्न-जाग्रत् है । पुरुष बैठा हो और चित्त की वृत्ति ठहर जाय, पर निद्रा नहीं आई । उसने मनोराज्य हुआ और उस मनोराज्य में जगत होकर उसी में दृढ वासना हो गई और पूर्व की वासना भूल गई । यह मत भासित हुई और उसमें मनोराज्य का शरीर भासित हुआ । वही आधि-भौतिकता दृढ़ हो गई । उसका नाम संकल्प-जाग्रत् है । आदि-परमा-त्मतत्त्व में जो प्रकट हुआ और आत्मा में जो जगत् भासित हुआ, उसको संकल्पमात्र जाना । उसका नाम केवल जाग्रत् है । आदि परमात्मतत्त्व से क्षोभ हुआ; उसमें सृष्टि हुई और उसको मत जानकर ग्रहण किया । स्वरूप का प्रमाद हुआ और आगे जन्मान्तर को प्राप्त हुआ । उसका नाम चिरजाग्रत् है । जब इसमें दृढ़ घनीभूत वासना हुई और जीव पापकर्म करने लगा, उसके कारण स्थावर योनि पाई, तो उसका नाम घनजाग्रत् और सुषुप्तजाग्रत् है । जब इसमें सन्तों की संगति और मनशास्त्रों के विचार से बोध प्राप्त हुआ, तब यह जाग्रतसृष्टि उसको स्वप्न हो जाती है । उसका नाम स्वप्नजाग्रत् है । जब बोध में दृढ़ स्थिति हुई, तब उसको तुरीयपद कहते हैं—उसका नाम क्षीणजाग्रत् है । जब जीव इस पद को प्राप्त होता है, तब परमानन्द की प्राप्ति होती है ।

हे राम ! ये सात प्रकार के जीव और सृष्टि मैंने तुमसे कही । इनको विचार करके देखो तो तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जायगा । यह भी क्या बताना है कि यह जीव है और यह सृष्टि है ? सब ब्रह्मसत्ता है, दूसरा कुछ हुआ नहीं । मन के स्फुरण में दृश्य भासित होता है । मन को स्थिर करके देखो तो सब शून्य हो जावेगा, और शून्य भी न रहकर शून्य का कहना भी न रहेगा—इस गिनती को भी विस्मरण करो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सप्तप्रकारजीवसृष्टिवर्णनं नाम शताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ १७० ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने जो केवल जाग्रत् की उत्पत्ति अकारण, अकर्म और बोधमात्र में कही, सो असम्भव है—जैसे आकाश