भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 508

५०८ ✻ योगवाशिष्ट ✻

काँटे आदि होते हैं, उन्हें खड्ग से काटकर दूर किया जाता है। तब खेत अच्छा फलता है। वैसे ही जिस पुरुष को मनरूपी क्षेत्र में अनुभव-रूपी फल देखना हो वह इच्छारूपी कण्टकों और वृक्षों को अनिच्छा-रूपी खड्ग से काटे और सन्तोषरूपी बीज को बोवे तो खेत भी अच्छा फलेगा। हे राम ! जब अनुभवीरूपी फल प्राप्त होता है, तब मनुष्य सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से भी स्थूल हो जाता है, और सबमें आत्मा को देखता है। हे राम ! जब चित्त अदृश्य होता है, तब द्वैत भावना मिट जाती है और जब द्वैत भावना मिटी तब चित्त अदृश्य होता है। उस चित्त को जो उपशम का सुख होता है, वह वाणी से कहा नहीं जा सकता—उसका नाम निर्वाणपद है। जब मनुष्य ईश्वर की भक्ति करता है और दिनरात्रिचिरकाल तक भक्ति करता रहता है, तब ईश्वर प्रसन्न होते हैं और निर्वाणपद की प्राप्ति होती है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! हे सब तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ ! वह कौन ईश्वर है और उसकी भक्ति क्या है, जिसके करने से निर्वाणपद प्राप्त होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वह ईश्वर दूर नहीं; उसमें भेद भी कुछ नहीं और वह दुर्लभ भी नहीं; क्योंकि वह अनुभवस्वरूप ज्योति और परमबोधस्वरूप है। सब जिसके वश है, जो सब है और जिसमें सब है, उस सर्वात्मा को मेरा नमस्कार है। हे राम ! सब कोई उसी को पूजते हैं। जप, मन्त्र, तप, दान, होम जो कुछ कोई करता है, वह सभी उसी की पूजा है। देवता, दैत्य, मनुष्य आदि जो स्थावर-जङ्गम प्राणी हैं, वे सब उसी को पूजते हैं और सबको फल देनेवाला भी वही है। उत्पत्ति और प्रलय में जो पदार्थ दीखते हैं; वे सब उसी में सिद्ध होते हैं—ऐसा वह ईश्वर है। जब वह ईश्वर प्रसन्न होता है, तब वह पवित्र, शुभाचरण करने वाला अपना एक दूत भेजता है।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! ईश्वर अद्वैत आत्मा शुद्ध ब्रह्म है। उसका दूत कौन है और वह कैसे आता है, यह मुझसे कहिये। वशिष्ठ ने कहा, हे राम ! उस ईश्वर जो परमदेव का दूतविवेक है वह हृदयरूपी गुफा में उदय होता है। जब वह उदय होता है, तब उससे जीव परम