भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

🔆 निर्वाण प्रकरण 🔆 ५०७

नीरस हो जाता है, अर्थात् जगत् असत् प्रतीत होता है, हृदय में शान्ति होती है, जीव अपने को ब्रह्म जानता है और परिच्छिन्नता मिट जाती है । जब तक जीव अपने को परिच्छिन्न जानता था, तब तक सब दुःखों का अनुभव करता था और जब सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों से जगत् नीरस प्रतीत होता है, तब परमपद को प्राप्त होता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे मोक्षोपदेशो नाम शताधिकसप्तषष्टितमस्सर्गः ॥ १६७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब संसार में वैराग्य होता है, तब सन्तों की संगति होती है । फिर शास्त्र सुनता है । तब सम्पूर्ण जगत् नीरस हो जाता है । जब जगत् नीरस लगा और आत्मा में दृढ़ अभ्यास हुआ, तब अपनी स्वभाव सत्ता प्रकाशित होती है । उसी स्वभावसत्ता में स्थित होने पर परमानन्द की प्राप्ति होती है, जिसमें वाणी की गति नहीं है । हे राम ! जब यह अवस्था प्राप्त होती है, तब मन स्थिर हो जाता है; अर्थों की तृष्णा नहीं रहती । जो अपने पास होता है उसको रखने की भी इच्छा नहीं रहती—सहज त्याग हो जाता है—और पुत्र, धन, स्त्री आदिक सब नीरस हो जाते हैं । यद्यपि वह मनुष्य इनके बीच में रहता है तो भी इनमें 'अहं' 'मम' अभिमान नहीं करता । जैसे मजदूर चलता-चलता किसी मार्ग में आ उतरता है और मार्गवालों से कुछ सम्बन्ध नहीं रखता, वैसे ही वह किसी विषय से सम्बन्ध नहीं रखता, और जो अनिच्छित इन्द्रियों के सुख प्राप्त होते हैं, उनमें रागद्वेष नहीं रखता । जैसे किसी पत्थर की शिला पर जल चला जाता है तो उसको कुछ रागद्वेष नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान को किसी में रागद्वेष नहीं होता ।

हे राम ! उसके शरीर की यह स्वाभाविक अवस्था हो जाती है कि वह एकान्त को चाहता है और बन और कन्दरा में रहने की इच्छा करता है । मुमुक्षु को अज्ञान के स्थान जो स्त्री भोग, राग-द्वेष के इष्ट-अनिष्ट भी दैवसंयोग से प्राप्त होते हैं तो भी उन्हें शीघ्र ही त्याग देता है । हे राम ! जब क्षेत्र में बीज डालना होता है, तब पहले जो