भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 509
  • निर्वाण प्रकरण * ५०६

शोभा प्राप्त करता है। जैसे चन्द्रमा के उदय होने पर आकाश शोभा पाता है, वैसे ही वह पुरुष शोभा पाता है। हे राम! जब विवेकरूपी दूत आता है, तब जीव को संसार से पवित्र करता है। मनुष्य प्रथम वासनारूपी मैल से भरा था और चिन्तारूपी शत्रु ने उसे बाँधा था; पर जब विवेकरूपी दूत आता है, तब वह चित्तरूपी शत्रु को मारता है और वासनारूपी मैल का नाश करके देव के निकट ले जाता है। जब उस देव का दर्शन होता है, तब परमानन्द को प्राप्त होता और बड़ा सुख पाता है। हे राम! संसाररूपी समुद्र में मृत्युरूपी भँवर है, तृष्णारूपी तरंगें हैं, अज्ञानरूपी जल है और इन्द्रियाँरूपी ग्राह हैं। उसी समुद्र में ये जीव पड़े हैं। जब विवेकरूपी नौका अकस्मात् प्राप्त होती है, तब वे संसारसमुद्र से पार होते हैं। हे राम! जीव प्रमाद से ही जड़ता को प्राप्त हुए हैं। जैसे जल शीतलता से ओला कहलाता है, वैसे ही प्रमाद से आत्मा जीवसंज्ञा पाता है और वासना से ढक जाता है। पर जब अन्तर्मुख होता है, तब उस देव के सम्मुख होता है और वह देव प्रसन्न होता है। उसके सहस्र शीश, सहस्र पाद, सहस्र भुजा, सहस्र नेत्र और सहस्र कर्ण हैं। सब चेष्टाएँ वही करता है। देखता, सुनता, बोलता और चलता भी वही है। वह अपनी स्वभावसत्ता से प्रकाशित होता है। जैसे सब देहों में चलनशक्ति पवन की है, वैसे ही प्रकाशशक्ति उस देव की है। जब जीव उसके सम्मुख होता है, तब वह प्रसन्न होकर विवेकरूपी दूत भेजता है। तब मनुष्य सन्तों की संगति करता है। तब सत्शास्त्रों को सुनकर उनके अर्थ में दृढ़भावना होती है और वह विवेकरूपी दूत अहं को अदृश्य करता है। तब यह जीव शून्य हो जाता है। फिर यह शून्य को भी त्यागकर बोधमात्र में स्थित होता है। तब पूर्ण आनन्द प्राप्त होता है।

हे राम! जीव आनन्दस्वरूप है और यह विश्व अपना रूप है। परन्तु अज्ञान से भिन्न प्रतीत होता है। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा, मरुस्थल में जल और आकाश में तरुवर दीखते हैं, वैसे ही भ्रान्ति से जगत् प्रतीत होता है। पर सब प्राणियों के भीतर-बाहर और नीचे-ऊपर

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