योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२० ✴ योगवाशिष्ठ ✴
सर्वत्र ब्रह्मदेव ही व्याप्त रहा है। स्थावर, जङ्गम आदि सब जगत उसी आत्मतत्त्व के आश्रय से फुरता है। इसमें वही आत्मा का स्वरूप है और वही सबका धारण कर रहा है। वही ईश्वर ब्रह्म है। गम्भीर, साक्षी, आत्मा, ॐकार, प्रणव सब उसी के नाम हैं। जब उस ईश्वर की कृपा होती है, तब जीव अन्तर्मुख होकर निर्मल होता है। हे राम! जब हृदय शुद्ध होता है, तब आत्मपद की ओर भावना होती है कि सब आत्मा ही है। यह भावना ही भक्ति है—तब ईश्वर वह कृपा करके विवेकरूपी दूत भेजता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विवेकदूतवर्णनं नाम शताधिकअष्टषष्टितमसर्गः ॥ १६८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब विवेक दृढ़ होता है, तब जीव उस परमपद को प्राप्त होता है, जो चैत्य से रहित चैतन्य घन है। तब चैत्य का सम्बन्ध टूट जाता है। जब चैतन्य का सम्बन्ध टूटा, तब विश्व का क्षय हो जाता है। जब विश्व का क्षय हुआ, तब वासना भी नहीं रहती। हे राम! यह जगत भी संकल्प के फुरने से है। जब जीव शुद्ध चैतन्य में चैतन्यान्मुख होता है, तब मनोमात्र शरीर होता है, जिसको अन्तर्वाहक कहते हैं। और जब वासना दृढ़ होती है, तब आधिभौतिक प्रतीत होने लगता है। हे राम! इसका उत्थान ही अनर्थ का कारण है। जब यह चेतन होता है, तब इसको अनर्थ की प्राप्ति होती है और मैं मेरा इत्यादिक जगत भासित होता है। जो यह न हो तो जगत भी न हो। इसके होने से ही जगत प्रतीत होता है। इससे मेरा यही आशीर्वाद है कि तुम चेतनता से शून्य हो जाओ और अहंतारूपी चेतनता से रहित अपने बोध में स्थित रहो।
हे राम! मन से ही जगत हुआ है। मन और जगत, दोनों मिथ्या और शून्य हैं। रूप, अवलोक और मनस्कार, तीनों का नाम जगत है। वह मृगतृष्णा के जल सा मिथ्या और शून्य है। जब इनका अभाव होता है, तब शून्य भी नहीं रहता, केवल बोधमात्र चैतन्य होता है। हे राम! दृश्य, दर्शन और द्रष्टा, ये तीनों भावनामात्र हैं। जब ये