भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 512

५१२ ✹ योगवाशिष्ठ ✹

हे राम ! मेरे वचनों का अनुभव तब होगा, जब स्वरूप का ज्ञान होगा और तभी ये वचन हृदय में स्थान पावेंगे । जैसे कथावाले के हृदय में कथा के अर्थ आते हैं, वैसे ही मेरे ये वचन तुम्हारे मन में स्थान पावेंगे । हे राम ! जब तक मन अपना काम करता है, तब तक जगत का अभाव नहीं होता । जब मन का उपशम होता है, तब जगत् का अभाव हो जाता है । जैसे मनुष्य जब स्वप्न को स्वप्न जानता है, तब फिर स्वप्न के पदार्थों की इच्छा नहीं करता, पर जब तक उनको सत्य जानता है, तब तक इच्छा करता है । हे राम ! सब जीव वासना से ढके हुए हैं । वासना के क्षय का ही नाम ज्ञान है । अज्ञानरूपी भूत जीव को लगा है, इसी से उन्मत्त होकर इसे जगत् प्रतीत होता है, और जगत् के प्रतीत होने से नाना प्रकार की वासना दृढ होती हैं । उसमे जीव दुःख पाने है । जब यह चित्त उलटकर अन्तर्मुख हो और आत्मा में दृढ भावना करे, तब ज्ञानरूपी मन्त्र प्राप्त होता है और अज्ञानरूपी भूत जाता रहता है । हे राम ! अनुभवरूपी कल्पवृक्ष में जैसी भावना होती है, वैसा ही भान होता है । हे राम ! प्रथम इस जीव का शरीर अन्तवाहक था और अपना स्वरूप भूला न था, इसमें अपने को आत्मा ही जानता था और इसे जगत् अपना संकल्पमात्र भासित होता था । जब उस संकल्प में दृढ भावना हुई, तब वह शरीर आधिभौतिक भासित होने लगा । जब उसमें दृढभावना हुई, तब देह और इन्द्रियाँ सब अपने में भासित होने लगीं । तब इनके सुख-दुःख को जानने लगा । जब जगत के सुख-दुःख भासित हुए, तब सब आपदा प्राप्त हुई । पर वास्तव में न कोई सुख है, न दुःख न जगत् है । केवल भावना मात्र है । जैसी चित्त की भावना होती है, वैसे ही आगे भासित होता है । हे राम ! जब यह भावना उलटकर अन्तर्मुख आत्मा की ओर होती है, तब एक ही बोध का भान होता है। और जब एक बोध का भान होता है, तब सब द्वैत मिट जाता है ।

हे राम ! आत्मा में अन्तवाहक भी नहीं है । यह ब्रह्मा भी बोधस्वरूप है । यदि बोध से भिन्न अन्तवाहक कुछ होता, तो भासित होता ।