भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 517

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५१७

में वृक्ष नहीं हो सकता, वैसे ही आत्मा में सृष्टि नहीं हो सकती; क्योंकि आत्मा निराकार और निष्क्रिय है। वह न समवायिकारण है और न निमित्तकारण है। जैसे मृत्तिका घट आदि का कारण होती है, वैसे आत्मा सृष्टि का समवायिकारण भी नहीं; क्योंकि वह अद्वैत है। और जैसे कुम्हार घट आदि का निमित्तकारण होता है, वैसे आत्मा सृष्टि का निमित्तकारण भी नहीं; क्योंकि वह अक्रिय है। उस अकारणक और अकर्मक में सृष्टि कैसे हो सकती है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुम धन्य हो; क्योंकि अब जागे हो। आत्मा में सृष्टि का अत्यन्त अभाव है, क्योंकि वह निर्विकार और निष्क्रिय है। वह न भीतर है, न बाहर; न ऊपर है, न नीचे; केवल बोधमात्र है। उसमें न कोई आरम्भ है, न परिणाम। वह केवल बोधमात्र अपने रूप में स्थित है। जैसे सूर्य की किरणों में जल कल्पित है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या है। हे महाबुद्धिमान् ! आत्मा अकारण है, उसमें कार्यरूप जगत् कैसे हो सकता है? उसमें जगत् नहीं उत्पन्न हुआ। उसके अभाव से सबका अभाव है। न कुछ उपजा है; न किसी का आभास होता है। उपदेश और उसका अर्थ आरोपित है, और कुछ है ही नहीं। आरोपित शब्द भी जिज्ञासु को जताने के निमित्त कहा है, है कुछ नहीं। आत्मा सदा अद्वैतरूप है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो आत्मा में सृष्टि है ही नहीं तो पिण्डाकार कैसे भासित होते हैं? उनको किसने रचा है? और मन, बुद्धि, इन्द्रियों का भान क्यों होता है? चैतन्य को स्नेह (और राग) से किसने मोहित किया है और आत्मा में आवरण कैसे होता है? यह समझाकर कहिये।

वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई पिण्ड है, न किसी ने इनको बनाया है। न कोई भूत है, न किसी ने इनको मोहित किया है और न किसी का आवरण किया है; भ्रान्ति से आवरण भासित होता है। जो आत्मा को आवरण होता तो वह किसी प्रकार नष्ट भी होता। परन्तु जब आवरण ही नहीं तो नष्ट कैसे हो? हे राम! जिसको आवरण होता है, उसका स्वरूप एक अवस्था को त्यागकर दूसरी अवस्था को