भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 513
  • निर्वाण प्रकरण * ५१३

अन्तवाहक भी उसी से है—अन्तवाहक शुद्धचिन्मात्र में चैत्योन्मुख होने और चित्तशक्ति के स्फुरित रहने का नाम है । जब उसको पञ्चतन्मात्रा का सम्बन्ध होता है, तब वही जड़ चेतन ग्रन्थि है । चित्तशक्ति चेतन है और पञ्चतन्मात्रा जड़ । इनके इकट्ठा होने का नाम अन्तवाहक शरीर है । यदि यह भी आत्मा में कुछ हुआ होता तो ये वचन न होते—इसमें चिन्मात्र है, कुछ बना नहीं; क्योंकि आत्मा अद्वैत है। हे राम ! दूसरा कुछ बना नहीं, पर भ्रम से द्वैत भासित होता है । जैसे ही यह जगत् भी भ्रान्ति से भासित होता है, कुछ है नहीं । हे राम ! जब है नहीं तो किसकी इच्छा करता है ? उतना सुख इन्द्रियों के इष्ट-भोग से नहीं होता, जितना इनके त्यागने से होता है । हे राम ! एक यज्ञ है, जिसके करने से पुरुष परमपद को प्राप्त होता है । पर वह यज्ञ तब होता है, जब एक खम्भा गाड़े और उसके नीचे बलिदान करे । जब यज्ञ कर चुके, तब सर्व त्याग करना होता है । तभी फल की प्राप्ति होती है । इस क्रम के किये बिना यज्ञ सफल नहीं होता । वह खम्भा क्या है, बलि क्या है, यज्ञ क्या है, त्याग क्या है और फल क्या है, यह सुनो ।

हे राम ! ध्यानरूपी तो खम्भा गाड़े, जिसमें आत्मपद का सदा अभ्यास हो । उसके आगे तृष्णा की बलि दे और ज्ञानरूपी यज्ञ करे—अर्थात् आत्मा के जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप, अद्वैत, निर्विकल्प, देह, इन्द्रियाँ, प्राण आदिक से रहित इत्यादि विशेषण वेदशास्त्र में कहे हैं, उनके अनुसार आत्मा को जानने का नाम ज्ञान है । यही यज्ञ है । ध्यान-रूपी खम्भे, तृष्णारूपी बलि और मनरूपी दृश्य को जीतकर यह यज्ञ पूर्ण होता है । जब यह यज्ञ समाप्त होता है, तब उसके पीछे दक्षिणा भी चाहिए जिससे यज्ञ सफल हो । सर्वस्व देना ही दक्षिणा है—और अहंकार त्याग करना ही सर्वस्व-त्याग है । जब सर्वस्व-त्याग होता है, तब यह यज्ञ सफल होता है । इसका नाम विश्वजित् यज्ञ है । जब इस प्रकार यज्ञ होता है तब इसका फल भी होता है । फल यह है कि चाहे अङ्गारों की वर्षा हो, प्रलयकाल का पवन चले, और पृथ्वी आदिक तत्त्व नष्ट हों

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