भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 518

५१८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

ग्रहण करता है। पर आत्मा तो सदा ज्ञानस्वरूप है। इसमें अन्य अवस्था को कभी नहीं प्राप्त होता, सदा ज्यों का त्यों रहता है। उसमें मन, बुद्धि आदि भी नहीं बने। तब मोह कहाँ और आवरण कहाँ ? सदा एकरस आत्मतत्त्व है। ज्ञानी को ऐसे भासित होता है और अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। वह आत्मा ज्ञानकाल और अज्ञान-काल में एकरस है। पर उसमें दो दृष्टियाँ होती हैं। ज्ञानदृष्टि से तो सब आत्मा है और अज्ञान से नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। हे राम ! जैसे एक समुद्र में अनेक तरङ्गों और बुलबुले उठने और लीन होते हैं, पर उनका उत्पन्न और लीन होना जल में है, जल से भिन्न कुछ नहीं वैसे ही जितने विचार और इच्छाएँ उठती हैं सो सब आत्मा में होते हैं, दूसरी वस्तु नहीं है। विकार और अविकार सब परमात्मतत्त्व है। समुद्र में लहरें और बुलबुले परिणाम में होते हैं; आत्मा सदा ज्यों का त्यों है। नाना प्रकार के जो आकार भासित होते हैं, वे भी वही हैं, जैसे सुवर्ण में नाना प्रकार के भूषण होते हैं, सो सुवर्ण ही हैं, दूसरी वस्तु नहीं, पर भ्रान्ति से उसकी नाना प्रकार की संज्ञा होती है। जैसे कोई पुरुष जाग्रत बैठा हो और नींद आने से स्वप्नसृष्टि भासित हो तो चाहे वह जाग्रत के अज्ञान में स्वप्नसृष्टि भासित हुई हो, पर जब निद्रा निवृत्त होती है, तब जाग्रत ही भासित होती है। वह जाग्रत भी परमात्मतत्त्व के अज्ञान में भासित होती है। जब उस पद में जागोगे, तब जाग्रतभ्रम निवृत्त हो जावेगा।

हे राम ! यह संसार अपने स्फुरण से हुआ है। जब फुरना दृढ़ हुआ, तब जीव दुःख पाने लगा। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वेताल की कल्पना कर आप ही दुःख पाता है, वैसे ही जीव अपने अहं में आप ही दुःख पाता है। जब आत्मबोध होता है, तब संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है। हे राम ! यह संसार जो रम से युक्त लगता है, सो भावनामात्र है। जब यही भावना पलटकर आत्मा की ओर आवे, तब जगत् का भ्रम मिट जायगा। देह, इन्द्रिय आदिक जो आत्मा के अज्ञान में उपजे हैं और उनमें अहंकार हुआ है, वह आत्मभावना से निवृत्त हो जायगा