भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 511

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

होते हैं, तब जगत् भासित होता है और जब अहंता का अभाव होता है, तब आत्मपद शेष रहता है। जैसे सुवर्ण में भूषण होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् है, दूसरी वस्तु कोई नहीं बनी। वासना से दृश्य दिखता है। वह वासना मन में उठी है और मन अज्ञान से हुआ है। जब मन संकल्प-विकल्प से रहित होता है, तब सब दृश्य एक ही रूप हो जाता है। जब तक वासना उठती है, तब तक मन में शान्ति नहीं होती। जैसे कोई पुरुष भोंरी घुमाता है, तो बल चढ़ते जाते हैं, और जब ठहरता है, तब वह बल उतर जाता है, वैसे ही जब तक चित्त वासना में भ्रमता है, तब तक जन्मरूपी बल चढ़ते जाते हैं, और जब चित्त ठहरता है, तब जन्म का अभाव हो जाता है। हे राम! जब तक चित्त का दृश्य के साथ सम्बन्ध है, तब तक जीव कर्मबंधन से नहीं छूटता। जब चित्त का दृश्य से सम्बन्ध टूटता है, तब शुद्ध अद्वैतपद को प्राप्त होता है। हे राम! जब शुद्धचिन्मात्र में उत्थान होता है, तब उसका नाम चैत्योन्मुख होता है। वहीं अहंता दृश्य की ओर बढ़ती जाती है, तब प्रमाद हो जाता है और जड़ता होती है। जैसे जल ओला हो जाता है, वैसे ही चित्तशक्ति प्रमाद में जड़ हो जाती है। जब जीव दृढ़ वासना को ग्रहण करता है, तब अपना शरीर अन्तवाहक मे आधिभौतिक देख पड़ता है। फिर पृथ्वी आदिक तत्त्व भासित होने लगते हैं। ज्यों-ज्यों चित्तशक्ति बहिर्मुख होती जाती है, त्यों-त्यों संसार होता जाता है। जब चित्तवृत्ति स्फुरण से रहित होकर अपने स्वरूप की ओर आती है, तब अपना रूप ही भासित होता है द्वैत मिट जाता है और परमानन्द अद्वैतपद दीखता है। जब पूर्णबोध होता है, तब द्वैत और एक की संज्ञा भी जाती रहती है, केवल आत्मतत्त्वमात्र शुद्ध चैतन्य रहता है। तब ईश्वर से एकता होती है और जगत् की प्रतीति जाती रहती है। जब उस पद की प्राप्ति होती है, तब दृश्य का अभाव हो जाता है; क्योंकि जगत् भावनामात्र है। जैसे भविष्य-काल का वृक्ष आकाश में हो, वैसे ही यह जगत् है, क्योंकि इसका अत्यन्त अभाव है-कुछ बना नहीं, भ्रान्ति से भासित होता है।

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